प्रवासी मजदूर कोरोना से असुरक्षितता व लॉकडाउन के डर से पलायन कर रहे है!

-अशोक भाटिया-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

कोरोना वायरस संक्रमण की बेकाबू रफ्तार के बीच महानगरों और बड़े शहरों से प्रवासी मजदूरों का पलायन एक बार फिर शुरू है। बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों पर भीड़ बढ़ने लगी है, जो 2020 में लॉकडाउन के बाद के हालात की याद दिलाता है, जब अपने घर जाने के लिए बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों पर पहुंच गए थे और जिन्हें साधन नहीं मिला, वे पैदल ही मीलों दूर अपने गांव-घर लौट चले थे।देश में कोविड-19 के मामलों में जनवरी-फरवरी में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई थी, लेकिन मार्च के बाद जब एक बार फिर संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी शुरू हुई तो इसकी रफ्तार थमने का नाम नहीं ले रही है। ऐसे में कई जगह प्रतिबंधों की घोषणा की गई है। कहीं साप्ताहिक लॉकडाउन की घोषणा की गई है तो कहीं नाइट कर्फ्यू की। हालात बिगड़ते देख प्रवासी मजदूरों में एक बार फिर लॉकडाउन के हालात को लेकर डरे हुए हैं।

पिछले वर्ष लॉकडाउन लगने की स्थिति में सभी राज्यों से लगभग तीन करोड़ मजदूरों का उल्टा पलायन हुआ था जिससे बिहार , बंगाल व उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ व राजस्थान जैसे राज्यों में भारी अफरा-तफरी फैल गई थी जबकि महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, केरल, तमिलनाडु, दिल्ली व कर्नाटक जैसे औद्योगीकृत राज्यों की अर्थव्यवस्था चैपट हो कर रह गई थी। मगर इस बार कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के चलते जिस तरह विभिन्न राज्यों में आंशिक लाॅकडाउन या कर्फ्यू लागू हो रहा है उससे यहां काम कर रहे दूसरे राज्यों के मजदूरों में अभी से आशंका पैदा हो रही है कि उन्हें फिर से पिछले साल वाले बुरे दिन देखने पड़ सकते हैं अतः दिल्ली जैसे शहरों से उनका पलायन भी शुरू हो गया है। इस स्थिति को रोकने के लिए तेलंगाना व आंध्र प्रदेश के लघु उद्यमियों ने जो रास्ता दिखाया है वह अन्य राज्यों के छोटे-बड़े उद्यमियों के लिए अनुकरणीय हो सकता है।

मजदूरों का पलायन तभी रोका जा सकता है जब उन्हें अपनी रोजी के बरकरार रहने का आश्वासन मिले और कोरोना से सुरक्षा का वातावरण मिले। इससे उद्योग जगत व श्रमिकों दोनों का ही भला होगा मगर इसके लिए प्रशासनिक या सरकारी स्तर पर भी कुछ आवश्यक कदम उठाये जाने की जरूरत पड़ेगी। मसलन अपने-अपने राज्यों में औद्योगिक व व्यापारिक व वाणिज्यक गतिविधियां चालू रखने के लिए राज्य सरकारों को शुल्क आदि में उद्यमियों को कुछ छूट प्रदान करनी होगी परन्तु शुल्क व कराधान के सभी मामले अब जीएसटी के नियन्रण में होने से प्रत्येक राज्य द्वारा दी गई शुल्क छूट का समायोजन जीएसटी में ही करना पड़ेगा जिससे राज्यों का हिस्सा यथावत रह सके। यह प्रक्रिया थोड़ी पेचीदा हो सकती है परन्तु राष्ट्रहित और राष्ट्र के विकास के समक्ष यह कुछ नहीं है। इस समय सबसे बड़ा मुद्दा जान बचाने और आजीविका बचाने का है क्योंकि अर्थव्यवस्था पहले से ही ढीली चल रही है।

तेलंगाना व आंध्र के इन छोटे मिल-मालिकों द्वारा पेश की जा रही नजीर का पालन बड़े-बड़े उद्योगपति भी कर सकते हैं और अपने कर्मचारियों विशेषकर प्रवासी मजदूरों के लिए सुरक्षित सुविधाएं स्थापित कर सकते हैं। स्वास्थ्य सुरक्षा के क्षेत्र में इस बार कोरोना वैक्सीन के आने के बाद इसे लगाने के नियम जिस प्रकार लचीले किये गये हैं उनसे भी प्रवासी मजदूरों को उनके कार्यस्थल पर ही रोकने में मदद मिलेगी। मगर अब बदले हालात में यह संभव है कि मजदूरों का पलायन रुक सके। इसके लिए उद्योग जगत की दृढ़ इच्छा शक्ति की जरूरत होगी। साथ ही यह भी जरूरी होगा कि देश में वैक्सीन उत्पादन की किसी भी हालत में कमी न हो। वैक्सीन के रूप में हमारे हाथ में अब कोरोना को परास्त करने का अस्त्र आया है। इसका उपयोग हर स्तर पर होना चाहिए और इस तरह होना चाहिए कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत असर न पड़ने पाये। दरअसल कोरोना हमें यह भी सिखा रहा है कि हमारी भौतिक सुख-सुविधाएं बिना मानवीय हितों को संरक्षित किये बिना जारी नहीं रह सकतीं। दूसरे राज्यों से आये ये प्रवासी मजदूर ही बड़े-बड़े शहरों में ‘सुबह’ होने का ऐलान करते हैं और रात्रि को निश्चिन्त होकर सोने का इंतजाम बांधते हैं। इनकी सुरक्षा करना ‘सामयिक’ धर्म भी है।

इससे इन्कार नहीं कि स्वास्थ्य ढांचा चरमराता दिख रहा है, लेकिन यह ध्यान रहे कि ये मददगार ही बिगड़ी को बनाने में सहायक बनेंगे। इनके मनोबल को बनाए रखने के साथ सरकारों को अराजकता को छूती अव्यवस्था दूर करने के लिए जी-जान से जुटना होगा, क्योंकि यह अक्षम्य है कि एक ओर अस्पतालों में भर्ती होना मुश्किल है तो दूसरी ओर ऑक्सीजन से लेकर कुछ दवाओं की कालाबाजारी भी हो रही है। यह मनमानी और अंधेरगर्दी सरकारों के प्रति आम आदमी के भरोसे पर चोट करने वाली है। सरकारों को हालात संभालने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए दिखना चाहिए। वे इससे अनजान नहीं हो सकतीं कि जो कोरोना मरीज अस्पताल में भर्ती नहीं हो पा रहे हैं, उनमें से कई ऑक्सीजन को भी तरस रहे हैं। इसके चलते कई मरीज दम तोड़ दे रहे हैं। यह स्थिति सर्वथा अस्वीकार्य है।

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