कोरोना की मार देश में हाहाकार!

-सज्जाद हैदर-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

वाह रे देश की बड़ी-बड़ी कुर्सी पर विराजमान बड़े-बड़े जिम्मेदार। क्या कोई भी जिम्मेदारी लेगा यह सोचना ही अपने आपमें बेईमानी है। क्योंकि यह सत्य है कि कोई भी जिम्मेदारी लेने के लिए आगे कदापि नहीं आएगा। दुखद यह है कि समस्या के निराकरण पर जितना जोर देना चाहिए वह बल आँकड़ों को गोल-गोल घुमाने में लगाने का प्रयास किया जा रहा है। यह बहुत ही दुखद है। ऐसा क्यों है यह सबसे बड़ा सवाल है। क्योंकि धरातल की हकीकत और कागजों पर खींची जा रही लाईन में बहुत बड़ा अंतर है। ऐसा क्यों किया जा रहा है। यह कार्य किसके द्वारा किया जा रहा है। इसके पीछे कौन लोग हैं। यह बड़ा सवाल है। क्योंकि जिस प्रकार की स्थिति शमशान घाटों से उभरकर आ रही है वह दिल को दहला देने वाली है। लेकिन इतनी गंभीर परिस्थिति के बावजूद भी आंकड़ों को गोल-गोल घुमाया जा रहा है। ऐसी स्थिति बहुत ही चिंताजनक है।

सवाल यहीं नहीं रुक जाता। अपितु यहाँ से अनेकों सवालों का जन्म होता है क्योंकि शमशान घाटों की स्थिति इतनी भयावक है कि जिसे शब्दों में उकेरने का साहस कोई भी नहीं जुटा सकता। जहाँ पर चारों ओर चिताएं ही चिताएं दिखाई देती है। शमशान घाटों के बाहर का दृश्य रोंगटे को खड़े कर देता है। क्योंकि शवों की लम्बी लाईन लगी हुई है। आज शव अंतिम संस्कार की प्रतीक्षा में लाईन में रखे है जोकि अपनी बारी का इंतजार करते हैं। इतनी भयावक स्थिति है जिसे देखकर पत्थर भी अपने आँसुओं को नहीं रोक सकता। लेकिन देश के सिस्टम को चलाने वाले जिम्मेदारों को यह जमीनी हकीकत दिखाई नहीं दे रही। बड़ी-बड़ी कुर्सी पर बैठे हुए जिम्मेदार समस्या के निराकरण से इतर आँकड़ों को गोल-मोल घुमाने में लगे हुए है। स्थिति बड़ी ही दर्दनाक है शमशान के द्वार पर खड़ा प्रत्येक व्यक्ति विलाप करता हुआ दिखाई दे रहा है क्योंकि कोई अपने पिता के शव को लेकर आया है तो कोई अपनी माता के शव को। कोई अपने भाई के शव को लेकर आया है तो कोई अपने बहन के शव को। इससे भी दर्दनाक स्थिति यह है कि जब शमशान के द्वार पर 70 वर्ष के बुजुर्ग के कांधों पर अपने नौजवान बेटे का शव होता है। बूढ़ा पिता अपने बुढ़ापे की दुहाई देकर विलाप करता है। इस प्रकार के दुख दर्द को देखकर शरीर क्या आत्मा तक काँप उठती है। लेकिन यह दुख उन जिम्मेदारों को नहीं दिखाई दे रहा। इसके पीछे का कारण क्या है। इस प्रकार का व्यव्हार जनता के प्रति क्यों किया जा रहा है। जनता का दुख दर्द उनको क्यों नहीं दिखाई दे रहा। इसके पीछे शायद कारण यह है कि जो जिम्मेदार हैं वह अपनी आँखों से समस्या को नहीं देखना चाहते। क्योंकि वह बंगलों एवं गाड़ियों से उतकर शमशानों एवं कब्रिस्तानों तथा अस्पतालों तक जाने की जहमत नहीं उठाना चाहते। बंगलों के अंदर बैठकर आंकड़ो को गोल-मोल करने की जुगत में पूरी तरह से लगे हुए हैं। यह बड़ी दुखद स्थिति है।
अस्पतालों की स्थिति और भी दुखद है जिसे शब्दों में उकेर पाना अत्यंत जटिल है। क्योंकि अस्पतालों की सीमा एवं क्षमता सीमित है संसाधन भी सीमित हैं। परन्तु मौत और जीवन के बीच झूलती हुई जिन्दगियों की कतार बहुत लंबी है। बात यहीं तक नहीं रूकती क्योंकि प्रति सेकेण्ड कोरोना से पीड़ितों की तायदाद और तेजी के साथ बढ़ती चली जा रही है जिससे कि लाईन बहुत तेजी के साथ बढ़ रही है। इसी कारण किसी को बेड मिल पा रहा तो किसी को बेड नहीं मिल पा रहा। अब कल्पना करें जब बेड तक नसीब नहीं हो पा रहा तो उपचार कैसा…? चिकित्सा से संबन्धित सुविधाओं को पाने की स्थिति क्या होगी…? क्योंकि जब बेड ही नहीं मिल पा रहा तो दवाईयां एवं ऑक्सीजन तक पहुँच कैसे हो पाएगी यह बड़ा सवाल है…? यह सवाल इतना बड़ा है जोकि कौंध रहा है। यह बात बिल्कुल आईने की तरह साफ है। देश की जनता किस हाल में है इसे समझने के लिए किसी बड़े फार्मूले की जरूरत नहीं है। मात्र बंगलों से बाहर निकलकर अस्पतालों तक जाने की जरूरत है। अस्पताल तक जब आप पहुँचेगे तो स्थिति देखकर आपकी आँखों से आँसू निकल पड़ेंगे क्योंकि स्थिति इतनी भयावक है। कोई बेड के लिए गिड़गिड़ा रहा है तो कोई दवाईयों के लिए अपने हाथों को जोड़ रहा है। कोई ऑकसीजन के लिए दर-दर भटकता हुआ दिखाई दे रहा है। देश की इतनी बड़ी आबादी जिस तरह से काल के मुँह के सामने अपने आपको खड़ा पा रही है। उससे दिन प्रति दिन चिंताएं और बढ़ रहीं हैं। जिस पर कार्य करने की जरूरत है। क्योंकि यह स्थिति ऐसी है जिसको नहीं छिपाया जा सकता। समस्या से ग्रस्त लोग जिस समस्या में जी रहे हैं वह अपनी समस्या को कैसे नकार सकते हैं। क्या वह अपनी समस्या को भूल सकते हैं…? यह बड़ा सवाल है।
इसलिए बंगलों से के बाहर निकलकर जमीन पर उतरने की जरूरत है। आँकड़ों को गोल-मोल घुमाने का खेल चल पाएगा यह कहना मुश्किल है। इललिए समय रहते जिम्मेदारों को जमीन पर उतरकर कार्य करने की जरूरत है। आँकड़ों को घुमाना देश के भविष्य के लिए शायद ठीक नहीं होगा। क्योंकि ऊँची-ऊँची कुर्सी पर बैठे हुए जिम्मेदारों को यह समझ लेना चाहिए की अब जमीन पर उतरकर कार्य करना पड़ेगा। धरातल की तस्वीर को बदलना होगा। छोटी लाईन के सामने बड़ी लाईन कागज पर खींच देने से कार्य नहीं चलेगा। क्योंकि आरोप-प्रत्यारोप के खेल से जनता का भला कभी भी नहीं हुआ। किसी भी समस्या का निराकरण आँकड़ों के माध्यम से कभी भी नहीं हुआ। समय बदलता रहता है शासन तथा सत्ता दोनो बदलती रहती है। लेकिन किसी का दर्द दुख और गम कभी भी नहीं बदलता। जिसने अपने किसी को खो दिया वह कभी भी उसको नहीं पा सकता। किसी माँ को अपना बेटा नहीं मिलेगा। किसी अनाथ बेटी को अपना पिता नहीं मिलेगा जिसको इस महामारी ने उससे छीन लिया। इललिए वक्त की जरूरत को समझते हुए कार्य करने की जरूरत है।

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