बाकी सब बहाना है संविधान ही असली निशाना है

-शकील अख्तर-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

इन दोनों नेताओं की विवश छवि बनने से दलित पिछड़ों का सबसे बड़ा नुकसान हुआ। कमजोर अपने नेता को ताकतवर देखना चाहता है। उसकी शक्ति में उसे अपनी मुक्ति की संभावनाएं दिखाई पड़ती हैं। मगर इन दोनों नेताओं के शरणागत होने के बाद पूरे देश में और खासतौर से यूपी में सामाजिक न्याय की गति स्थिर हुई है। लेकिन भाजपा और संघ परिवार इतने से संतुष्ट नहीं हैं। वे पूरी तरह मनुवादी व्यवस्था चाहते हैं। संविधान इसमें सबसे बड़ी बाधा है। जिसने सब को समान अधिकार दे दिए हैं। असली निशाना संविधान है। बाकी सब बहाना है। इस संविधान ने ही दलित, पिछड़े को समान अधिकार दिए हैं। जो सबसे ज्यादा चुभते हैं। दलित, पिछड़ों को उनकी पूर्व स्थिति पर लाना ही मुख्य उद्देश्य है। जहां उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं हों केवल यथास्थितिवादी समाज की व्यवस्था के अनुसार वे अपने सामाजिक दर्जे के अनुरूप रहें।
15 अगस्त 1947 बदलना थोड़ा मुश्किल है। हालांकि पद्मश्री माननीया कंगना रनौत जी कह चुकी हैं कि वह तो भीख में मिली आजादी थी। अंग्रेज इतने बड़े दिल के थे कि आजादी जैसी चीज भी भीख में दे देते थे। खैर तो कंगना जी ने कहा कि देश दरअसल 2014 में आजाद हुआ जब मोदी जी प्रधानमंत्री बने। तो बदलने को तो 15 अगस्त 1947 की तारीख भी है। मगर उसका नंबर शायद बाद में आएगा। पहले 26 जनवरी 1950 को मिटाना है। अभी हरिद्वार से लेकर रायपुर तक जो धर्म संसदें हुई उनमें संविधान पर सबसे ज्यादा हमले किए गए। 1977 में केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार में तो संविधान बदलने की मुहिम ही सबसे पहले शुरू हुई थी। दो चीजों पर उस सरकार का सबसे ज्यादा फोकस था। एक स्वमूत्र पीने पर और दूसरे संविधान, तिरंगा बदलने पर। मगर उस समय इन्दिरा गांधी थीं। उन पर मुकदमे चलाए, गिरफ्तार किया। मगर वे कहां डरने वाली थीं। वे ही थीं जिन्होने अमेरिका से कह दिया था कि सातवां नहीं आठवां या चाहे जोन सा समुद्री बेड़ा पहुंचा दो। बांग्ला देश में आजादी की ज्योति जलेगी।
वह आज भी जल रही है। और तब तक जलेगी जब तक अमेरिका, चीन या कोई और वापस पाकिस्तान और बांग्ला देश का विलय न करवा दें। और वह भी शर्त है कि यहां भारत में उस समय कांग्रेस की सरकार नहीं होना चाहिए। नहीं तो चाहे जो कीमत अदा करना पड़े राहुल गांधी या कोई और बांग्ला देश में जल रही भारत के वीर जवानों के शौर्य की उस ज्योति को नहीं बुझने देंगे। अभी राहुल ने कह दिया। बड़ी बात कही कि इंडिया गेट पर अमर जवान ज्योति फिर जलाएंगे। आज सब जगह डर का माहौल है। कोई कुछ नहीं बोलेगा। मगर राहुल के यह विश्वास भरे शब्द भारतीय फौज, शहीदों के परिवारों से लेकर देश के अनगिनत लोगों के लिए बहुत बड़ी हिम्मत का काम करेंगे।
अमर जवान ज्योति का तो हिन्दू मुसलमान से कोई ताल्लुक नहीं था। सिर्फ और सिर्फ भारतीय सेना के शौर्य और विजय से उंचे उठे गर्वित सिर से था। मगर उसे बुझा दिया। कहा विलय कर रहे हैं। जैसे खेती किसानी का पूंजीपतियों की हवस के साथ कर रहे थे। देश ने वह भी कामयाब नहीं होने दिया। और यह भी नहीं होगा। डर के उन शिखर क्षणों में भी किसान नहीं घबराया। कुर्बानियां दीं। मगर अंत में प्रधानमंत्री से माफी मंगवा ही ली। किसानों के बाद अब जवानों की शहादत का अपमान है। इसका बदला जनता को लेना होगा।
कौन सी जनता? वही दलित, पिछड़े जिनका सशक्तिकरण सबसे ज्यादा तकलीफ पहुंचाता है। देश में पिछले साढ़े सात साल से जो हिन्दू मुसलमान बढ़ाया जा रहा है। वह सबके सामने है। दिखता है। मगर इससे कई गुना ज्यादा देश में आरक्षण के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। जिसके बारे में मीडिया बताता नहीं है। मीडिया का इसे हंड्रेड परसेन्ट समर्थन प्राप्त है। हिन्दू मुसलमान में तो मीडिया का एक हिस्सा धर्मनिरपेक्ष करेक्टर दिखाता भी है। मगर आरक्षण के मामले में वह पूरी तरह आरक्षण विरोधियों के साथ है।
आरक्षण अपने आप में कुछ नहीं है। बल्कि वह एक पूरा पैकेज है। जिसका मतलब पूरे दलित और पिछड़े समाज पर अयोग्यता का आरोप लगाना है। अभी पीजी नीट के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि आरक्षण योग्यता के खिलाफ नहीं है। मगर इससे उनके अभियान पर कोई असर नहीं होगा। आरक्षण सामाजिक न्याय है। यह पहले भी कई बार कहा गया। मगर जनता में मैसेज यह दिया जाता है कि आरक्षण बैसाखी है। जो सवर्ण समाज की योग्यता पर डाका है। मगर यह सब काम बहुत चोरी छिपे किया जाता है। क्योंकि जैसा कि अभी यूपी में चुनाव की पूरी साम्प्रदायिक धारा बदलते हुए स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि हम दलित, पिछड़े, बहुजन 85 प्रतिशत हैं। और जो बाकी 15 प्रतिशत हैं। उनमें भी बंटवारा है। मतलब उनमें भी प्रगतिशील, जनसमर्थक और देश की वास्तविक चिंता करने वाले लोग 85 प्रतिशत के साथ हैं। इसीलिए अखिलेश यादव ने चुनाव जीतते ही जातिगत जनगणना की घोषणा कर दी है।
बिहार में भाजपा के सहयोग से सरकार चलाने के बावजूद नीतीश कुमार सब पार्टियों के साथ जाकर प्रधानमंत्री से इसकी मांग कर आए हैं। आज मायावती ने बसपा को बहुत कमजोर कर दिया। मगर यह नारा बसपा के संस्थापक कांशीराम जी ने ही दिया था कि जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी। इसी के बाद मायवती को भरपूर समर्थन मिला। हर धर्म, जाति का। ब्राह्मणों का भी और 2007 में पहली बार उन्होंने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। मगर जैसे 2002 से 07 के दौरान अमर सिंह ने मुलायम की सरकार भ्रष्ट कर दी थी वैसी ही सतीश चन्द्र मिश्रा ने मायावती सरकार की। न उसके बाद मुलायम अपना जलवा कभी वापस बना पाए और न ही मायावती। दोनों स्वाभाविक नेता थे। और जनता ऐसे नेताओं को किसी पर निर्भर नहीं देख सकती।
इन दोनों नेताओं की विवश छवि बनने से दलित पिछड़ों का सबसे बड़ा नुकसान हुआ। कमजोर अपने नेता को ताकतवर देखना चाहता है। उसकी शक्ति में उसे अपनी मुक्ति की संभावनाएं दिखाई पड़ती हैं। मगर इन दोनों नेताओं के शरणागत होने के बाद पूरे देश में और खासतौर से यूपी में सामाजिक न्याय की गति स्थिर हुई है। लेकिन भाजपा और संघ परिवार इतने से संतुष्ट नहीं हैं। वे पूरी तरह मनुवादी व्यवस्था चाहते हैं। संविधान इसमें सबसे बड़ी बाधा है। जिसने सब को समान अधिकार दे दिए हैं। न्याय कितना ही डरा हुआ हो मगर जैसा अभी डाक्टरों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के पक्ष में कहा वैसा कभी कभी उसे कहना पड़ रहा है। संविधान में दी आरक्षण की व्यवस्था के कारण।
क्या आपको पता है कि संविधान में सबको समान अधिकार देने और इसकी पहली सीढ़ी सबको मताधिकार का कैसा विरोध हुआ था। वह नेहरू ही थे जो इसी वजह से आज भी आंखों में खटकते हैं जिन्होंने संविधान सभा में कहा था कि ये गरीब, कमजोर, अनपढ़, कम पढ़े लिखे लोग ही हैं जिन्होंने आजादी के लिए कुर्बानियां दीं। पढ़े लिखे लोग, जमींदार, समर्थ अंग्रेजों का साथ दे रहे थे। बता दें कि सबको मताधिकार देने का विरोध डा राजेन्द्र प्रसाद कर रहे थे। जिसका पुरजोर विरोध नेहरू ने किया और इन्श्योर किया कि मताधिकार सबको हो।
आज दलित, पिछड़े कांग्रेस को सबसे ज्यादा गालियां देते हैं। उनकी गलती भी नहीं हैं। दलित पिछड़ों की राजनीति करने वाले सभी दलों और उनके नेताओं ने कांग्रेस के खिलाफ ही सारा माहौल बनाया है। मगर फिर भी रोहित वेमुला का सबसे दमदारी से समर्थन करने वाले राहुल गांधी ही हैं। उनकी हिम्मत है कि वे इसे हत्या कहते हैं। दलित पिछड़ों को मुसलमान के नाम पर एकजुट कर लिया जाता है। वे समझते हैं कि असली दुश्मन मुसलमान है। मगर वे यह भूल जाते हैं कि असली निशाना वही हैं। मुसलमानों के पास क्या है जो संघ और भाजपा लेगी? न नौकरियां, न उनकी सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन। यह दोनों चीजें तो पिछले सत्तर सालों में दलित और पिछड़ों ने हासिल की है। आज सबसे ज्यादा सरकारी नौकरियां टाप क्लास की आईएएस, आईपीएस उनके पास हैं। और सामाजिक हैसियत यह है कि अब गाली देकर कोई बेगार नहीं करा पाता है।
इसी को वापस लाना है। प्रतिगामी राजनीति जिसे इन्दिरा गांधी प्रतिक्रयावादी, दक्षिणपंथी और पूंजीवादी कहती थीं यही है। इन्दिरा ने भूमिहीन दलितों को गांव और शहर दोनों जगह जमीन के पट्टे दिलाए। उनका खून चूसने वाले प्राइवेट साहूकारों को जेलों में बंद कर दिया। सारे प्राइवेट कर्जे माफ कर दिए। बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके वहां से गरीबों, दलितों, पिछड़ो, बेरोजगार युवाओं को आसान शर्तों पर रिण दिलवाया। वे पहली, सातवीं, दसवीं तारीखों को साहूकारों के आदमियों को वेतन खिड़की पर फटकने नहीं देती थीं। इन तारीखों में शराब के ठेके बंद करवा देती थीं। तब दलित पिछड़ों का जीवन स्तर उंचा उठा है। और इसीलिए असली निशाना वह हैं। और उन्हें ताकत देने वाला संविधान है। निगाहें उस पर हैं। जिस दिन उसे बदल दिया 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस खत्म हो जाएगा। केवल 15 अगस्त बचेगा। मगर जैसा कि कंगना जी ने कह दिया उसे भी रहने नहीं दिया जाएगा।

 

 

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