चीन से व्यापार घाटे की चुनौती

-डा. जयंतीलाल भंडारी-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

हाल ही में 13 जनवरी को भारत और चीन के बीच 14वें दौर की वार्ता चीन के अडि़यल रवैये के कारण असफल होने के बाद भारत-चीन संबंधों पर प्रकाशित हो रही रिपोर्टों में इस बात पर हैरानी प्रस्तुत की जा रही है कि जहां पिछले वर्ष 2021 में लगातार सीमाओं पर चीन की क्रूर आक्रामकता दिखाई दी, वहीं वर्ष 2021 में चीन से सामानों का रिकॉर्ड आयात हुआ और चीन से व्यापार घाटा भी छलांगे लगाकर बढ़ते हुए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। सचमुच यह चिंताजनक विचारणीय प्रश्न है कि जब पिछले वर्ष 2021 की शुरुआत से ही चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन ने अत्याधुनिक हथियारों के साथ 50-60 हजार सैनिक तैनात किए हुए हैं, अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत बताते हुए अरुणाचल प्रदेश के 15 स्थानों का चीनी एवं तिब्बती भाषा में नामकरण कर लिया है, चीन ने नया कानून द लैंड बॉडर लॉ लागू कर दिया है, चीन एलएसी के पार बुनियादी ढांचे का लगातार निर्माण कर रहा है, तब भी चीन से भारत में सामानों की आवक लगातार बढ़ती गई है। यदि हम दोनों देशों के बीच हाल ही में प्रस्तुत किए गए द्विपक्षीय व्यापार के आंकड़ों को देखें तो पाते हैं कि जनवरी से नवंबर 2021 के बीच दोनों देशों में कुल 8.57 लाख करोड़ रुपए का रिकॉर्ड व्यापार हुआ, जो पिछले साल के मुकाबले 46.4 फीसदी ज्यादा है।
जहां भारत ने इन 11 महीनों की अवधि में चीन से 6.59 लाख करोड़ रुपए का रिकॉर्ड सामान खरीदा है, वह पिछले वर्ष 2020 के मुकाबले 49 फीसदी ज्यादा है। वहीं चीन को भारत ने 1.98 करोड़ रुपए मूल्य का सामान निर्यात किया है, जो पूववर्ती वर्ष की तुलना में 38.5 फीसदी ज्यादा है। इन 11 महीनों में चीन से व्यापार घाटा भी रिकॉर्ड स्तर 4.61 लाख करोड़ रुपए की ऊंचाई पर पहुंच गया है। यदि हम पिछले चार वर्षों के जनवरी से नवंबर तक के 11 महीनों के भारत-चीन व्यापार के आंकड़ों को देखें तो पाते हैं कि वर्ष 2017 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 4.45 लाख करोड़ रुपए था। यह वर्ष 2018 में घटकर 4.30 लाख करोड़ रुपए, वर्ष 2019 में घटकर 3.83 लाख करोड़ रुपए, वर्ष 2020 में घटकर 3.30 लाख करोड़ रहा। लेकिन 2021 में यह घाटा सर्वोच्च ऊंचाई पर पहुंच गया। वर्ष 2021 में चीन से भारत के आयात में हुई वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा चिकित्सा उपकरणों एवं दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का भी है। इस समय चीन से तेजी से आयात बढ़ना इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले छह-सात वर्षों से लगातार वोकल फॉर लोकल और आत्मनिर्भर भारत अभियान के माध्यम से स्थानीय उत्पादों के उपयोग की लहर को देश भर में आगे बढ़ाया है। चीन को आर्थिक चुनौती देने के लिए सरकार के द्वारा टिक टॉक सहित विभिन्न चीनी एप पर प्रतिबंध, चीनी सामान के आयात पर नियंत्रण कई चीनी सामान पर शुल्क वृद्धि, सरकारी विभागों में चीनी उत्पादों की जगह यथासंभव स्थानीय उत्पादों के उपयोग की प्रवृत्ति जैसे विभिन्न प्रयास किए गए हैं।
वर्ष 2019 और 2020 में चीन से तनाव के कारण देशभर में चीनी सामान का जोरदार बहिष्कार दिखाई दिया था। मेड इन इंडिया का बोलबाला था। स्थानीय उत्पादों के उपयोग की लहर का जोरदार असर था। रक्षाबंधन, जन्माष्टमी और गणेश चतुर्थी, नवदुर्गा, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहारों में बाजार में भारतीय उत्पादों की बहुतायत थी और चीनी सामान बाजार में बहुत कम दिखाई दिए थे। भारत में चीन से होने वाले आयात में बड़ी गिरावट आने लगी थी। व्यापार घाटे में तेजी से कमी आने लगी थी। चीन ने इससे चिंतित होकर कई बार अपनी बौखलाहट भी जाहिर की थी। अब एक बार चीन को आर्थिक सबक देना जरूरी दिखाई दे रहा है। वस्तुतः 2021 में स्वदेशी उत्पादों के उपयोग के अभियान की पैठ कुछ कम हुई। देश के कोने-कोने में लोग सस्ते चीनी उत्पादों को तेजी से खरीदते हुए दिखाई दिए। दुकानदार यह कहते हुए दिखाई दिए कि वे गुणवत्तापूर्ण भारतीय सामान ही बेचना चाहते हैं, पर भारतीय उत्पाद महंगे होने से अब अधिकांश ग्राहक चीन में निर्मित सस्ती वस्तुएं मांगते हैं। चीन ने उत्पादों को सस्ता व नया बनाने के लिए शोध व अन्य काम भी किए हैं। ऐसे में चीनी उत्पादों की खरीदी बढ़ गई है। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि हम रणनीतिक रूप से आगे बढ़कर चीन से बढ़ते आयात और बढ़ते व्यापार घाटे के परिदृश्य को बहुत कुछ बदल सकते हैं। देश में अभी भी दवाई उद्योग, मोबाइल उद्योग, चिकित्सा उपकरण उद्योग, वाहन उद्योग तथा इलेक्ट्रिक जैसे कई उद्योग बहुत कुछ चीन से आयातित माल पर आधारित हैं। यद्यपि चीन के कच्चे माल का विकल्प तैयार करने के लिए पिछले एक-डेढ़ वर्ष में सरकार ने प्रोडक्शन लिंक्ड इनसेटिव (पीएलआई) स्कीम के तहत 13 उद्योगों को करीब दो लाख करोड़ रुपए आवंटन के साथ प्रोत्साहन सुनिश्चित किए हैं। देश के कई उत्पादक चीन के कच्चे माल का विकल्प बनाने में सफल भी हुए हैं। लेकिन अब इन क्षेत्रों में अतिरिक्त निवेश की मांग पूरी की जानी होगी।
निश्चित रूप से स्थानीय बाजारों में चीनी उत्पादों को टक्कर देने और चीन से व्यापार घाटा और कम करने के लिए हमें उद्योग-कारोबार क्षेत्र की कमजोरियों को दूर करना होगा। हम देश में मेक इन इंडिया अभियान को आगे बढ़ाकर लोकल प्रॉडक्ट को ग्लोबल बना सकते हैं। सरकार के द्वारा स्वदेशी उत्पादों को चीनी उत्पादों से प्रतिस्पर्धी बनाने वाले सूक्ष्म आर्थिक सुधारों को लागू किया जाना होगा। भारतीय उद्योगों को चीन के मुकाबले में खड़ा करने के लिए शोध और नवाचार पर और अधिक ध्यान देना होगा। देश में लॉजिस्टिक सेवाओं की सरलता पर भी ध्यान बढ़ाया जाना होगा। देश की नई पीढ़ी चीन को आर्थिक चुनौती देने के लिए कोविड-19 के बाद की नई कार्य संस्कृति का नेतृत्व करना होगा। हम उम्मीद करें कि इस समय आजादी के 75वें साल में जब देश अमृत महोत्सव मना रहा है, तब एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता और चीनी सामान के आयात को नियंत्रित करने के लिए शुरू किया गया अभियान और अधिक उत्साहजनक रूप से आगे बढ़ाया जाएगा। हम उम्मीद करें कि चिकित्सा उपकरणों एवं दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल में आने वाले कच्चे माल के अधिक व गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के लिए एक फरवरी को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले आगामी वर्ष 2022-23 के बजट में देश में लागू उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के तहत अधिक आबंटन सुनिश्चित किया जाएगा और इन पदार्थों के आयात में कमी किए जाने के अधिकतम प्रयास होंगे। निश्चित रूप से इन सब उपायों से चीन पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा। साथ ही स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन के साथ आत्मनिर्भर भारत ही चीन को आर्थिक टक्कर देने और चीन की महत्त्वाकांक्षाओं पर नियंत्रण का एक प्रभावी उपाय सिद्ध होगा।

 

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