गतिरोध के मायने

-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-

संसद में गतिरोध जारी है। सत्तारूढ़ पक्ष कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की माफी पर अड़ा है, तो कांग्रेस नेतृत्व वाला विपक्षी खेमा अडानी मामलों की जांच और जेपीसी के गठन पर आमादा है। विपक्ष के करीब 200 सांसदों ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के मुख्यालय तक पैदल मार्च करने और निदेशक को ज्ञापन देने की रणनीति तय की थी, लेकिन पुलिस ने संसद के बाहर विजय चौक पर ही विपक्षी भीड़ को रोक लिया। इसी तरह विपक्ष सीबीआई निदेशक के दफ्तर और ‘राष्ट्रपति भवन’ तक मार्च निकालने की भी योजना बना रहा है। सबसे अहम और संवैधानिक महत्त्व का सवाल है कि संसद का गतिरोध कब और कैसे टूटेगा? क्या वित्त विधेयक, अर्थात बजट, भी शोर और हंगामे के बीच ध्वनि मत से पारित किया जाएगा? बजट पर जो संशोधन प्रस्तावित हैं या जो बहस अनिवार्य है, उसका क्या होगा? यदि बजट पर बहस ही नहीं होनी है, तो फिर संसद का औचित्य ही क्या है? कुछ राज्यों की अनुदान मांगों पर बिना विचार किए ही क्या उन्हें स्वीकार कर लिया जाएगा? विपक्ष के 16 दलों ने इंटरनेट मेल के जरिए जो ज्ञापन ईडी को भेजा है, उसमें अडानी समूह के खिलाफ गंभीर आरोप हैं, लेकिन वे दोहराव और पुराने आरोपों के अलावा कुछ और नहीं हैं। लेकिन प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने यह खुलासा नहीं किया कि अडानी और अंबानी करीब 1.75 लाख करोड़ रुपए का निवेश राजस्थान सरकार की किन परियोजनाओं में करने वाले हैं।

ये संकेत सूचना के अधिकार के जरिए मिले हैं। पहले से ही कांग्रेस की राजस्थान सरकार ने करीब 65,000 करोड़ रुपए का ठेका अडानी समूह को दे रखा है। सैकड़ों एकड़ जमीन उसे मुहैया कराई गई है। कांग्रेस की ही छत्तीसगढ़ सरकार ने अडानी समूह को 11,000 करोड़ रुपए का ठेका दे रखा है। केरल में वामपंथी सरकार है। वामपंथी भी विपक्षी भीड़ में शामिल हैं। उनसे और कांग्रेस से भी सवाल किए जाने चाहिए कि यदि अडानी समूह ने फर्जीवाड़े, मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध किए हैं और वे ‘महाघोटालेबाज’ हैं, तो मोटे ठेके अडानी को क्यों दिए गए हैं? यह सवाल कई और राज्यों से भी किए जा सकते हैं, जहां कांग्रेस सत्ता में शामिल रही है अथवा अब भी है। बहरहाल यह बहस और सियासत जारी रहेगी, क्योंकि निशाने पर प्रधानमंत्री मोदी हैं, लेकिन गौरतलब संकेत ये भी हैं कि विपक्षी एकता में आज भी स्पष्ट दरारें हैं, जबकि आम चुनाव 2024 सिर्फ एक साल दूर है। विपक्ष के अडानी-विरोधी ज्ञापन पर शरद पवार की एनसीपी के किसी सांसद या नेता-पदाधिकारी के हस्ताक्षर नहीं हैं। इसके अलावा, तृणमूल कांग्रेस विपक्ष के मोदी-विरोधी तमाम अभियानों से अलग है। संसद के दोनों सदनों में 142 सांसदों की ताकत वाले 13 राजनीतिक दल कमोबेश विपक्षी एकता की मुहिम से बाहर हैं। यह बहुत बड़ा सियासी संकेत है। तृणमूल के अलावा, आंध्रप्रदेश में सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस, ओडिशा में सत्तारूढ़ बीजद, तेलुगूदेशम पार्टी, बसपा और अन्नाद्रमुक आदि दल उल्लेखनीय हैं, जो कांग्रेस की छतरी तले विपक्षी एकता पर असहमत हैं।

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