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नए शिक्षा सत्र से उम्मीदें

-शिवनारायण गौर-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत अजीम प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा पांच राज्यों में ऑनलाइन शिक्षा की स्थिति पर किए गए एक सर्वेक्षण में शामिल 80 प्रतिशत से अधिक शिक्षकों ने कहा कि वे ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान विद्यार्थियों के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखने में असमर्थ थे, जबकि 90 प्रतिशत शिक्षकों ने महसूस किया कि बच्चों के सीखने का कोई सार्थक आकलन संभव नहीं था। हम जानते हैं कि छोटे बच्चों का सीखना एक दूसरे के साथ काफी होता है। साथ में खेलना, अपने हमउम्र से बातचीत में बच्चों को एक-दूसरे से जानने और सीखने के मौके भी मिलते हैं और इन मौकों से बच्चे दूर हो गए थे।

एक जुलाई से लगभग सभी जगह नया शिक्षा सत्र शुरु हो चुका है। पिछले दो साल के बाद व्यवस्थित रूप से स्कूल खुल रहे हैं। गौरतलब है कि तकरीबन दो साल से बच्चे औपचारिक रूप से नियमित स्कूली शिक्षा से वंचित रहे हैं। खास तौर पर प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों के लिए ये समय काफी चुनौतीपूर्ण रहा है। गत वर्ष तक अमूमन तो काफी समय स्कूल बंद ही थे पर जहां खुले वहां भी कोविड के डर के चलते पालकों ने बच्चों को नियमित रूप से स्कूल नहीं भेजा। ऐसी परिस्थिति में ऑनलाइन शिक्षा ही एक माध्यम था जिससे बच्चे अपनी औपचारिक शिक्षा जारी रखे हुए थे। पर ऑनलाइन शिक्षा की अपनी सीमाएं हैं। ऑनलाइन पढ़ाई करना खासतौर उन बच्चों के लिए बड़ी चुनौती थी जो कि दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं। जहां बिजली से लेकर मोबाइल और नेटवर्क की चुनौती अपने आप में एक मुश्किल बात थी। कहा जा सकता है कि इन दो सालों में ऑनलाइन शिक्षा ने हाशिए पर पड़े समुदाय के बच्चों को मुख्यधारा से काफी हद तक अलग कर दिया है। जिनके पास संसाधनों की पहुंच है, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से सुदृढ़ हैं, ऑनलाइन शिक्षा की पहुंच केवल उन तक ही है। ऑनलाइन शिक्षा के बारे में कई रपटें इस दौरान आई हैं जिनसे जानकारी मिलती है कि प्राथमिक शिक्षा के लिहाज से ऑनलाइन शिक्षा बहुत कारगर नहीं हुई है।

शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत अजीम प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा पांच राज्यों में ऑनलाइन शिक्षा की स्थिति पर किए गए एक सर्वेक्षण में शामिल 80 प्रतिशत से अधिक शिक्षकों ने कहा कि वे ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान विद्यार्थियों के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखने में असमर्थ थे, जबकि 90 प्रतिशत शिक्षकों ने महसूस किया कि बच्चों के सीखने का कोई सार्थक आकलन संभव नहीं था। हम जानते हैं कि छोटे बच्चों का सीखना एक दूसरे के साथ काफी होता है। साथ में खेलना, अपने हमउम्र से बातचीत में बच्चों को एक-दूसरे से जानने और सीखने के मौके भी मिलते हैं और इन मौकों से बच्चे दूर हो गए थे। हिन्दी भाषी समाज में पढ़ने की आदत का अभाव भी इसका एक कारण है कि बच्चे शिक्षा की प्रक्रिया से जुड़ने में ज़्यादा समय लेते हैं।

अब जब बच्चे ऑनलाइन से ऑफलाइन शिक्षा के लिए स्कूल में आ रहे हैं तो स्कूल की भूमिका काफी बढ़ जाती है। दो साल के इस लम्बे व्यवधान के बाद यदि बच्चे नियमित रूप से स्कूल आ रहे हैं तो स्कूल को उनके साथ ज़्यादा काम करने की ज़रुरत होगी। संभावना है कि उनके अकादमिक स्तर में कमी आई होगी। हाल ही में अक्सर 2021 की रपट भी इस बात का जिक्र करती है कि बच्चों के अकादमिक स्तर में कमी आई है। नेशनल अचीवमेंट सर्वे 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक 10 वीं कक्षा के 66 फीसदी बच्चों को गणित, 65 फीसदी को साइंस और 58 फीसदी बच्चों को अंग्रेजी भाषा का बुनियादी स्तर का ज्ञान भी नहीं है। 5वीं कक्षा में पढ़ने वाले 52 प्रतिशत बच्चों को गणित का जोड़ घटाना भी नहीं आता है। यह सर्वे मध्य प्रदेश के 2320 स्कूलों के 38778 बच्चों के साथ किया गया था। ये अध्ययन इस बात की पुष्टि करते हैं कि शिक्षा की गुणात्मकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

यही नहीं इस दौरान उन बच्चों पर काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा जिनका स्कूल में दाखिला होना था। कई जगह खासतौर पर ग्रामीण अंचल या आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े तबके से आने वाले बच्चों का स्कूल में दाखिला हुआ ही नहीं है पर यदि कहीं उनका स्कूल में प्रवेश भी हुआ है तो उन्हें स्कूल जाने का मौका ही नहीं मिला है। ऐसे बच्चे औपचारिक शिक्षा से दो साल पिछड़ गए हैं। यदि अब वे किसी तरह से स्कूल आ पा रहे हैं तो शिक्षक और पालक दोनों की भूमिका उनके प्रति काफी बढ़ जाती है। पालकों को बच्चों के नियमितता बरकरार रखने के प्रयास करने होंगे। शिक्षकों को भी बच्चों के साथ अलग ढंग से पेश आना होगा। उनके साथ ज़्यादा मेहनत करनी होगी। हो सकता है कि बच्चों के साथ पढ़ने-लिखने के कुछ नए तौर तरीके अपनाने पड़ें। यानी शिक्षकों के प्रशिक्षण भी किए जाने की महती आवश्यकता है ताकि दो साल में शिक्षा में आई गिरावट की भरपाई का रास्ता ढूंढ पाएं।

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