खामोश होती कुश्ती के अखाड़ों की रौनक

-प्रताप सिंह पटियाल-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

प्रतिवर्ष 23 मई का दिन विश्व कुश्ती दिवस के तौर पर मनाया जाता है। 23 मई 1904 को वियना (ऑस्ट्रिया) में विश्व की पहली ‘ग्रीको रोमन’ शैली की कुश्ती का आयोजन हुआ था। वहीं से विश्व कुश्ती दिवस मनाने की शुरुआत हुई। यूं तो कुश्ती कई स्वरूपों में लड़ी जाती है, मगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती ‘ग्रीको रोमन’ तथा ‘फ्री स्टाइल’ दो शैलियों में लड़ी जाती है। भारत में फ्री स्टाइल कुश्ती का प्रचलन ज्यादा रहा है। भारतीय पहलवानों ने 1920 में ‘एंटवर्प’ (बैल्जियम) में आयोजित ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में कुश्ती में पहली बार देश का प्रतिनिधित्व किया था, मगर फ्री स्टाइल कुश्ती में देश के लिए पहला ओलंपिक पदक (कांस्य) 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में खशाबा जाधव ने जीता था। फ्री स्टाइल कुश्ती की पहली विश्व चैंपियनशिप का आगाज 1951 में टर्की में हुआ था। मगर भारतीय सेना के पहलवान कैप्टन उदय चंद ने 1961 में ‘याकोहामा’ (जापान) में आयोजित फ्री स्टाइल कुश्ती चैंपियनशिप में देश के लिए पहला (कांस्य) पदक जीता था। ग्रीको रोमन कुश्ती की विश्व चैंपियनशिप में भारतीय पहलवान संदीप तुलसी यादव ने 2013 में ‘हंगरी’ में देश के लिए पहला (कांस्य) पदक जीता था।

भारतीय महिला पहलवान ‘अलका तोमर’ ने 2006 में चीन के ग्वांग्जु शहर में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता था, जो कि देश के लिए महिला कुश्ती का पहला मेडल था। देश में 1948 में कुश्ती संघ की स्थापना भी हुई तथा वर्तमान में कुश्ती विश्व चैंपियनशिप, राष्ट्र मंडल खेल व एशियन गेम्स तथा ओलंपिक जैसे बड़े खेल आयोजनों का हिस्सा बन चुकी है। भारत में कुश्ती का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। रामायण व महाभारत जैसे ग्रंथों में मल्लयुद्धों का पर्याप्त जिक्र हुआ है। सदियों से हमारे गांव, देहात की खेल संस्कृति का सबसे लोकप्रिय खेल व मनोरजंन का साधन परंपरागत कुश्ती ही रहा है। आज भी हजारों कुश्ती प्रेमियों को मिट्टी में आयोजित होने वाले कुश्ती मुकाबलों का उत्साह से इंतजार रहता है। हिमाचल में कई त्यौहारों व मेलों के अवसर पर कुश्ती दंगलों का आयोजन होता है। बिलासपुर के नलवाड़ी मेले में कुश्ती दंगल की परंपरा रियासत काल से चली आ रही है। घुमारवीं ग्रीष्मोत्सव का दंगल व उसी के समीप चैहड़ का अखाड़ा तथा मंडी जिला में आयोजित होने वाले दंगल देश की सबसे बड़ी पारंपरिक कुश्ती प्रतियोगिताओं में शुमार करते हैं, मगर 2020-21 के कुश्ती मुकाबलों को कोविड-19 महामारी ने अपनी जद में ले लिया है, जिसके चलते मिट्टी के अखाड़ों की महक व उनमें पहलवानों के दाव-पेंच, दंड बैठक तथा आकर्षण का मुख्य केंद्र ढोल संस्कृति की जोशीली आवाज भी खामोश हो रही है।

ढोल संस्कृति से जुड़े कलाकारों व पारंपरिक कुश्ती लड़ने वाले पहलवानों के आर्थिक मोर्चों पर गर्दिश के बादल छा चुके हैं। पारंपरिक कुश्ती के पहलवानों की भारी भरकम खुराक व आजीविका काफी हद तक कुश्ती के शौकीन दर्शकों द्वारा दी जाने वाली ईनामी राशि पर निर्भर होती है। इस वर्ष टोक्यो में आयोजित होने वाले ओलंपिक खेलों में पदकों की ज्यादा उम्मीद फ्री स्टाइल कुश्ती से ही है, जिसमें भारत के 4 पुरुष व 4 महिला पहलवान देश की नुमाइंदगी करेंगे। इनमें भारतीय सेना के सूबेदार दीपक पुनिया 86 किलोग्राम भार वर्ग में चुनौती पेश करेंगे। यदि बात अमरीकी कुश्ती ‘वर्ल्ड रैसलिंग ऐंटरटेनमेंट’ के पहलवानों की करें तो बॉबी लेशली, ब्रॉक लेसनर व रॉब वैन डैम जैसे दिग्गज पहलवानों ने अपने खेल जीवन की शुरुआत फ्री स्टाइल कुश्ती से ही की थी। इसी कुश्ती के मशहूर अमरीकी पहलवान ‘कर्ट एंगल’ ने 1996 के अटलांटा ओलंपिक में फ्री स्टाइल कुश्ती के हैवीवेट वर्ग में स्वर्ण पदक जीता था। मगर हमारे देश में कुश्ती की मजबूत बुनियाद के खलीफा फौजी गुरु कैप्टन चांद रूप, गुरु हनुमान व चांदगी राम जैसे दिग्गजों ने मिट्टी के अखाड़ों में ही तालीम देकर असंख्य अंतरराष्ट्रीय पहलवान तैयार करके विश्व के खेल मानचित्र पर भारत का परचम लहराने में अपना अविस्मरणीय योगदान दिया था। यदि आज भारतीय कुश्ती विश्व स्तर पर अपना रुतबा कायम कर रही है, देश के पहलवान कुश्ती की बुलंदियों का मुकाम हासिल कर रहे हैं, तो इस कामयाबी के पीछे मिट्टी के अखाड़ों का अक्स छिपा है।

देश में कई राज्यों की सरकारों ने पारंपरिक कुश्ती में अच्छा प्रदर्शन करने वाले अपने पहलवानों को नौकरियां भी प्रदान की हैं। बॉलीवुड के अदाकार, निर्माता निर्देशक पहलवानों के कुश्ती जीवन पर कई फिल्में बनाकर करोड़ों रुपए कमा लेते हैं, मगर वास्तविक पहलवान बेरोजगारी के कारण गुरबत में ही जीवनयापन करके अपना भविष्य तराशते हैं। दूसरी तरफ बेलगाम महंगाई, कोरोना त्रासदी का कहर तथा क्रिकेट के प्रति बढ़ती खुमारी ने पारंपरिक कुश्ती को हाशिए पर धकेल दिया है। देश में बडे़ उद्योगपतियों की आईपीएल जैसी क्रिकेट टीमों में विदेशी खिलाड़ी भारतीय मैदानों पर खेलना भी सीख गए तथा क्रिकेट के साथ अन्य विज्ञापनों के जरिए करोड़ों रुपए कमा कर भी ले जाते हैं। यदि क्रिकेट आईपीएल तथा कबड्डी लीग की तर्ज पर परंपरागत कुश्ती की लीग का ढोल संस्कृति के साथ आयोजन हो तो पहलवानों की आर्थिक स्थिति में सुधार व संस्कृति का संरक्षण भी होगा तथा पारंपरिक कुश्ती का स्वरूप अंतरराष्ट्रीय स्तर की कुश्ती में भी दिखेगा। चूंकि गांव के युवा कुश्ती की शुरुआत मिट्टी के अखाड़ों से ही करते हैं, मगर माटी के यही रुस्तम मैट की कुश्ती पर अपनी दक्षता साबित करने में सक्षम हैं। बशर्ते कुश्ती संघ, खेल मंत्रालय व भारतीय खेल प्राधिकरण इस विषय पर गंभीरता दिखाए। परंपरागत कुश्ती के वजूद को बचाने की जद्दोजहद में लगे पहलवानों के भविष्य पर सरकारों को ध्यान देना होगा। बहरहाल खेल मंत्रालय ने पारंपरिक कुश्ती को राष्ट्रीय खेल महासंघ के रूप में मान्यता देकर मिट्टी की कुश्ती में नई जान फूंक दी है। क्यों न पुरातन धरोहर कुश्ती को राष्ट्रीय खेल घोषित करके इसका वैभव लौटाया जाए। उम्मीद है टोक्यो ओलंपिक में भारतीय कुश्ती इतिहास रचेगी।

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