राजनैतिकशिक्षा

कौन बनेगा करोड़पति

-पी. के. खुराना-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

लगभग दो वर्ष पूर्व मेरे एक मित्र ने नौकरी छोड़कर अपनी एक फैक्टरी लगाई। फैक्टरी लगाने के लिए उन्हें कर्ज की आवश्यकता थी जो उन्हें एक बैंक ने मुहैया करवा दिया। कर्ज मिलने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपनी पुरानी खटारा कार बेची और नई कार खरीदी, नए कपड़े खरीदे और घर की रेनोवेशन करवाई। उसके बाद उन्होंने फैक्टरी का भवन बनवाया और मशीनरी की खरीददारी की। मेरे वे मित्र मौजी व्यक्ति हैं, कठिनाइयों से परेशान नहीं होते, जल्दी तनाव में नहीं आते और मेहनत से गुरेज नहीं करते। यह उनकी योग्यता और मेहनत का फल है कि फैक्टरी ठीक चल रही है और वे नौकरी से ज्यादा लाभ कमा रहे हैं। उनकी देखादेखी एक अन्य मित्र ने भी नौकरी छोड़ी, अपनी फैक्टरी लगाई और फैक्टरी लगाने के लिए बैंक से कर्ज मिलते ही नई गाड़ी, नए कपड़े और नए फर्नीचर आदि पर खर्च किया। दूसरे मित्र की फैक्टरी तो लग गई, पर उनकी लाख काबलियत और मेहनत के बावजूद उनका प्रोडक्ट नहीं चला। धीरे-धीरे उधारियां बढ़ने लगीं, ग्राहक तो कम थे ही, सप्लायरों ने भी मुंह मोड़ना शुरू कर दिया, बैंक के तकाजे बढ़ गए और आज वे खुद को कोस रहे हैं कि उन्होंने अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर मुफ्त की परेशानी क्यों मोल ले ली।

मेरे एक तीसरे मित्र बहुत अच्छी नौकरी में हैं, बढि़या वेतन, बड़ा मकान, सुंदर-सुशील बीवी, स्मार्ट बच्चे और रोब-दाब को देखें तो उनका जीवन दूसरों के लिए मिसाल है। दुनिया के बहुत से लोग उनका-सा जीवन जीना चाहते हैं, पर खुद वे बहुत दुखी हैं। हाल ही में उनकी प्रमोशन हुई है, वेतन और बढ़ गया है, पर वे हैं कि हमेशा पैसे की कमी से जूझते दिखाई देते हैं। इनकी कहानी ऐसी है कि पैसा हाथ में बाद में आता है, उसे खर्च करने की योजनाएं पहले से तैयार होती हैं। ज्यादातर मामलों में तो उससे भी आगे बढ़कर, पैसा आने से पहले ही खर्च हो चुका होता है और पैसा आने पर उस खर्च के कारण चढ़ी उधारी चुकाई जाती है। उनका जीवन देखकर ऐसा लगता है मानो उन्हें खर्च का जुलाब लग गया हो। पैसा आए, तो खर्च होना ही चाहिए। नहीं आए, तो भी खर्च होना चाहिए, आखिर तो पैसा आएगा ही! बड़े लोगों की बात छोड़ दें तो किशारों और युवाओं में भी यह बीमारी आम है। एटीएम कार्ड और क्रेडिट कार्ड ने जीवन बदल डाला है। किसी से पूछने की जरूरत नहीं, इजाजत की जरूरत नहीं। एटीएम कार्ड और क्रेडिट कार्ड ने ‘अपना हाथ .. जगन्नाथ’ की कहावत को सजीव कर डाला है। युवाओं की बड़ी भीड़ इंडियन कॉफी हाउस को छोड़कर बरिस्ता, कैफे कॉफी डे, हुक्का बार, डिस्कोथेक तथा मनोरंजन और खानपान के ऐसे ही स्थानों की ओर जा रही है। ये युवा सचमुच जीवन का मजा लूट रहे हैं। सवाल यह है कि क्या ऐसे लोगों का जीवन संतुलित है? क्या यह खर्च अनाप-शनाप है और क्या उन्हें जीवन जीने का कोई और तरीका सीखना चाहिए? क्या बड़ी गाड़ी खरीदना, महंगे कपड़े पहनना या घर को सजाना गलत है? जीवन का आनंद लेना गलत नहीं है। अच्छे कपड़े पहनना, अच्छे रेस्तरां में खाना खाना, बड़ा घर खरीदना गलत नहीं है। यह सब इस पर निर्भर करता है कि आपकी आय कितनी है और आय का साधन क्या है। एक आम भारतीय के लिए यह एक नया विचार है और इस पर जरा विस्तार से चर्चा की आवश्यकता है।

यदि आपके पास कार नहीं है और आप बैंक से कर्ज लेकर कार खरीद रहे हैं तो आपको कार की डेप्रिसिएशन का लाभ मिलेगा, कर्ज पर ब्याज देने के कारण इन्कम टैक्स में छूट मिलेगी। यदि आपकी प्रमोशन हुई है या ज्यादा तनखाह वाली नई नौकरी लगी है तो बढ़ी हुई आय से आप कर्ज की किस्त आसानी से चुका सकते हैं, इसलिए ज्यादातर मामलों में आपको मित्रों से और परिवार से मकान पर, कपड़ों पर, कार पर या छुट्टियों पर खर्च करने की सलाह मिलेगी। कार, कपड़ों और मकान पर किया गया खर्च वस्तुतः अनुत्पादक खर्च हैं। वह पैसा जो इन पर लग गया, वापस नहीं आएगा। बड़ी कार में ईंधन की खपत ज्यादा होगी और रखरखाव का खर्च भी ज्यादा होगा। दुर्घटना की स्थिति में उसकी मरम्मत भी महंगी होगी। नया घर बड़ा होगा तो ज्यादा जगह के लिए ज्यादा फर्नीचर चाहिए, महंगा फर्नीचर चाहिए और उसके रखरखाव का खर्च भी ज्यादा होगा। बड़ी कार और बड़े घर पर बढ़ा हुआ खर्च ऐसा है जो सिर्फ एक बारगी ही नहीं होगा, बल्कि लगातार होता रहेगा। सवाल यह है कि इसमें गलत क्या है? समझने की बात इतनी सी है कि आपका यह खर्च आपका आनंद तो बढ़ाता है, पर समृद्धि नहीं बढ़ाता। यदि आप सचमुच अमीर होना चाहते हैं या स्थायी समृद्धि चाहते हैं तो आपको जीवन जीने के इस पुराने तरीके में कुछ बदलाव करने पड़ेंगे। प्रमोशन हो जाए, ज्यादा बढि़या तनखाह वाली नई नौकरी मिल जाए या फैक्टरी चल जाए तो बढ़ी हुई आय का निवेश किया जा सकता है।

यहां निवेश से मेरा आशय म्यूचुअल फंड या शेयरों की खरीददारी से नहीं है। यदि आपको इनकी बारीक जानकारी नहीं है तो मैं आपको म्यूचुअल फंड या शेयर बाजार में निवेश की सलाह नहीं दूंगा। यह निवेश ऐसे काम में होना चाहिए जहां आपकी व्यक्तिगत उपस्थिति आवश्यक न हो। ऐसे निवेश के कई तरीके हैं। आप कोई छोटा-सा घर खरीद कर किराए पर उठा सकते हैं, रिक्शा, ऑटो-रिक्शा, कार आदि खरीद कर किराए पर दे सकते हैं। कोई ऐसा व्यवसाय कर सकते हैं जहां आपके कर्मचारी ही सारा काम संभाल लें और आपको उस व्यवसाय से होने वाला लाभ मिलता रहे। पुस्तकें लिख सकते हैं जिसकी रॉयल्टी मिलती रहे, मकान, दुकान या कार्यालय पर मोबाइल कंपनी का टावर लगवा सकते हैं जिसका किराया आता रहे।

इससे होने वाली आय पेंशन की तरह है जहां काम भी नहीं करना पड़ता और लगातार आय का साधन भी बन जाता है। यह आपकी समृद्धि की ओर छोटा-सा पहला कदम है। धीरे-धीरे योजनाबद्ध ढंग से ऐसे निवेश बढ़ाते रहेंगे तो आपकी अतिरिक्त आय इतनी बढ़ जाएगी कि इस बढ़ी आय से कार, मकान या छुट्टियों पर किए जाने वाले खर्च के लिए आपको बैंक से कर्ज नहीं लेना पड़ेगा, कर्ज पर ब्याज नहीं देना पड़ेगा और कर्ज न चुका पाने का डर भी नहीं सताएगा। इसके बावजूद आपको पैसे की परेशानी से नहीं जूझना पड़ेगा। इस योजना पर काम करने से आप सिर्फ अमीर दिखेंगे ही नहीं, सचमुच के अमीर हो जाएंगे। यदि आपको लाटरी से, ‘कौन बनेगा करोड़पति’ जैसे किसी शो से, अमीर जीवनसाथी से विवाह से या किसी अमीर रिश्तेदार की विरासत मिलने की उम्मीद नहीं है तो असली अमीरी और स्थायी समृद्धि के लिए आपको इसी योजना पर काम करना चाहिए। स्थायी समृद्धि का यही एक मंत्र है जो विश्वसनीय भी है और अनुकरणीय भी जरूर है।

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