कारोबार की आड़ में मौत पर सौदेबाजी से सरकार व न्यायलय को सख्ती से निपटना चाहिए

-अशोक भाटिया-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

देश में चल रही महामारी में जहाँ सरकार, सामाजिक संस्थाए, उद्योगपति. विदेश में रहने वाले भारत प्रेमी हर प्रकार की मदद कर रहे है ऐसे में कुछ असामाजिक तत्व इस अवसर को भुनाने में लगे है। राजधानी दिल्ली के लोदी कालोनी इलाके के साथ ही खान मार्केट इलाके के ‘खानचाचा’ और ‘टाऊनहाल’ रेस्टारेंटों में आक्सीजन कंस्ट्रेटरों की जमाखोरी का जो भंडाफोड़ हुआ है उससे साफ है कि मानवीय त्रासदी की इस घड़ी में मानव की जान की तिजारत की जा रही है। इन रेस्टोरेंटो का मालिक एक ही व्यक्ति है जो अभी तक फरार बताया जा रहा है। जरूरी है कि इस फरारी का पर्दाफाश इस तरह किया जाये कि पूरे देश में यह सन्देश जाये कि जीवनोपयोगी चिकित्सीय औषधियों या उपकरणों की जमाखोरी करने वालों के साथ वही सुलूक किया जायेगा जो किसी मुल्क से गद्दारी करने वाले के साथ किया जाता है। पुलिस ने इस मामले में अभी तक रेस्टोरेंटों के कुछ कर्मचारियों को गिरफ्तार किया है जबकि इस खूंखार माफिया का सरगना अभी तक फरार बताया जा रहा है। यदि वह अपने ऊंचे रसूखों की वजह से पुलिस की पकड़ में आने से बच रहा है तो हमारी न्यायपालिका को इसका स्वतः संज्ञान लेते हुए आवश्यक कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। यह चिकित्सा इमरजेंसी का समय चल रहा है और इस दौरान ऐसी कोई भी ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जा सकती जिससे उन लोगों की जान बचाने में बाधा आये जो आक्सीजन की कमी से अपनी जिन्दगियां खो रहे हैं।

यह कैसी विडम्बना है कि जब देश में कई स्वयंसेवी संस्थाएं आक्सीजन लंगर लगा रही हैं और सामर्थ्यवान लोग पीडि़तों की जान बचाने के लिए अपने खजाने तक खोल रहे हैं और समाजसेवी राजनीतिक व धार्मिक संस्थाएं कोरोना से मुसीबत जदा लोगों की रात-दिन सेवा में लगे हुए हैं तो कुछ लोग ‘जिन्दगी की तिजारत’ तक करने से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे अपराध को किस श्रेणी में डाला जाये जो किसी आदमी को अपनी जिन्दगी बचाने के लिए किसी लालची और बेइमान आदमी की तिजोरी भरने के लिए मजबूर करता है ? निश्चित रूप से यह कार्य विधि विशेषज्ञों का है और उन पर जिम्मेदारी है कि वे फौजदारी कानून के तहत उन पर ऐसी दफाएं लगायें जिससे हर आदमी यह समझ सके कि जिन्दगी की तिजारत करना भारत में नामुमकिन है।

सबसे बड़ी सोचने वाली बात यह है कि रेस्टोरेंट कारोबार की आड़ में मौत पर सौदेबाजी की गई। उसका अभी तक गिरफ्तार न होना भी यह बताता है कि अपने ऊंचे रसूखों के चलते वह जिन्दगी जीने के हक को भी व्यापार में बदल सकता है। इसलिए बहुत आवश्यक है कि देश की न्यायपालिका को पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए सर्वप्रथम उसकी गिरफ्तारी का आदेश पुलिस को देना चाहिए और साबित करना चाहिए कि इस देश में कानून से ऊपर कोई भी रसूखदार किसी भी सूरत में नहीं हो सकता। ‘असली’ सवाल ‘असली’ मुजरिम को पकड़ने का है। इसी प्रकार कुछ दिनों पहले एक चैनल ने देश के कुछ राज्यों में रेमडेसिविर इंजैक्शन की कालाबाजारी और जमाखोरी होने का पर्दाफाश किया था। इस मामले में कई शहरों में कुछ लोग पकड़े भी गये थे। मगर हकीकत यह भी है कि अब भी कई बड़े शहरों में इस इंजैक्शन की कालाबाजारी हो रही है और इसके दाम बीस-बीस गुना अधिक तक लिये जा रहे हैं। यह इंजैक्शन महाराष्ट्र से गायब हो चुका है और यहां के लोग इसे तेलंगाना राज्य से कालाबाजारी से खरीद कर ला रहे हैं। यह सब हमारी आंखों के सामने ही हो रहा है।
सवाल मानवीय संवेदनाओं का भी है क्योंकि किसी के ‘गम’ की मुनाफाखोरी करने के लिए सबसे पहले ये संवेदना ही दम तोड़ देती है। राष्ट्र समाज और इसके लोगों से ही बनता है और जिस देश में लोग समाज पर मुसीबत पड़ने के समय मुनाफा कमाने की तजवीज भिड़ाते हैं तो समझ लेना चाहिए कि उस समाज को स्वयं सभ्य सिद्ध करने के लिए अपने भीतर सफाई की जरूरत होती है। कानून समाज को सभ्य बनाने की गरज से ही बनाये जाते हैं अतः समाज की भी जिम्मेदारी होती है कि वह अपने बीच पनप रहे मुनाफाखोरों को उनकी सही जगह पर पहुंचाने में कानून की मदद करे। मानवता के अपराधी हमारे समाज के बीच ही फरार कैसे रह सकते हैं? ऐसे राष्ट्र विरोधी व्यक्ति को तो पुलिस को अब तक जमीन खोद कर भी निकाल लेना चाहिए था।

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