राजनैतिकशिक्षा

वर्षों से लंबित कृषि सुधार की मांग को पूरा करेगा कृषि कानून

-अनूप पौराणिक-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ऐसी विचारधारा के व्यक्ति हैं जो अपनी निर्णय क्षमता और बड़े फैसलों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई बड़े निर्णय लिए हैं चाहे वो निर्णय सवर्ण आरक्षण का हो, राममंदिर निर्माण का हो या धारा 370 हटाने का, देशहित और विकास के लिए मोदी ने कई फैसले लिए हैं। उनका हर निर्णय एक नए भारत के निर्माण का कदम है। इसी कड़ी में मोदी ने सितंबर में एक और बड़ा निर्णय लिया, वो था कृषि कानून लागू करने का। मोदी एकलौते ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने किसानों की इस दशा को बदलने के बारे में गहन विचार किया और संसद में कृषि कानून पारित करवाने का निर्णय लिया। कानून पारित हो गया और लागू भी। लेकिन कृषि कानून लागू होने के साथ ही किसान आंदोलन के नाम पर पंजाब और हरियाणा के कुछ किसान संगठन इस कानून का विरोध कर रहे है और विपक्षी दल इस विरोध को हवा देने का काम कर रहे हैं। कृषि सुधार कानूनों को वापस लेने में जो राजनैतिक दल मांग कर रहे है वे खुद जब सत्ता में रहे तो उन्होंने इस कृषि कानून का समर्थन करते हुए लागू करने की वकालत की। भारत में कृषि सुधार की मांग वर्षों से की जा रही थी वर्तमान की मोदी सरकार ने किसान, कृषि के सुधार हेतु संसद में तीन विधेयकों को पारित किया है ‘ये तीनों विधेयक कृषि क्षेत्र के सुधार हेतु ऐतिहासिक कदम क्यों है आइए एक-एक कर जानते है कृषि कानून से जुडे सारे सवालों का जवाब।

कृषि कानून है क्या और नए कृषि कानून की जरुरत क्यों पड़ी?
वर्ष 2016 में बरेली में भाषण देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि उनकी सरकार का ये लक्ष्य है कि हर किसान की आय 2022 तक दोगुनी हो जाए। जब मोदी जी ये बोल रहे थे तो उनके दिमाग कुछ प्लानिंग थी जो इतनी आसान नहीं थी, लेकिन फिर भी मोदी उसे वास्तविक रूप देना चाहते थे, क्योंकि अब तक किसानों के विकास की बातें तो की जाती रही थी लेकिन सब कुछ कागजी ही था। इसके लिए कोई ठोस कदम जरुरी था। उनके दिमाग में इसके लिए सात स्टेप्स थे। उनमें से एक कदम था किसानों को ओपन मार्केट से जोड़ने का। किसानों को पारंपरिक ढांचे से बाहर निकलने का अवसर देना ताकि अगर वे चाहें तो ओपन मार्केट में बिना किसी बंधन के अपनी फसल को मनचाही कीमत पर बेच पाएं।

किन कानूनों पर फैलाया जा रहा भ्रम

कानून 1ः कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य अधिनियम 2020ः
इस नाम में पहला पक्ष है कृषक उपज यानी किसान द्वारा उपजाई गई फसल इसमें फल, सब्जी व दलहन के साथ ही पशु पालन और अन्य फाॅर्मिंग एक्टिविटी भी शामिल है। दूसरा पक्ष है व्यापार यानी खरीदना और बेचना जैसे अगर कहीं टमाटर 20 रुपए किलो है तो उसे खरीद कर कोई कहीं किसी और जगह उसे 30 रुपए किलो में बेच देता है और कोई अन्य उसे 40 रुपए किलो में खरीद कर किसी दूर-दराज के क्षेत्र में 50 रुपए किलो में बेच देता है तो इसे ट्रेड कहा जाता है। ये कानून कहता है कि अब कुछ ऐसा करेंगे कि किसान को लाभ ज्यादा हो और फसलों को बेचना आसान हो। इसके लिए पहला जरुरी कदम था एपीएमसी प्रावधान को खत्म करना।

ये एपीएमसी क्या है-

एपीएमसी का सीधा सा अर्थ है कृषि उत्पाद बाजार समिति। जब भारत आजाद हुआ तो किसान शोषित थे, उन्हें साहूकारों के अत्याचारों से बचाने के लिए एपीएमसी नाम का एक उपाय बनाया गया। जिसके तहत स्टेट लेवल पर एक प्रावधान बनाया गया जिसके तहत हर किसान को अपनी पहली फसल एपीएमसी को बेचना होती थी। एपीएमसी के तहत हर नगर में एक मंडी होती है जिसमें कृषि उत्पादों का व्यापार होता है वही खरीददार होते हैं और बिचैलिये भी। इससे किसानों का एक तरह का शोषण तो खत्म हो गया। मगर दूसरी तरह के शोषण ने जन्म ले लिया वो था बिचैलियों का शोषण। जिसके कारण ही भारतीय किसान कभी गरीबी से उबर ही नहीं पाया। यही कारण रहा कि प्रधानमंत्रीजी ने कृषि कानून पारित करने का निर्णय लिया। इस कानून का लाभ ये होगा कि अब किसानों के पास फ्रीडम ऑफ चॉइस है। जिसके कारण अब किसान पूरे देश में कहीं भी अपनी फसल को बेच सकता है। जहां उसे उसकी फसल का उचित दाम मिले। जबकि एपीएमसी प्रावधान के तहत बंधन था। किसान अपनी फसल सिर्फ अपने एपीएमसी क्षेत्र में ही बेच सकता था जबकि हो सकता है कि उसी उत्पाद का उसे देश के किसी अन्य भाग में कई गुना ज्यादा भाव मिल रहा हो। इसके अलावा अब किसान ऑनलाइन भी अपनी फसल बेच सकता है, जो अब तक नहीं होता था। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि जब अन्य व्यापारी ऑनलाइन अपना सामान बेचकर अच्छी कीमत पा सकते हैं तो किसान क्यों नहीं। जैसे मान लीजिए एक एप है जिसमें किसान को बिना बिचैलिये के बिना एपीएमसी जाए अपनी फसल बेचने का मौका मिल रहा है और मंडी से बेहतर कीमत उसे ऑनलाइन मिल रही है तो किसान को सीधा फायदा मिलेगा। जैसे अब तक उसे जिस फल का 20 रुपए किलो मिल रहा था। बिचैलिए के हठ जाने पर उसे 30 रुपए किलो मिलेगा तो इससे उसकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा और उसे अपनी मेहनत का ज्यादा मुनाफा भी मिलेगा। साथ ही इस व्यापार पर राज्य सरकार कोई टैक्स नहीं लगा पाएगी। इसलिए एपीएमसी का बंधन खत्म होने से किसान को हर तरह से लाभ ही लाभ होगा।

कई राज्यों में पहले से ही है लागू एपीएमसी

2003 में ही अटलबिहारी सरकार ने राज्य सरकारों से निवेदन किया और मॉडल एपीएमसी लागू करने के प्रयास आरंभ कर दिए ताकि फल और सब्जियों जैसी फसलों का किसान को अधिक से अधिक मूल्य मिल पाए। इसका फायदा ये हुआ कि 2016 के आते-आते अधिकतर राज्य सरकारों ने इसे लागू कर दिया। जैसे दिल्ली की बात कि जाए तो वहां फल व सब्जी को एपीएमसी से मुक्त कर दिया गया। कर्नाटक ने तो काफी हद तक कॉम्पिटिशन बाजार आरंभ कर दिया जिसे रायतु बाजार कहा जाता है और ये काफी लोकप्रिय भी है। 2006 से ही बिहार में भी एपीएमसी की बाध्यता लगभग खत्म कर दी गई। जबकि बिहार की कुछ पार्टियां अब विरोध कर रही हैं। ठीक वैसे ही महाराष्ट में भी ये कानून लगभग पहले से ही लागू है और गौरतलब है इसे कांग्रेस की विलासराव देशमुख सरकार ने लागू किया था।

कानून नं 2- कृषक कीमत आश्वासन कृषि सेवा पर करार अधिनियम2020-

जैसे- अगर किसी विवाह में खाने का काम हो तो उसका पहले ही करार कर लिया जाए तो सर्विस देने वाला करार के अनुसार सामान बनाता है और जितनी मात्रा का आर्डर होता है उतना ही सामान बनाता है तो इससे व्यापारी और खरीददार दोनों का फायदा होता है। ठीक वैसे ही अब किसान अनुबंध कृषि भी कर सकता है जो कि पहले एपीएमसी के कारण संभव नहीं था। इस कानून के तहत दो पक्ष होंगे एक स्पांसर और दूसरा किसान। इसमें लिखित कॉन्ट्रैक्ट होगा जिससे किसान को उत्पादन में आसानी होगी और आर्थिक लाभ भी अधिक होगा। कानून यह भी ग्यारंटी देता है कि अगर कोई आपात परिस्थिति हुई तब भी किसान को कोई आर्थिक नुकसान न हो उसे अपनी मेहनत का पूरा पैसा मिले। एक फायदा ये भी है कि इस कानून के तहत अनेक किसान एक साथ मिलकर भी कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग भी कर सकते हैं। अर्थव्यवस्था सभी के लिए अनुकूल बनी रहे इसलिए सरकार किसान को उसकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रदान करती है। यह व्यवस्था इस कानून के तहत रद्द नहीं होगी। सरकार लगातार अपना पक्ष इस मुद्दे पर रख रही है। सरकार का कहना है कि किसान निश्चिन्त रहे एमएसपी खत्म नहीं की जा रही है।

कानून नं 3- आवश्यक वस्तुएं संशोधन अधिनियम 2020-

इस कानून के तहत सामान्य स्थितियों में खाद्य वस्तुओं का भंडारण किया जा सकेगा। आपातकालीन परिस्थितयों में ऐसा नहीं किया जा सकेगा ये कानून भी किसानों के हित में है ताकि खरीरदार अधिक से अधिक किसानों की उपज खरीदे और किसान को अधिक से अधिक दाम प्राप्त हो, क्योंकि हरितक्रांति के बाद किसान की उपज बहुत बढ़ गई मगर उसकी आमदनी उस दर से नहीं बढ़ी जबकि चीन व साउथ कोरिया जैसे देशों में अगर कोई सब्जी 40 रुपए किलो है तो उसमें से 32 रुपए किसान को मिलते हैं जबकि इसकी तुलना अगर भारत से कि जाए तो उसे सिर्फ 6 रुपए मिलते हैं। इस कानून के आने से ये अंतर घटेगा।

कृषि कानूनों पर विरोध करने वालों का दोहरा रुख जगजाहिर

वर्तमान में किसान आन्दोलन का समर्थन करने वाले जितने भी राजनीतिक दल है वें सभी दल पहले इस कानून को देश के किसानो के लिए अमृत मान रही थे, परंतु आज सबसे ज्यादा विरोध वही नेता ही कर रहे हैं। कांग्रेस के 2019 के लोकसभा चुनाव घोषणा-पत्र में किसानों से वादा किया गया था कि एपीएमसी एक्ट को रद्द किया जाएगा और किसानों की उपज की खरीद के लिए अतिरिक्त सेट-अप का भी वादा किया गया था, जैसा कि नए कानून में प्रस्तावित है। 2016 में ‘आप’ के घोषणा-पत्र में वादा किया गया था कि एपीएमसी एक्ट में संशोधन के जरिए ‘किसानों को राज्य के अंदर और बाहर अपनी पसंद के खरीदार और बाजार में अपनी उपज बेचने की अनुमति दी जाएगी’ और ‘किसानों को बेहतर मूल्य’ दिलाया जाएगा। कांग्रेस अपने सहयोगी शरद पवार के साथ नए कृषि कानूनों का विरोध करती रही है। लेकिन यूपीए सरकार में बतौर कृषि मंत्री पवार ने कई मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर कृषि सुधारों पर जोर दिया था, जिनमें एपीएमसी में बदलाव भी शामिल था। कुल मिलाकर कृषि कानून को लेकर विपक्षी दलों का विरोध और किसान आन्दोलन को समर्थन देना यह दर्शाता है की यह विरोध सिर्फ विरोध के लिए है। अब किसानों यह समझने की जरूरत है की कौन उनका हितेषी है और कौन उनके कंधो का उपयोग कर रहा है।

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