इस महामारी के दौर में कालाबाजारी करने वालों को सरे आम कड़ी सजा मिले

-अशोक भाटिया-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

टीवी चैनलों पर श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों में लगी लाशों की भीड़ को देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कोरोना की दवाइयों, इंजेक्शनों और अस्पताल के पलंगों के लिए जो कालाबाजारी चल रही है, वह मानवता के माथे पर कलंक का टीका है। अभी तक एक भी कालाबाजारी को चैराहे पर सरे-आम नहीं लटकाया गया है। 2 -4 को कड़ी सजा मिले तो यह सबके लिए सबक बन जाएगा । क्या हमारी सरकार और हमारी अदालत के लिए यह शर्म की बात नहीं है ? होना तो यह चाहिए कि इस आपातकाल में, जो भारत का आफतकाल बन गया है, कोरोना के टीके और उसका इलाज बिल्कुल मुफ्त कर दिया जाए। पिछले बजट में जो राशि रखी गई थी और प्रधानमंत्री परवाह-कोष में जो अरबों रुपये जमा हैं, वे कब काम आएंगे ? निजी अस्पताल भी यदि दो-चार महीने की कमाई नहीं करेंगे तो बंद नहीं हो जाएंगे।
यह अच्छी बात है कि हमारी फौज और पुलिस के जवान भी कोरोना की लड़ाई में अपना योगदान कर रहे हैं। अब भारत को दूसरे देशों के सामने दवाइयों के लिए झोली पसारनी पड़ रही है। यदि महामारी इसी तरह बढ़ती रही तो कोई आश्चर्य नहीं कि अर्थव्यवस्था का भी भट्ठा बैठ जाए और करोड़ों बेरोजगार लोगों के दाना-पानी के इंतजाम के लिए भी संपन्न राष्ट्रों के आगे हमे गिड़गिड़ाना पड़े।
आजकल रोजाना साढे़ तीन लाख कोरोना संक्रमण के मामले पूरे देश से आ रहे हैं और 2700 से ज्यादा लोग रोजाना मर रहे हैं। इसमें हर राज्य के आंकड़े अलग हो सकते हैं मगर एक बात साझा है कि जो भी बीमार हो रहा है या मर रहा है वह ‘भारतीय’ ही है। इन भारतीयों को बचाने के लिए ही हमें अपने सभी राजनीतिक आग्रह और वरीयताएं त्यागनी होंगी और युद्ध स्तर पर वह तैयारी करनी होगी जिससे हर नागरिक में यह भरोसा पैदा हो कि पूरी लोकतान्त्रिक व्यवस्था उसकी सुरक्षा में खड़ी हुई है। आगामी 1 मई से 18 वर्ष से 45 वर्ष तक के नागरिकों के कोरोना वैक्सीन लगनी शुरू हो जायेगी। अभी तक 45 वर्ष से ऊपर के केवल 12 करोड़ के लगभग लोगों को ही वैक्सीन लगी है जबकि इनकी कुल संख्या 27 करोड़ से ऊपर की है। यह कार्य केन्द्र सरकार निःशुल्क आधार पर कर रही है। राज्यों की यह जिम्मेदारी है कि वे 18 से 45 वर्ष की आयु के लगभग 35 करोड़ लोगों के यह टीका सीधे वैक्सीन उत्पादक कम्पनियों से खरीद कर लगायें । वैक्सीन कम्पनियां इसकी कीमत अपने तय किये गये दामों पर प्राप्त करेंगी। जबकि लगभग प्रत्येक राज्य अपना बजट प्रस्तुत कर चुका है और उसने वैक्सीन खरीदने का इसमें कोई प्रावधान नहीं किया है। राज्यों की इस तात्कालिक आर्थिक जरूरत को कैसे पूरा किया जायेगा यह सवाल भी खुला हुआ है। सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या वैक्सीन उत्पादक कम्पनियां आगामी 1 मई से राज्य सरकारों को वैक्सीन उपलब्ध करा पायेंगी? क्योंकि कोविशील्ड वैक्सीन की उत्पादक कम्पनी ‘सीरम इंस्टीट्यूट’ ने इनसे साफ कह दिया है कि आगामी 15 मई तक वह वैक्सीन सप्लाई नहीं कर सकती । इसकी वजह पहले से ही आपूर्ति करने के अनुबन्ध हैं। जाहिर है कि ये आपूर्ति आदेश केन्द्र सरकार के ही हैं। ऐसे में राज्य सरकारें 1 मई से वैक्सीन लगाने की शुरूआत चाह कर भी नहीं कर सकती हैं। इससे विभिन्न राज्यों में वैक्सीन लगवाने के लिए आपाधापी और मारामारी होने का अंदेशा अभी से व्याप्त हो रहा है। अतः सबसे पहला काम सभी सरकारों को मिल कर यह करना होगा कि अन्तिम समय में अराजकता के माहौल से बचने के लिए पहले से ही वैक्सीन सप्लाई की समुचित व्यवस्था करनी होगी और ऐसा तन्त्र विकसित करना होगा जिससे आम नागरिकों में निराशा न फैल सके। यह कार्य कोई मुश्किल नहीं है केवल वैक्सीन उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है।
भारत इस समय पूरी दुनिया की ‘फार्मेसी’ कहा जाता है। यहां का दवा व औषिध उद्योग विश्व के गरीब देशों को औषधि सप्लाई करने में नम्बर एक है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में हमने इस क्षेत्र में जो तरक्की की है उसका श्रेय निश्चित रूप से निजी कम्पनियों को ही जाता है। अतः ऐसा कोई कारण नहीं है कि देश के विभिन्न हिस्सों में कोरोना वैक्सीन उत्पादन की और इकाइयां स्थापित ‘औषध उत्पादन नियमों’ के तहत न लग सकें। वह स्थिति बहुत दुखद होगी जब 18 से 45 वर्ष तक की भारत की युवा आबादी वैक्सीन लगवाने जाये और उसे लम्बी प्रतीक्षा सूची में डाल दिया जाये। अभी हमारे पास समय है और हम पहले से ही आकस्मिक सहायता तन्त्र खड़ा कर सकते हैं। यह कार्य निश्चित रूप से केन्द्र व राज्य सरकारों को मिल कर ही करना होगा। इसी प्रकार ‘रेमडेसिविर’ इंजेक्शन के वितरण की व्यवस्था हमें विभिन्न राज्यों में कोरोना की भयावहता को देखते हुए करनी होगी और हर नागरिक को विश्वास दिलाना होगा कि इसकी कमी की वजह से उसे तड़पने नहीं दिया जायेगा। आक्सीजन सप्लाई में अनियमितता पैदा होने से हम सबक सीख सकते हैं और ऐसा ढांचा खड़ा कर सकते हैं कि आगे कोरोना के इलाज के लिए जरूरी किसी भी आवश्यक औषधि या यन्त्र में कमी न आने पाये। ऐसा नहीं है कि हम प्रबन्धन में किसी अन्य विकसित कहे जाने वाले देश से पिछड़े हुए हैं बल्कि हकीकत यह है कि पूर्व में विभिन्न टीकाकरण योजनाएं चला कर हम सिद्ध कर चुके हैं कि भारत का चिकित्सा तन्त्र इसके गांवों तक में अपनी गहरी पैठ रखता है। वर्तमान संकट पर भी भारत काबू रखने की पूरी क्षमता रखता है क्योंकि इसके लोग हमेशा आपदकाल में अपनी जिम्मेदारी निभाने से पीछे नहीं हटते। पूरे देश में जिस तरह ‘आक्सीजन लंगर’ खुलने शुरू हो गये हैं वह इसी बात का प्रमाण है कि भारत में मा न वता अभी जिन्दा हैं ।इस नाजुक मौके पर यह जरूरी है कि हमारे विभिन्न राजनीतिक दल आपस में सहयोग करें और केंद्र तथा राज्यों की विपक्षी सरकारें भी सांझी रणनीति बनाएं। एक-दूसरे की टांग खींचना बंद करें। किसान नेताओं के प्रति पूर्ण सहानुभूति रखते हुए भी उनसे अनुरोध है कि फिलहाल वे अपने धरने स्थगित करें। राजनीतिक दलों के करोड़ों कार्यकर्ता मैदान में आएं और आफत में फंसे लोगों की मदद करें। यह काल आपातकाल से भी बड़ी आफत का काल है। आपातकाल में सिर्फ विपक्षी नेता तंग थे लेकिन इस आफतकाल में हर भारतीय सांसत में है।

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