कोरोना की ऐसी भयावह वापसी के लिए कौन जिम्मेदार

सुरेन्द्र कुमार किशोरी

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

आज कोरोना महामारी अपने विकराल रूप में सबके सामने है। लोग मर रहे हैं, परिवार के सदस्य परिजनों को खोने के गम में पथराई आंखों से शून्य में निहार रहे हैं। श्मशान में शवदाह की अग्नि जल रही है, श्मशान की भयावहता को देख आमजन की रुह कांपे नहीं, इसलिए श्मशान की दीवारें ऊंची की जा रही है, नए-नए कब्रिस्तान तैयार किये जा रहे हैं। पिछले साल यह स्थिति अमेरिका, इटली तथा अन्य दूसरे देश में हुई थी, तब हम इसे लेकर गंभीर नहीं थे। हम उस समय यह समझ नहीं पाए कि मौजूदा दौर में भारत में सक्रिय कोरोना का स्ट्रेन बेहद कमजोर है, इसलिए इतना पैनिक नहीं है। लेकिन आज के समय में अपने देश में सक्रिय स्ट्रेन म्यूटेशन के पश्चात काफी स्ट्रांग हो चुका है तो इसके कारण मोर्टेलिटी रेट काफी बढ़ता जा रहा है। हमारे पास सालभर का समय था, लेकिन हम संभले नहीं तो अब भुगतने की बारी भी तो हम ही लोगों की है।

आज स्थिति क्या है, कोविड पीड़ित अस्पताल में बेड के लिए जूझ रहे हैं। रेमिडसिवर जैसी जीवन रक्षक दवाई की उपलब्धता के लिए जूझ रहे हैं। वेंटिलेटर तो तब दूर की कौड़ी नजर आती है जब कोविड पीड़ित अस्पतालों में ऑक्सीजन गैस की कमी से जूझते हुए दिखाई देते हैं। एनएमसीएच पटना के अधीक्षक डॉ. विनोद कुमार सिंह को ऑक्सीजन की कमी के कारण व्यथित होकर अपने पद से इस्तीफा की पेशकश करनी पड़ी। आखिर इस स्थिति में सिस्टम के फेल्योर के लिए जिम्मेदार कौन है। आखिर महामारी एक्ट के लागू होने के बाद महामारी पीड़ितों के लिए स्वास्थ्य सुविधा बहाल रखने की जिम्मेदारी किसकी है। पिछले साल जब कोरोना का प्रथम लहर कमजोर पड़ गया था, तो कोरोना नियंत्रण को लेकर लोग पीठ थपथपा रहे थे। उसी दौरान चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों ने निकट भविष्य में दूसरी लहर की चेतावनी दी थी। सरकार के पास प्रथम लहर का मुकम्मल ब्लू प्रिंट था और उस ब्लू प्रिंट के सहारे दूसरी लहर से निपटने की योजना बनाने के लिए तकरीबन छह महीने का समय। लेकिन शायद सरकार ने यह समझ लिया कि जिस तरह से प्रथम लहर में इंसानी जान की व्यापक क्षति नहीं हुई, उसी तरह से दूसरी लहर को भी भारत झेल लेगा।

ऊपर से वैक्सीन का आ जाना सरकार और आम लोगों की निश्चिंतता को बढ़ाने वाली थी। सरकार ने वैक्सीन के बारे में कुछ इस तरह से प्रचार किया कि आम लोग के समझ में यह बात बैठ गयी कि वैक्सीन के आ जाने भर से ही कोरोना से अब उसका कुछ बिगड़ नहीं सकता है। परिणाम आम लोग संयम और सतर्कता तथा मास्क और व्यक्तिगत स्वच्छता से कन्नी काटने लगे तथा सरकार चुनावी राजनीति में व्यस्त हो गई। यहीं सबसे बड़ी चूक हुई हैै, जिसका खामियाजा अब भारत भुगत रहा है, यह चूक ही इस कोरोना काल में सबसे बड़ा काला अध्याय हैै। सामाजिक और समसामयिक मुद्दों को लेकर मुखरता से अपनी बात कहने-लिखने वाले डॉ. अभिषेक कुमार कहते हैं कि साल भर का समय मिलने के बावजूद सरकार द्वारा ऑक्सीजन जैसी जीवन रक्षक गैस की उत्पादकता और उपलब्धता सुनिश्चित क्यों नहीं कि गई। पीएम केयर फंड में जमा राशि से खरीदे गए वेंटिलेटर की उपलब्धता आम जनों के लिए हितकर साबित क्यों नहीं हो रही है।

कल तक तो हम लैब की क्षमता को लेकर अपनी पीठ थपथपा रहे थे, लेकिन आज हालात ऐसी है कि आरटी-पीसीआर रिपोर्ट के लिए छह से आठ दिन का समय लग रहा है। आरटी-पीसीआर रिपोर्ट नहीं रहने पर मरीज को हॉस्पिटल एडमिट नहीं कर रहा है। तब तक मरीजों का क्या होगा, होम आइसोलेशन के नाम पर मरीजों को समय पर चिकित्सीय परामर्श उपलब्ध नहीं करवाकर कम्प्यूटर सिस्टम से संवाद करवाया जा रहा है। जोखिम क्षेत्र (कंटोनमेंट जोन) में आवश्यक खाद्य पदार्थ और दवाई की उपलब्धता के लिए किसी प्रतिनिधि की नियुक्ति क्यों नहीं कि जा रही है। क्या कंटोनमेंट जोन में होम आइसोलेशन में रह रहे संक्रमित व्यक्ति खुद बाजार जाएं, सिस्टम के इस फेल्योर के लिए जिम्मेदार कौन है। यह जिम्मेदारी तो उसी की बनेगी जो कल तक कमजोर कोरोना स्ट्रेन को नियंत्रित कर लेने का दावा कर अपनी पीठ थपथपा रहे थे। इसके अतिरिक्त हम आम जन भी जिम्मेदार हैं, आज की भयावह स्थिति के लिए। हम भी तो संयमित नहीं रहे, सतर्क और जागरूक बने रहने की तो बात तो बहुत दूर की कौड़ी है।

कोरोना के प्रथम लहर के दौरान हम बहुत हद तक संयमित थे, भीड़-भाड़ वाले जगहों से परहेज कर रहे थे, अनावश्यक यात्रा से बच रहे थे, मास्क और सेनिटाइजर के उपयोग के प्रति सतर्क थे, कोरोना के प्रति चेतनशील और जागरूक थे। हम काढ़ा पीते थे, योगा करते थेे, हमारे अंदर डर था, लेकिन जैसे ही वैक्सीन आई कि हमारा डर काफूर हो गया और खुद को सुपरमैन समझने लगे। बेखौफ होकर कहीं की भी यात्रा पर निकलने लगे, कहीं भी अनावश्यक भीड़ का हिस्सा बनने लगे, मास्क और सेनिटाइजर से नाता तोड़ लिया। परिणाम हम खुद भी संक्रमित होने लगे और सुपर स्प्रेडर बनकर दूसरों को भी संक्रमित करने लगे।

काश कि हम आम जन कोरोना को गंभीरता से लेते और अपने स्वास्थ्य के प्रति चेतनशील बने रहते तो आज स्थिति इतनी भयावह नहीं होती। लाशों का अंबार नहीं लगता। अभी भी वक्त हाथ से फिसला नहीं है, हम गिरे जरूर हैं, लेकिन हमारे अंदर संभलने का मद्दा भी पर्याप्त है। जरूरत है फिर से सोच को सकारात्मक रखकर अपनी समस्त ताकत के साथ इस अदृश्य दुश्मन से दो-दो हाथ करने की। लेकिन ध्यान यह भी रखना है कि हमारे हाथ में शस्त्र के रूप में अब भी मास्क और सेनिटाइजर ही है। वैक्सीन रूपी कवच का साथ भी है।

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