उगते सूरज को सभी करते नमन!

-डॉ. भरत मिश्र प्राची-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

कोई आता है नहीं उजड़े चमन, उगते सूरज को सभी करते नमन। इस तरह की स्थिति राजनीति में सदैव उभरती रही है। राजनीति में जिस राजनीतिक दल की स्थिति कमजोर नजर आती है उधर टूट – फूट होना स्वाभाविक है। जिधर की स्थिति मजबूत होती है उधर राजनेताओं के आने का क्रम लगातार बना रहता है। जहां स्थिति मध्य में होती है वहां खरीद फरोक्त की संभावना प्रबल नजर आती हे। भारतीय राजनीति में इस तरह के बदलते हालात आसानी से देखे जा सकते है। इस तरह की अवसरवादी राजनीति में किसी पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता। कौन कब किधर चला जाय, कहना मुश्किल है। इसी कारण सत्ता भी बदलती रहती है।
वर्तमान समय में भारतीय राजनीति में भाजपा का सितारा बुलंदी पर जबकि कभी यह स्थिति कांग्रेस की हुआ करती थी। स्वतंत्रता बाद वर्षो तक सत्ता पर शासन करने वाली कांग्रेस आज दिन पर दिन कमजोर होती जा रही है जिससे इस राजनीतिक पार्टी से कोई न कोई बहाना ढ़ूंढ़कर बाहर निकलते एवं भाजपा की ओर जाते नेताओं को हर स्तर पर देखा जा सकता है। जहां तक गांधी परिवार के नेतृत्व का सवाल है वह आज से नहीं जब से कांगेस का भारतीय राजनीति में दबदबा रहा, सितारा बुलंद रहा गांधी परिवार का नेतृत्व एकमात्र बना रहा। इतिहास साक्षी है , जब भी कांग्रेस इस परिवार से अलग रही , बिखरती नजर आई। जिस सोनिया गांधी पर विदेशी होने की मोहर अन्य राजनीतिक दलों द्वारा लगाई जाती रही, उसी के नेतृत्व में कांग्रेस लगातर दो दशक सत्ता में बनी रही। पर आज जबसे भारतीय राजनीति में केन्द्र से कांग्रेस सत्ताविहीन हो गई तब से राज्यों की राजनीति पर भी इसका प्रतिकुल प्रभाव पड़ना शुरू हो गया। विधान सभा चुनावों में जहां कांग्रेस भाजपा को सत्ता से बेदखल कर सत्ता में आई वहां की राजनीति पर केन्द्र की सत्ता का प्रभाव पड़ना शुरु हो गया जिसके चलते कांग्रेस में वर्षो अपना वर्चस्व बनाये नेता सत्ताधारी भाजपा का हाथ पकड़ लिये, कुछ राज्यों की राजनीति डगमगा गई। इस तरह के परिवेश का शिकार तत्कालीन मघ्यप्रदेश की आम जनता द्वारा चुनी कांग्रेस सरकार हुई जहां फिर से आमजनता द्वारा नकारी गई भाजपा सत्ता में आ गई। इस तरह का प्रयोग राजस्थान में भी देखने को मिल सकता है जहां आम जनता द्वारा बहुमत कांग्रेस सरकार पर बार – बार संकट के बादल मड़राते देखे जा सकते। इस तरह के हालात से फिलहाल छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान की कांग्रेस सरकार बची हुई है पर कब शिकार हो जाय कह पाना मुश्किल है। यहां भी बगावती तेवर दिख रहे है। इन बगावती में कौन सी बूंद कांग्रेस से छिटक कर भाजपा मे जा मिले कुछ कहा नहीं जा सकता। कांग्रेस में इस तरह का फिलहाल कोई मजबूत नेतृत्व कहीं नजर नहीं आ रहा है जो छिटकती इन बूंदों को रोक सके। पंजाब में फिलहाल हुये सत्ता परिवर्तन की डोर कांग्रेस में बगावती तेवर को पैदा कर सकती है जिसका आगामी विधान सभा चुनाव पर फर्क पड़ सकता है। अवसरवादी राजनीति में जब इसकी गोद में पले, बढ़े हुये ही इसका आज पाला छोड़ रहे है तो आने वाले समय में कांग्रेस मजबूत हो सके ऐसा कहीं से नजर नहीं आ रहा है।
महात्मा गांधी ने जिस कांग्रेस की नींव डाली एवं स्वतंत्रता उपरान्त जिसके हाथ बागडोर सौंपी वह कांग्रेस परिवारवाद में सिमटकर इस तरह कमजोर हो जायेगी, बापू ने भी कभी सपनों में नहीं सोचा होगा। इसी कांग्रेस में गांधी परिवार से अलग हटकर कुशल नेतृत्व संभाले लालबहादुर शास्त्री ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन कांग्रेस की ये दशा होगी। कांग्रेस के दोनों महान नेताओं की जन्मतिथि संयोगवश एक हीं 2 अक्टूबर है। इस तिथि पर यह विचारणीय मुद्दा अवश्य है कि कांग्रेस की इस दशा के लिये कौन जिम्मेवार है। आज की आवसरवादी राजनीति जहां उगते सूरज को नमन करने की परम्परा है या वर्तमान नेत्त्व जो अपने से अलग हो रहे को रोक नहीं पा रहा है।

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