महंगे खाद्य तेलों की चिंताएं

-डा. जयंतीलाल भंडारी-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

इन दिनों महंगे खाद्य तेलों की चिंताओं के बीच केंद्र सरकार तिलहन के उत्पादन को बढ़ाकर खाद्य तेलों के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए रणनीतिक रूप से आगे बढ़ी है। विगत 18 अगस्त को सरकार ने 11040 करोड़ रुपए के वित्तीय परिव्यय के साथ राष्ट्रीय खाद्य तेल-पाम ऑयल मिशन (एनएमईओ-ओपी) की मंजूरी दी है। गौरतलब है कि देश में खाद्य तेलों के लिए प्रमुख रूप से पाम तेल, सरसों तेल और मूंगफली तेल का उपयोग किया जाता है। यदि हम पिछले एक वर्ष में खाद्य तेलों की खुदरा कीमतों को देखें तो पाते हैं कि पिछले एक वर्ष में सभी तेलों की कीमतों में औसतन करीब 60 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई है। सरकार ने खाद्य तेलों की कीमत घटाने के लिए तात्कालिक उपायों के तहत आयातित खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में कमी सहित अन्य सभी टैक्सों में रियायतें दी हैं। यही कारण है कि वैश्विक बाजार में पामोलिन और सोयाबीन की कीमतों में भारी वृद्धि की तुलना में भारत में इनकी कीमतों में बहुत कम वृद्धि दर्ज की गई है। खाद्य तेलों की बढ़ती हुई कीमतें और अपर्याप्त तिलहन उत्पादन देश की पीड़ादायक आर्थिक चुनौती के रूप में उभरकर दिखाई दे रहे हैं।

यद्यपि इस समय भारत में खाद्यान्न के भंडार भरे हुए हैं। देश गेहूं, चावल और चीनी उत्पादन में आत्मनिर्भर है, देश से इनका निर्यात भी लगातार बढ़ रहा है। लेकिन तिलहन उत्पादन में हम अपनी जरूरतों को पूरा करने लायक उत्पादन भी नहीं कर पा रहे हैं। देश में पिछले तीन दशक से खाद्य तेल की कमी दिखाई दे रही है। इस कमी को दूर करने के लिए घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए गए। यद्यपि तिलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए बनाई गई पीली क्रांति ने तिलहन उत्पादन बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन उपेक्षा होती गई। लेकिन उनसे कोई खास कामयाबी नहीं मिल सकी। हरित क्रांति के तहत जिस तरह से धान-गेहूं के बीजों पर काम हुआ, वैसा काम तिलहन के क्षेत्र में कम हुआ। परिणामस्वरूप देश तिलहन उत्पादन में पिछड़ता गया। जहां देश में आवश्यकता के अनुरूप तिलहन उत्पादन नहीं बढ़ा, वहीं दूसरी ओर जीवन स्तर में सुधार और बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद्य तेल की मांग बढ़ती गई। भारत में तिलहन की खपत की तुलना में कम उत्पादन होने से खाद्य तेलों के आयात पर भारत की निर्भरता लगातार बढ़ती गई है। वर्ष 1990 के आसपास देश खाद्य तेलों के मामले में लगभग आत्मनिर्भर था। फिर खाद्य तेलों के आयात पर देश की निर्भरता धीरे-धीरे बढ़ती गई और इस समय यह चिंताजनक स्तर पर है। खाद्य सचिव सुधांशु पांडे के मुताबिक इस समय भारत अपनी जरूरत के करीब 60 फीसदी खाद्य तेलों का आयात करता है। चूंकि खाद्य तेलों का घरेलू उत्पादन जरूरत की पूर्ति के लिए लगभग 40 फीसदी है। इसलिए यह अपर्याप्त तिलहन उत्पादन बाजार में खाद्य तेल के मूल्य को नियंत्रित नहीं कर पाता।

परिणामस्वरूप खाद्य तेल का अंतरराष्ट्रीय बाजार देश में खाद्य तेल के दाम को प्रभावित करता है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि कई देशों की बायोफ्यूल नीतियां भी खाद्य तेलों की तेज महंगाई का कारण बन गई हैं। उदाहरण के लिए भारत को पाम आयल का निर्यात करने वाले मलेशिया और इंडोनेशिया में पाम आयल से बायोफ्यूल और अमेरिका में सोयाबीन आयल से बायोफ्यूल का उत्पादन किया जा रहा है। चीन की बड़ी कंपनियां भी विश्व बाजार में बड़े पैमाने पर खाद्य तेल की खरीदी कर रही हैं। भारत में जहां पाम आयल की हिस्सेदारी 30 फीसदी से अधिक है, वहीं सोयाबीन आयल की हिस्सेदारी करीब 22 फीसदी है। ऐसे में खाद्य तेल के अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में बदलाव का असर खाद्य तेल की घरेलू कीमत पर तेजी से पड़ता है। पिछले एक वर्ष से खाद्य तेल के घरेलू बाजार पर वैश्विक खाद्य तेल बाजार की बढ़ी हुई कीमतों का काफी अधिक असर दिखाई दे रहा है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार देश में नवंबर 2020 से जुलाई 2021 के बीच 9370147 टन खाद्य तेल का आयात किया गया। स्थिति यह है कि कृषि प्रधान देश होने के बावजूद भारत को सालाना करीब 65000 से 70000 करोड़ रुपए का खाद्य तेल आयात करना पड़ रहा है। इतनी बड़ी विदेशी मुद्रा हर वर्ष इंडोनेशिया, मलेशिया, ब्राजील और अमेरिका आदि देशों के हाथों में चली जाती है।

भारत खाद्य तेलों का आयात करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश बन गया है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों से देश में तिलहन उत्पादन को प्रोत्साहन देकर तिलहन का उत्पादन बढ़ाने एवं खाद्य तेल आयात में कमी लाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के मुताबिक वर्ष 2020-21 के दौरान देश में कुल तिलहन उत्पादन रिकॉर्ड 36.10 मिलियन टन अनुमानित है, जो वर्ष 2019-20 के उत्पादन की तुलना में 2.88 मिलियन टन अधिक है। चालू वर्ष 2021-22 के लिए तिलहन उत्पादन का लक्ष्य बढ़ाकर 38 मिलियन टन किया गया है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि अब खाद्य तेल मिशन के तहत तिलहन उत्पादन में इजाफा करने हेतु उत्पादकों को जरूरी कच्चा माल, तकनीक और जानकारी सरलतापूर्वक उपलब्ध कराई जाएगी। यह भी निर्धारित किया गया है कि इसी खरीफ सत्र में किसानों को मूंगफली और सोयाबीन समेत विभिन्न तिलहनी फसलों की अधिक उत्पादन वाले और बीमारी तथा कीटाणुओं से बचाव की क्षमता रखने वाले बीजों के मिनी किट उपलब्ध कराए जाएंगे। महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि तिलहन की फसल का एक बड़ा रकबा भी उन इलाकों में बढ़ाने का प्रस्ताव है जहां पारंपरिक रूप से तिलहन की बुआई नहीं की जाती है। चूंकि इस बार तिलहन की कुल पैदावार बढ़ाकर 38 मिलियन टन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। अतएव किसानों तक उन्नत बीजों को पहुंचाने के लिए राज्यों में विशेष अभियान चलाना होगा।

तिलहन फसलों की जैविक एवं अजैविक किस्मों के विकास और उपज में वृद्धि के लिए तिलहन फसलों में सार्वजनिक अनुसंधान खर्च बढ़ाए जाने होंगे। तिलहन फसलों के लिए महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्रों में उर्वरक, कीटनाशक, ऋण सुविधा, फसल बीमा और विस्तार सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी होगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनुचित प्रतिस्पर्द्धा से बचने के लिए पर्याप्त सुरक्षात्मक उपायों को अपनाया जाना होगा। इस बात को ध्यान में रखा जाना होगा कि जब तक देश में तिलहन उत्पादन में लक्ष्य के अनुरूप आशातीत वृद्धि नहीं की जाएगी और तिलहन का लाभकारी मूल्य नहीं मिलेगा, तब तक न तो तिलहन उत्पादक किसानों के चेहरे पर मुस्कुराहट आएगी और न ही खाद्य तेल उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी। हम उम्मीद कर सकते हैं कि वैश्विक खाद्य तेल बाजार के ताजा रुख और तिलहन की नई फसल आने के बाद ही दिसंबर 2021 से घरेलू बाजार में खाद्य तेल की कीमतें धीरे-धीरे कम होना शुरू होंगी। हम उम्मीद करें कि अब खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर बनने और तिलहन उत्पादन को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के लिए जो नए कार्यक्रम और नई रणनीतियां घोषित की गई हैं, उनके कार्यान्वयन पर हरसंभव तरीके से ध्यान दिया जाएगा।

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