तुम मुझे वोट दो, मैं तुम्हें गलत इतिहास बताऊंगा
-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-
भाजपा के मौजूदा दौर के नेताओं को इतिहास, ऐतिहासिक तथ्यों और तर्कों से शायद परहेज है, या फिर उन्हें हिंदुस्तान की जनता की सहज बुद्धि और सामान्य ज्ञान पर संदेह है। वे सोचते हैं कि सार्वजनिक तौर पर वे कुछ भी गलतबयानी करें, लोग उन्हें सही मानेंगे और वोट भी उन्हीं को देंगे। जैसे प.बंगाल चुनाव में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने एक रैली में कहा कि, ‘स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’।’ जबकि स्कूल के विद्यार्थी भी अच्छे से जानते हैं कि यह नारा नेता सुभाष चंद्र बोस ने दिया था। 1944 में इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) के सैनिकों को प्रेरित करने के लिए नेताजी द्वारा दिया गया यह नारा आजादी की लड़ाई का सर्वाधिक प्रेरणादायी नारा बन गया। ठीक वैसे ही जैसे नेहरूजी के बाद जब शास्त्रीजी प्रधानमंत्री बने और 1965 में पाकिस्तान के साथ जंग छिड़ी, वहीं देश में अन्न का संकट भी कायम हुआ, तो सेना के जवानों और साथ ही किसानों के लिए सम्मान दिखाने और उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए शास्त्रीजी ने जय जवान, जय किसान का नारा दिया था।
प्रचारतंत्र में पारंगत भाजपा को तो यह बात अच्छे से समझ आती होगी कि ऐसे वनलाइनर या स्लोगन यानी कम शब्दों में बड़ा संदेश देने वाले नारे किस तरह समाज को नयी दिशा दे देते हैं। लेकिन फिर भी उसके नेता इसमें उद्धरण देते हुए सावधानी नहीं बरतते। वैसे तो प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या ऐसे ही किसी बड़े ओहदे पर बैठे लोगों से यह सामान्य अपेक्षा होती है कि उन्हें अपने ही देश के इतिहास के बारे में चर्चित बातें तो ठीक से पता होंगी। लेकिन भाजपा कभी इस अपेक्षा पर पूरी नहीं उतरती। ज्यादा अफसोस की बात यह है कि अगर कुछ नहीं पता तो उसे सीखा जा सकता है, पढ़ा जा सकता है, खुद को इतिहास से, सामान्य ज्ञान से वाकिफ रखा जा सकता है। लेकिन देश की यह सबसे बड़ी पार्टी अज्ञानता को ही सबसे बड़ा गुण बनाने पर तुली है। उसी बात पर घमंड कर सकती है कि उसके नेता अपनी डिग्री नहीं दिखाते और पढ़े-लिखे लोगों का मजाक उड़ाती है। जब प्रधानमंत्री मोदी ही हार्वर्ड विश्वविद्यालय में पढ़े लोगों का मखौल बनाते हुए कहते हैं कि हम हार्डवर्क वाले हैं, हार्वर्ड वाले नहीं, तो बाकी नेताओं से भी समझदारी की उम्मीद क्या की जाए? दरअसल यहां उनकी हीनग्रंथि ही नजर आती है। हालांकि हीनता का भाव यहां हटाया जा सकता है। कोई हार्वर्ड में पढ़े या देश के किसी अन्य संस्थान से पढ़े, लोकतंत्र में एक नेता से सबसे बड़ी अपेक्षा यही रहती है कि वह संविधान का सम्मान करे और उदार दृष्टिकोण से इतिहास, संस्कृति, विज्ञान, कला जैसे सारे विषयों को फलने-फूलने दे। लेकिन भाजपा में यह माहौल दिन ब दिन खत्म किया जा रहा है।
संस्कृति जैसे विराट शब्द को भाजपा ने सनातन धर्म के दायरे में ही कैद कर दिया है, विज्ञान के लिए इतना ही सरोकार है कि अगर किसी अंतरिक्ष कार्यक्रम में सफलता मिले तो प्रधानमंत्री मोदी उसका श्रेय लेने के लिए आगे आ जाएं। लेकिन वैज्ञानिक नजरिए की कोई जगह नहीं है। इसलिए प्लास्टिक सर्जरी को ये गणेश भगवान से शुरु बता देते हैं और पुष्पक विमान को विकसित भारत का सच बताते हैं। कला से भी इनका सरोकार वहीं तक है, जहां तक कलाकार भाजपा के फायदे का प्रचार करें, वहीं तक रचनात्मक या कलात्मक आजादी है, उसके बाद तरह-तरह के प्रतिबंध नजर आते हैं। और इतिहास की जहां तक बात है, तो इसे वे वामपंथी नजरिए से लिखा मानते हैं और अपना नया इतिहास लिखने में लगे हैं। इसलिए अब अकबर को महान नहीं कहा जाता और हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप को जीता हुआ बताया जाता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो एक से बढ़कर एक ऐतिहासिक तथ्यों की गलतबयानी कर चुके हैं, लेकिन कभी इसके लिए उन्होंने खेद प्रकट किया हो, ध्यान नहीं पड़ता। एक बार महात्मा गांधी का पूरा नाम श्री मोदी ने मोहनदास की जगह मोहनलाल कह दिया था। फिर एक भाषण में कहा कि सिकंदर की सेना ने पूरी दुनिया पर जीत हासिल की, लेकिन बिहारियों से हार गई। यही कारण है कि वह? इस देश की ताकत है। रोचक बात यह है कि इस गलती को नीतीश कुमार ने अपनी रैलियों में सही किया था कि सिकंदर की सेना ने कभी गंगा नदी को पार नहीं किया और उन्हें बिहारियों ने नहीं हराया था। तथ्य यही है कि सिकंदर ने झेलम नदी पार की थी, गंगा नहीं। लेकिन तथ्यों से मोदीजी को क्या, इसलिए एक बार वे तक्षशिला को बिहार में भी बता चुके हैं। यहां तक कि जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे में वे भी गलत बोल चुके हैं।
नरेन्द्र मोदी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को ‘प्राउड सन ऑफ गुजरात’ कहा था। उन्होंने मुखर्जी को लंदन में इंडिया हाउस बनाने का श्रेय दिया। उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम लेकर कहा कि उनका निधन 1930 को हुआ और मरने से पहले उन्होंने इच्छा जाहिर की कि उनकी राख को रख दिया जाए, जिससे वह भारत लौटकर भारत को आजाद करवा पाएं। दरअसल मोदीजी को श्यामजी कृष्ण वर्मा के बारे में बताना था, जिनका जन्म गुजरात में हुआ था और इंडिया हाउस भी उन्होंने ही बनाया था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म तो कोलकाता में हुआ था और उनका निधन 1953 में हुआ था।
कई सालों से नरेन्द्र मोदी जो मन में आए, वैसी बातें इतिहास के संदर्भ में कहते हैं और उन पर छिटपुट खबरों के अलावा कोई चर्चा नहीं होती। जबकि भारत की जनता को ही इस बारे में उनसे सवाल करने चाहिए कि वे किस तरह गलत या मनमानी बात कहकर आगे बढ़ सकते हैं। जिम्मेदारी तय न करने का रवैया अब तक चलता रहा है, इसलिए तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा जैसे ऐतिहासिक नारे को गलत संदर्भ के साथ बोला गया। इससे पहले दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने शहीदे आजम भगत सिंह के असेम्बली में बम फेंकने की घटना के बारे में कहा था कि उन्होंने कांग्रेस सरकार के खिलाफ ऐसा किया। मोदी सरकार ने तो जलियांवाला बाग जैसे स्मारक का भी सौंदर्यीकरण करवा दिया, मानो वह कोई पिकनिक की जगह हो। यह उन तमाम शहीदों का अपमान है, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में जान की कुर्बानी दी।
बहरहाल, आदित्यनाथ योगी को अब तक पता चल ही गया होगा कि उन्होंने कितनी बड़ी गलती की। टीएमसी और कांग्रेस जैसे दलों ने उनकी काफी आलोचना भी की है। लेकिन क्या इसके बावजूद भाजपा इतिहास का लापरवाह पाठ करती रहेगी, यह विचारणीय है।
