महिला आरक्षण बिल: किसे होगा नफा……किसे नुकसान
(लेखक- मुस्ताअली बोहरा)
-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-
लोकसभा में महिला आरक्षण बिल दो दिनों की बहस के बाद लोकसभा में 131 वां संशोधन विधेयक खारिज हो गया। केंद्र ने संसद का विशेष सत्र बुलाया था जो 16 अप्रैल को शुरू हुआ और 18 अप्रैल तक चला। 12 साल के शासन में मोदी सरकार को संसद में पहला बड़ा झटका लगा। महिला आरक्षण बिल खारिज हो जाने के बाद राजनीति भी तेज हो गई है। बीजेपी इस बिल के पास ना हो पाने का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ रही है तो विपक्ष ने इसे राजनीतिक एजेंडा करार दिया है। तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी ने सदन में तीनों विधेयकों का विरोध करते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री को जब लगता है कि वो चुनाव हार जाएंगे तो वो नियम ही बदल देते हैं, ये विधेयक सिर्फ राजनीतिक मकसद से लाए जा रहे हैं। कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने कहा कि ये समझने की जरूरत है कि महिला आरक्षण विधेयक साल 2023 में ही पारित हो चुका है। सदन में परिसीमन के जरिए दक्षिण भारतीय राज्यों का हक मारने की साजिश की हार हुई है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने कहा कि हम महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने से कभी सहमत नहीं हो सकते। कांग्रेस नेता राहुल गांधी, जयराम रमेश, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ ही एमके स्टालिन ने भी इसे साजिश करार दिया था। दूसरी तरफ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा था कि महिलाओं को आरक्षण देना समय की मांग है और जो इसका विरोध करेगा वह लंबे समय तक इसकी कीमत चुकाएगा। प्रधानमंत्री मोदी ने देश के नाम संदेश भी दिया। इस पूरे घटनाक्रम से एक बात तो साफ हो गई कि महिला बिल को बीजेपी काफी सोच समझकर सदन में लाई थी।
मोदी सरकार ने लोकसभा में तीन विधेयक पेश किए थे। पहला, संविधान (131 वां संशोधन) विधेयक 2026, दूसरा, परिसीमन विधेयक 2026 और तीसरा विधेयक केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026। संविधान (131 वां संशोधन) विधेयक, 2026 का उद्देश्य नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 जिसे महिला आरक्षण अधिनियम के नाम से भी जाना जाता है, उसमें संशोधन करना था। नारी शक्ति वंदन अधिनियम को संसद ने सितंबर 2023 में लगभग सर्वसम्मति से पारित किया था। इसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान था। यह विधेयक लोकसभा में आगे नहीं बढ़ पाया। सदन के नियमों के अनुसार, संविधान संशोधन विधेयक उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से ही पारित हो सकता था। पक्ष में 298 सांसदों के वोट पड़े जबकि 230 सांसदों ने विरोध में वोट डाला। इसके बावजूद विधेयक को जरूरी दो तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया। लोकसभा में 537 सांसद हैं और विधेयक को पास कराने का जादुई आंकड़ा 360 वोट था। सत्तारूढ़ एनडीए में 240 भाजपा सांसदों सहित 293 सदस्य हैं, जिसमें पर 67 सीटों की कमी रह गई।
भाजपा ने महिला बिल पास ना होने को लेकर अभी से सियासी माहौल बनाना शुरू कर दिया है। तो दूसरी तरफ, कांग्रेस भी हमलावर है। तर्क दिया जा रहा है कि किसी राजनीतिक पार्टी की पहली महिला अध्यक्ष कांग्रेस से थी एनी बेसेंट, देश की पहली महिला प्रधानमंत्री कांग्रेस से थीं श्रीमती इंदिरा गांधी, पहली महिला मुख्यमंत्री कांग्रेस से थीं सुचेता कृपलानी, देश की पहली महिला राष्ट्रपति कांग्रेसनीत शासनकाल में थीं श्रीमती प्रतिभा पाटिल, पहली महिला न्यायाधीश भी कांग्रेस के शासन में थीं फातेमा बीबी। कांग्रेस का सवाल है कि बीजेपी चुनाव में महिलाओं को अधिक टिकट क्यूं नहीं देती, मंत्री मंडल में अधिक महिलाओं को क्यूं शामिल नहीं किया जाता, सरकारी नौकरियों में महिलाओं का आरक्षण कोटा क्यूं नहीं बढ़ाया जाता। राहुल गांधी भी कह चुके हैं कि महिला आरक्षण बिल तो 2023 में पारित हो चुका है, जो बिल लाया गया वो एससी-एसटी और ओबीसी के खिलाफ है।
बहरहाल मोदी सरकार के एक दशक से ज्यादा के कार्यकाल में एक भी बिल नहीं गिरा। जितने भी बिल पेश किए गए, सभी संसद में पास हुए लेकिन पहली बार इतना अहम बिल लोकसभा में गिर गया। मालूम हो कि पिछले 24 साल के दौरान कोई भी सरकारी बिल नहीं गिरा था। साल 2002 में पोटा बिल गिरा था। उसके 24 साल बाद कोई बड़ा बिल सदन में गिरा है। 12 साल में मोदी सरकार का पहला बड़ा बिल गिरा है। ऐसा तो हो नहीं सकता, बीजेपी के थिंक टेंक को इसका अंदाजा नहीं था, या वो इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके पास विधेयक पास कराने लायक बहुमत नहीं है। तो क्या भाजपा ये बिल यूपी और बंगाल चुनाव के नजरिए से लाई थी। इसके अलावा अगले लोकसभा चुनाव में महिला मतदाताओं को विपक्ष से दूर कर अपने पक्ष में लुभाने के लिए बीजेपी ने ये पासा फेंका था। वैसे भी, महिला मतदाताओं का साथ बीजेपी को मिलता रहा है। बिहार में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना, महाराष्ट्र मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहीण योजना, मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना आदि की जादू चुनाव में दिख ही चुका है। ये तो तय है कि महिला आरक्षण बिल पास ना होने को भाजपा सियासी हथियार बनाएगी। हालांकि, पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों से तय हो जाएगा कि ये मुद्दा किसे नफा और किसे नुकसान पहुंचाता है। साथ ही अगले साल यूपी और फिर अन्य राज्यों के विधानसभा और 2029 में लोकसभा चुनाव तक ये मुद्दा बना रहता है या भी नहीं।
