राजनैतिकशिक्षा

मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन उर्फ़ घटिया चुनावी भाषण

अनिल जैन

-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-

सरकार को मालूम था कि संविधान संशोधन पारित कराने लायक दो तिहाई बहुमत उसके पास नहीं है और ऐसी स्थिति में विधेयक का गिरना तय है। फिर भी उसने चलते चुनाव के बीच संसद का तीन दिवसीय सत्र बुलाया। विधेयक गिरना ही था, सो गिर गया। सरकार का इरादा भी विधेयक पारित कराने से ज्यादा इस विधेयक को लेकर विपक्ष को बदनाम करने का था।

ब यह तथ्य सुस्थापित हो चुका है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार व पार्टी का देश के संविधान, स्थापित और मान्य संसदीय प्रक्रिया, किसी भी तरह के नियम-कानून, चुनाव आचार संहिता और नैतिकता आदि में जरा भी विश्वास नहीं है। महिला आरक्षण के नाम पर झूठ-फरेब और घटिया नौटंकी से युक्त उनकी पूरी संसदीय कवायद और उसमें बुरी तरह नाकाम होने के बाद ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ के नाम पर निम्न स्तरीय चुनावी भाषण इसकी ताजा मिसाल है। पिछले 12 साल के अपने अब तक के कार्यकाल के दौरान मोदी ने विभिन्न मौकों पर ऐसी कई मिसालें पेश की हैं लेकिन ताजा मिसाल सबसे बड़ी है।

किसी भी देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का यह विशेषाधिकार है कि वह जब चाहे तब अपने देश की जनता से सीधे मुखातिब हो यानी राष्ट्र को संबोधित करे। यह विशेषाधिकार भारत का प्रधानमंत्री होने के नाते मोदी को भी हासिल है। आम तौर पर प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति अपने ऐसे विशेषाधिकार का इस्तेमाल राष्ट्र के समक्ष किसी असाधारण स्थिति पैदा होने पर ही करते हैं। भारत में भी नरेन्द्र मोदी के सभी पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों ने कई बार विशेष अवसरों पर राष्ट्र को संबोधित किया है लेकिन मोदी ने तो इस विशेषाधिकार का इस्तेमाल अपनी सरकार की नाकामियों को ढंकने या अपनी पीठ थपथपाने के लिए ही किया है। इस सिलसिले में हद तो तब पार हो गई जब 18 अप्रैल को उन्होंने राष्ट्र के नाम संदेश को चुनावी सभा में तब्दील कर दिया।

पिछले 12 वर्षों में ऐसे कई मौके आए जब राष्ट्र को अपेक्षा थी कि मोदी उसे संबोधित करेंगे, लेकिन उन्होंने राष्ट्र को निराश किया। नोटबंदी के दौरान कई लोग बैंकों पर लगी कतारों में खड़े-खड़े मर गए, छोटे और मध्यम श्रेणियों के कारोबारियों के व्यवसाय चौपट हो गए लेकिन पीएम ने राष्ट्र को संबोधित नहीं किया। अलबत्ता उन्होंने देश-विदेश में अपनी सभाओं में ताली पीट कर और ठहाके लगाते हुए उन लोगों की खिल्ली जरूर उड़ाई जो नोटबंदी से परेशान हो रहे थे।

चीनी सेना ने जब अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में घुसकर अपनी चौकियां स्थापित कर उसे अपना क्षेत्र घोषित कर दिया, तब भी उस स्थिति से चिंतित देश की जनता को संबोधित करने के लिए प्रधानमंत्री नमूदार नहीं हुए। इसी तरह जब पुलवामा और पहलगाम में भीषण आतंकवादी हमले हुए, जिनमें सेना के जवानों सहित कई लोग मारे गए, तब भी प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित नहीं किया। पुलवामा हमले के समय वे जिम कार्बेट पार्क में एक विदेशी फिल्मकार के साथ वन विहार कर रहे थे और पहलगाम हमले के समय विदेश में थे और वहां से लौटते ही बिहार में चुनावी रैली को संबोधित करने चले गए थे।

पहलगाम हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के नाम से सैन्य कार्रवाई की, जिसे किसी निर्णायक स्थिति में पहुंचने से पहले ही अमेरिका ने रूकवा दिया। उस ऑपरेशन सिंदूर को शुरू करते वक्त या उसे रोकने का ऐलान करने के लिए भी मोदी खुद टीवी पर देश से मुखातिब नहीं हुए, बल्कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ऐलान किया कि उन्होंने दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम करा दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति यह दावा 50 से अधिक बार कर चुके हैं लेकिन भारत की ओर से नौकरशाही के स्तर पर तो उसका खंडन कराया गया, खुद मोदी देश की संप्रभुता को चुनौती देने वाले ट्रम्प के दावे को नकारने की हिम्मत आज तक नहीं जुटा पाए हैं।

कोरोना महामारी के दौरान जरूर मोदी ने नौ बार राष्ट्र को संबोधित किया। उस दौरान अपने पहले संबोधन में उन्होंने देशव्यापी जनता कर्फ्यू का और दूसरे संबोधन में पूर्ण लॉकडाउन का ऐलान किया। इसके अलावा बाकी संबोधनों में कभी लोगों से ताली-थाली बजाने की तो कभी दीये-मोमबत्तियां जलाने की और कभी अस्पतालों पर फूल बरसाने जैसी फूहड़ नौटंकी करने की अपील की। उस दौरान उनके राष्ट्र के नाम दो-तीन संबोधन ऐसे भी रहे जिनमें उन्होंने वह बात कही जिनके लिए आम तौर पर सरकार का पत्र सूचना विभाग प्रेस विज्ञप्ति जारी कर मीडिया के माध्यम से लोगों को बताता है। कुल मिला कर उस दौरान प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम सभी संबोधन टाइम पास करने और अपनी सरकार को कुछ करता हुआ दिखाने की कवायद थी। हकीकत यह है कि सरकार लोगों को राहत पहुंचाने का कोई काम करने के बजाय हिंदू-मुसलमान खेलने में जुटी हुई थी और उसने मीडिया को भी इसी काम में लगा रखा था।

प्रधानमंत्री से आश्वस्ति कारक राष्ट्र के नाम संबोधन की अपेक्षा उस समय भी की गई थी जब केरलम्, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भीषण प्राकृतिक आपदाएं आई थीं और हजारों लोग मारे गए थे, लेकिन मोदी तब भी विदेश यात्रा में या ट्रेनों को झंडी दिखाने या फिर धार्मिक पर्यटन में ही व्यस्त रहे।

अभी जब ईरान पर इज़रायल और अमेरिका के हमले के परिणामस्वरूप शुरू हुए युद्ध से देश में गंभीर ऊर्जा संकट खड़ा हुआ तब भी उम्मीद की जा रही थी कि वे राष्ट्र को संबोधित करेंगे। ऐसा कुछ नहीं हुआ। गैस वितरकों के ऑफिसों और गोदामों पर गैस सिलेंडरों के लिए परेशान लोगों की कतारें लग रही थीं, लोग आपस में मारपीट कर रहे थे और गैस सिलेंडरों की खुलेआम कालाबाजारी हो रही थी लेकिन मोदी असम, बंगाल, तमिलनाडु और केरल में चुनावी रैलियां संबोधित करते हुए किसी भी तरह के संकट को नकारते हुए विपक्ष पर अफवाह फैलाने और लोगों को डराने का आरोप लगा रहे थे।

महिला आरक्षण के जिस मुद्दे पर 18 अप्रैल को मोदी राष्ट्र को संबोधित करने के लिए नेशनल टेलीविजन पर नमूदार हुए थे वह मुद्दा शुद्ध रूप से फज़ीर् था। मुद्दा था लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण का, जिसके लिए नारी शक्ति वंदन कानून 2023 में ही संसद में सर्वसम्मति से पारित हो चुका है और मोदी सरकार ने ही इस कानून को 2026 में हो रही जनगणना के आधार पर 2029 के लोकसभा चुनाव के बाद लागू करने का फैसला किया था।

अब सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा की सीटों का परिसीमन करा कर उस कानून को 2029 के लोकसभा चुनाव में ही लागू कराने के इरादे से संविधान संशोधन विधेयक ले आई।

सरकार को मालूम था कि संविधान संशोधन पारित कराने लायक दो तिहाई बहुमत उसके पास नहीं है और ऐसी स्थिति में विधेयक का गिरना तय है। फिर भी उसने चलते चुनाव के बीच संसद का तीन दिवसीय सत्र बुलाया। विधेयक गिरना ही था, सो गिर गया। सरकार का इरादा भी विधेयक पारित कराने से ज्यादा इस विधेयक को लेकर विपक्ष को बदनाम करने का था। देश के संसदीय इतिहास में यह पहला अवसर रहा जब कोई संविधान संशोधन पारित नहीं हो सका, अन्यथा इससे पहले अल्पमत की सरकारें भी संविधान संशोधन लाती रही हैं और वे पारित हुए हैं। बहरहाल विधेयक गिरते ही मोदी राष्ट्र को संबोधित करने के लिए टीवी पर प्रकट हुए। उन्होंने जिस तरह का उद्बोधन किया उससे ‘राष्ट्र के नाम संबोधनÓ की गरिमा तो गिरी ही, चुनाव आचार संहिता की धज्जियां भी उड़ीं। वैसे भी मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद चुनाव आचार संहिता का कोई मतलब नहीं रह गया है। हर चुनाव में वे उसकी खुलेआम धज्जियां उड़ाते हैं और चुनाव आयोग ऊंघता रहता है।

यह कोई नई बात नहीं है और किसी से छुपी हुई भी नहीं कि मोदी जब भी, जहां भी और जो भी बोलते हैं, उसमें झूठ की मात्रा ही ज्यादा होती है। मगर इस राष्ट्र के नाम संबोधन में तो उन्होंने झूठ बोलने के अपने ही पिछले सारे रिकॉर्डों को ध्वस्त कर दिया। चुनावी भाषण के अंदाज में अपने 29 मिनट के राष्ट्र के नाम संबोधन में उन्होंने सिर्फ और सिर्फ झूठ बोला। उन्होंने 90 से ज्यादा बार कांग्रेस का और तीन-तीन, चार-चार बार तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और समाजवादी पार्टी का नाम लेकर उन्हें कोसते हुए महिला आरक्षण का विरोधी बताने का हास्यास्पद प्रयास किया। मजेदार बात यह है कि इन्हीं पार्टियों के समर्थन से उन्होंने 2023 में महिला आरक्षण के लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम संसद में पारित कराया था और उस वक्त इन पार्टियों का आभार भी व्यक्त किया था। दरअसल प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के नाम संबोधन था। संक्षेप में कहा जाए तो पिछले 12 वर्षों के दौरान प्रधानमंत्री मोदी का यह अब तक सबसे निम्न स्तरीय, अशोभनीय अतार्किक और बेशर्मी से भरा संबोधन था।

 

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