अब जनता का मेनिफेस्टो नहीं होना चाहिए?

-एसआर हरनोट-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

चुनाव आते हैं तो हम चुपचाप अपने अधिकारों की दुहाई देते वोट देने लाइन में खड़े हो जाते हैं। यह हर पांच साल बाद दोहराया जाता है। मुझे हमेशा लगता है कि हमें हर बार इन चुनाव के बहाने नेता और पार्टियां बेवकूफ बनाती जाती हैं। हम आंखें बंद करके उनके घोषणा पत्रों पर विश्वास करते जाते हैं। आज की जो स्थिति देश की बनी है, लगता है हमने वोट अपनी हत्या और सामूहिक नरसंहार के लिए दिए हैं३? हम यदि एक सवाल या एक पंक्ति भी सरकार के विरुद्ध बोलते या लिखते हैं तो तत्काल हमें देशद्रोही, सरकार विरोधी और अर्बन नेकसेलाइट के खिताबों से नवाजा जाने लगता है, लेकिन सरकार, उसके प्रशासन, उसके नेताओं के सारे अपराध, गुनाह और अकर्मण्यता हमेशा श्रेष्ठ और संत श्रेणी में चले जाते हैं। जनता की वोट, जनता का पैसा इन्हीं श्रेष्ठों और संतों को दिनों दिन अमीर बनाता जाता है। कमी पड़ती है तो ये कटोरा लेकर नहीं बल्कि आदेश करके यहां तक कि पेंशनरों को भी नहीं छोड़ते। बजाय इसके कि बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाएं, अच्छी शिक्षा दें, यहां जनता के पैसों से इस महामारी में जहाज, हेलीकॉप्टर खरीद जा रहे हैं, मंदिर-मस्जिद बन रहे हैं, अपने वेतन बढ़ाए जा रहे हैं, कई कई पेंशनों के जुगाड़ आए दिनों महामहिमों की सेवा में हो रहे हैं, अपनी शून्य उपलब्धियों के लाखों करोड़ों के विज्ञापन और किताबें छप रही हैं।

चुनावी रैलियां ऐसे हो रही है जैसे देश उसके बिना दिवालिया हो जाएगा या फिर कभी चुनाव ही नहीं होंगे। जो उच्च नेता बंद कमरों में टीवी इंटरव्यू देते, मन की बात करते मुंह से मास्क नहीं हटाते वे चुनाव रैलियों में बिना मास्क लगाए खुद और लाखों की भीड़ को अपना सौभाग्य मानते अपनी विवेक शून्यता और गैर जिम्मेदारियों का परिचय देते हैं। इस कोविड समय में धर्म की डुबकियां लगाने के लिए उमड़ी लाखों की भीड़ को देश की उच्च संस्कृति व धर्म मानते हैं और देश को सामूहिक नरसंहार की ओर धकेल देते हैं। सरकारें जिन मूल उद्देश्यों के लिए बनती हैं, उसे भूल कर गैर जरूरी बिल लाए जा रहे हैं, सरकारी क्षेत्र को बेचा जा रहा है ताकि आम जनता यहां तक कि व्यापारियों को लूट की खुली और संवैधानिक छूट मिल सके। इस कोविड समय में हमारी सरकारों ने सरकारी सुविधाओं और सरकारी कर्मचारियों का दुरुपयोग और शोषण करके जितनी लूट की छूट प्राइवेट सेक्टर को दे दी है, शायद वही उसके लिए ‘सुअवसर’ है। आपके पास अच्छे अस्पताल नहीं हैं, दवाइयां नहीं हैं, ऑक्सीजन तक के बिना मरीज मर रहे हैं। निजी और कुछ सरकारी अस्पतालों में जिस क्रूरता के बर्ताव मरीजों के साथ हो रहे हैं, वह हमारी सरकारों की छवि, करतूतों और विवेक शून्यता के उदाहरण हैं। इस महामारी को सरकारों के साथ निजी व्यापारियों ने जिस तरह अच्छे अवसरों में बदला है, उसके न कभी उदाहरण देखे गए और न शायद भविष्य में देखे जाएंगे। शायद तब तक कोई बचे ही नहीं। मेरी देश भर में पत्रकार व लेखक मित्रों से बात होती रहती है। श्मशानघाटों में जगह नहीं है, अस्पतालों में बिस्तर नहीं हैं, उधर बहुत से मित्र जो चुनाव ड्यूटीज में तैनात हैं, उनके घर या तो कोई अपना चला गया है या बीमार दवाइयों को तरस रहा है, पर प्रशासन के लिए चुनाव प्रायरिटी है, मानवता नहीं।

कोर्ट यदि चुनाव आयोग को हत्यारा बता रहा है तो फिर उसी को आगे आकर उनके खिलाफ और तमाम नेताओं के खिलाफ हत्या के मामले भी दर्ज करने चाहिए। लोगों को थोड़ा जो विश्वास रह गया है वह न्यायपालिका पर ही है, संविधान को तो इन लोगों ने कभी का मार दिया है। इस विकट कोविड समय में शायद ही ऐसा एक उदाहरण मिले जहां किसी नेता, मंत्री, बड़े व्यापारी या उच्च प्रशासनिक अधिकारी या उसके परिजन इस बीमारी में बिना ऑक्सीजन, बिना वेंटीलेटर, बिना बिस्तर के रहना पड़ा हो। तमाम छोटे बड़े अस्पताल उनके लिए पलक पांवड़े बिछाए नजर आए हैं। कुछ यदि नहीं उपलब्ध है तो हमारे-आपके पास। वोट की राजनीति ने जितना तबाह इस देश को किया है, उससे बड़ी शायद ‘महामारी’ कोई नहीं है। आज हमारे अधिकारों का दुरुपयोग करके जो नेता देश की सेवा के नाम पर अपनी संपत्तियां बना रहे हैं, हम पर अंधे कानून थोप रहे हैं, क्या वे किसी ‘महामारी’ से कमतर हैं? आज हर तरफ महामारी ही महामारी है। दूसरी तमाम चीजें हाशिए पर चली या धकेल दी गई हैं। शिक्षा समाप्त है, बच्चों का भविष्य अंधकार में है, महंगाई आसमान छू रही है, अस्पतालों की स्थितियां बदतर हैं, किसान और मजदूर बेहाल हैं। लघु उद्योग खत्म हैं। आज जो सरकारी कर्मचारी हर तरह से लोगों की सेवा में लगे हैं उनकी पेंशन समाप्त कर दी गई है। इस महामारी में उन्होंने जितनी कुर्बानियां दी हैं, शायद उसका लेखा-जोखा केवल ‘ड्यूटी’ की श्रेणी तक ही रखा जा रहा है। चंद मीडिया और स्वयंसेवी समूह जो ईमानदारी से आमजन की सेवा में हैं, उन्हें भी तरह तरह से परेशान किया जा रहा है, बस बचे हैं तो ‘भक्तजनसेवी’, जो आज मशरूम की तरह हमारे-आपके बेडरूम से लेकर संसद तक काबिज हैं।

लोग इस दौर, सरकारों की नाकामियों, अवसरवादिता और निजी क्षेत्रों की लूट को शायद कभी न भूलेंगे। क्या अब समय नहीं आ गया है कि आपका, जनता का अपना भी कोई मेनिफेस्टो हो। ऐसी न्यायपालिका हो और जब कोई नेता या पार्टी चुनाव में जाएं तो वे जनसुविधाओं की गारंटी का एफिडेविट दें ताकि सरकार बनने या चुने जाने पर यदि वह उसे पूरा न करें तो उसकी तमाम सुविधाएं व नेतागिरी छीन ली जाएं। हमें इस ओर जाना पड़ेगा अन्यथा हमें हर समय अपनी हत्या करवाने और सामूहिक नरसंहार के लिए तैयार रहना होगा। यह समय और आने वाला समय बिल्कुल भी हमारा आमजन का नहीं है, यह नेताओं और व्यापारियों का समय है, हमारी दासता और गुलामी का समय है। आजादी के इतने सालों बाद भी कागजों, भाषणों, विज्ञापनों में बताने के लिए आपके पास अंधाधुंध उपलब्धियां हैं लेकिन जमीन पर कुछ नहीं। इस तकनीकी उत्तर आधुनिक समय में यदि किसी मरीज को न ऑक्सीजन और न एक अदद बिस्तर आप दे सकें तो आपकी अकर्मण्यता साफ जाहिर है, आपकी उपलब्धियां महज ढिंढोरा भर हैं। आपके घर-आंगन, सिर पर जब मौत नाच रही है, लाखों लोग मौत ने निगल लिए हैं, लाखों संक्रमण से जूझ रहे हैं, आप धड़ल्ले से चुनाव करवा रहे हैं, भीड़ जुटा रहे हैं, कुंभ नहलवा रहे हैं। यह सब अब रुकना चाहिए।

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