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शिक्षा में निवेश और बजट-2021

-डॉ. वरिंदर भाटिया-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

वित्तमंत्री एक फरवरी को वित्त वर्ष 2021-22 के लिए सालाना बजट पेश करेंगी। बजट 2020 में शिक्षा के क्षेत्र पर भी कुछ ध्यान दिया गया था। बजट में एजुकेशन सेक्टर के लिए 99300 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे। इसके साथ बजट 2020 में बड़ा ऐलान नई शिक्षा नीति को लेकर किया गया था। भारत शिक्षा पर जीडीपी का लगभग तीन प्रतिशत ही खर्च करता रहा है। जबकि अन्य छोटे-बड़े देश अपनी शिक्षा पर जीडीपी का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं। अगर छोटे से देश भूटान की बात करें या जिम्बाब्वे जैसे विकासशील देश या फिर स्वीडन जैसे विकसित देश की, ये देश शिक्षा पर अपनी जीडीपी का 7.5 प्रतिशत हिस्सा खर्च करते हैं। ये देश जानते हैं कि शिक्षा पर खर्च करना बहुत जरूरी है। वहीं कोस्टा रिका, फिनलैंड आदि देश शिक्षा पर जीडीपी का 7 प्रतिशत हिस्सा खर्च करते हैं। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और कई अन्य रिपोर्ट के अनुसार फिनलैंड की शिक्षा प्रणाली को दुनिया में सबसे बेहतर समझा जाता है। किर्गिस्तान, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील आदि देशों को लें तो ये देश शिक्षा पर 6 प्रतिशत खर्च करते हैं, जबकि ब्रिटेन, नीदरलैंड, फिलिस्तीन अपने शिक्षा तंत्र पर जीडीपी का 5.5 प्रतिशत भाग खर्च करते हैं।

मलेशिया, केन्या, मंगोलिया, कोरिया, अमरीका आदि देश 5 प्रतिशत का खर्च करते हैं। चीन ने अपनी शिक्षा प्रणाली पर पिछले 7 सालों से लगातार अपनी जीडीपी का 4 प्रतिशत से ज्यादा का हिस्सा खर्च किया है। यानी कि भारत ने लंबे समय तक एक ऐसे स्थापित तंत्र को नजरअंदाज किया है कि जिसको दुनिया ने सबसे ज्यादा महत्त्व दिया है। उसने शिक्षा से ज्यादा रक्षा पर अधिक खर्च किया है। अगर गौर करें तो अमरीका, नीदरलैंड, फिनलैंड, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील आदि देश जो आर्थिक सहयोग तथा विकास संगठन (ओईसीडी) के सदस्य देश हैं, उनकी शिक्षा प्रणाली, बुनियादी आधारभूत संरचना, स्कूलए विद्यार्थियों के लिए लैब, अध्ययन कार्य आदि सब पहले से ही काफी हद तक विकसित हैं। इन देशों ने पहले से ही शिक्षा के क्षेत्र में बहुत ज्यादा निवेश किया हुआ है और अभी भी जीडीपी का बहुत बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च करते हैं। यह खर्च स्कूलों के रखरखाव, टीचर की सैलरी, रिसर्च आदि में होता है। जाहिर है भारत इस पहलू में भी काफी पीछे है। भारत में जो स्कूल हैं, उनकी ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, स्वीडन, फिनलैंड आदि के स्कूलों से तुलना नहीं की जा सकती। भारत को अभी शिक्षा पर बहुत ज्यादा निवेश करने की आवश्यकता है। अगर अब निवेश नहीं करेगा तो भविष्य में भारत पिछड़ जाएगा। इसके लिए जरूरत है कि भारत अपनी जीडीपी का 6 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना शुरू करे। अभी शिक्षा पर जो पैसा खर्च होता है, उसका बड़ा हिस्सा टीचर की सैलरी में निकल जाता है और स्कूलों का रखरखाव, लैब, सीखने के संसाधन, मिड-डे मील आदि पर बेहद कम खर्च होता है। देश की शिक्षा व्यवस्था बजट की भारी कमी से हमेशा दो-चार रही है। उच्च शिक्षा हो या स्कूली शिक्षा, हर जगह बजट की कमी है। पिछले एक दशक के दौरान शिक्षा के क्षेत्र में खर्च देश के जीडीपी के तीन प्रतिशत से भी कम रहा है, जबकि प्रस्तावित वैश्विक मानक 6 प्रतिशत है। 2014-15 में जब वर्तमान सरकार ने पहली बार बजट पेश किया था तो उसमें शिक्षा क्षेत्र को 83000 करोड़ रुपए का बजट दिया गया था।

बाद में इसे उसी साल घटाकर 69000 करोड़ रुपए कर दिया गया। इसके बाद शिक्षा बजट उस दर से नहीं बढ़ा जिस तरह उसे बढ़ना चाहिए था। इसी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान निर्मला सीतारमण ने जब जुलाई 2019 में बजट पेश किया तो शिक्षा क्षेत्र को 94854 करोड़ रुपए का बजट मिला जो 2014 के बजट से महज 15.68 फीसदी अधिक है। जबकि इस दौरान कुल बजट 55 फीसदी से अधिक बढ़ा। 2014-15 में संपूर्ण बजट की राशि 17.95 लाख करोड़ रुपए थी जो 2019-20 में बढ़कर 27.86 लाख करोड़ हो गई। शिक्षा नीति का निर्धारण करने के लिए 1964 में बने कोठारी आयोग का सबसे प्रमुख सुझाव था कि देश के सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत शिक्षा के मद में खर्च किया जाए। प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1968) में इसे एक राष्ट्रीय लक्ष्य भी बनाया गया था। लेकिन इस राष्ट्रीय लक्ष्य को आज 52 साल बाद भी नहीं प्राप्त किया जा सका है। अगर हम वैश्विक आंकड़ों की बात करें तो वैश्विक आंकड़े भारत से कहीं बेहतर हैं। भारत में जहां एक तरफ शिक्षा के क्षेत्र में बजट काफी कम है, वहीं इसका वितरण भी आज तक काफी असमान सा है। 2019-20 के बजट के अनुसार शिक्षा के क्षेत्र में जो 94854 करोड़ जारी किए गए, उसमें स्कूली शिक्षा का बजट 56536.63 करोड़ रुपए और उच्च शिक्षा का बजट 38317.36 करोड़ रुपए है। उच्च शिक्षा के 38317.36 करोड़ रुपए में से देश के लगभग 1000 विश्वविद्यालयों का हिस्सा 6843 करोड़ रुपए है। वहीं देश में 50 से भी कम संख्या में स्थित आईआईटी और आईआईएम का बजट विश्वविद्यालयों के बजट से कहीं अधिक है। देश भर के 23 आईआईटी कॉलेजों का बजट 6410 करोड़ रुपए जबकि देश के 20 आईआईएम कॉलेजों को 445 करोड़ रुपया मिलता है। यही कारण है कि भारत की विश्वविद्यालयीय शिक्षा अच्छी स्थिति में नहीं है। बजट के असमान वितरण के अलावा एक और समस्या यह है कि शिक्षा के क्षेत्र में जितना बजट प्रस्तावित किया जाता है, उतना खर्च नहीं हो पाता। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 10 सालों में 8 बार ऐसा मौका आया जब शिक्षा पर प्रस्तावित बजट खर्च नहीं हो सका। इस रिपोर्ट के अनुसार 2014 से 2019 के दौरान लगभग 4 लाख करोड़ रुपए प्रस्तावित बजट शिक्षा के क्षेत्र में खर्च नहीं हो सका। हम शिक्षा के प्रति कितने गंभीर हैं, इसका आकलन हम शिक्षा बजट और शिक्षा पर होने वाले खर्च से आसानी से कर सकते हैं।

शिक्षा को लेकर सुखद समाचार यह है कि इस वक्त देश के एडटेक सेक्टर में लगातार निवेश बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2020 में भारत के एडटेक स्टार्टअप्स में 2.22 बिलियन डॉलर (करीब 16 हजार करोड़ रुपए) का निवेश हुआ है। 2019 में केवल 553 मिलियन डॉलर (करीब 4 हजार करोड़ रुपए) का निवेश हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक 2020 में 92 स्टार्टअप्स में फंडिंग हुई। इनमें से 61 स्टार्टअप्स को सीड फंडिंग मिली। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 4450 एडटेक स्टार्टअप्स हैं। इसमें बायजूस और अनएकेडमी यूनिकॉर्न स्टार्टअप हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक 2014 से 2020 के दौरान एडटेक स्टार्टअप्स को 220 करोड़ डॉलर की फंडिंग मिली है। 475 से ज्यादा इन्वेस्टर इन स्टार्टअप्स को फंड कर रहे हैं। मौजूदा समय में देश में करीब 1.5 करोड़ छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। अगर अर्थव्यवस्था बड़ी होगी तो जाहिर है लोग ज्यादा कमाई करेंगे, टैक्स भी ज्यादा देंगे और टैक्स के पैसों को शिक्षा पर लगाया जा सकेगा, जो भारत की शिक्षा प्रणाली के लिए अच्छे संकेत हैं। सुझाव है कि लोकतंत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं मुफ्त नहीं तो न्यूनतम होनी चाहिएं। शिक्षा किसी भी देश का भविष्य होता है। इसी भविष्य को ध्यान में रख कर सरकारें हर साल के बजट में शिक्षा के लिए एक निश्चित धनराशि का प्रावधान करती हैं। इल्तजा है कि इस बजट में शिक्षा को मजबूती प्रदान करने के लिए निवेश प्रोत्साहित किया जाए।

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