सैनिकों के मानवाधिकारों पर कुठाराघात

-राजेंद्र मोहन शर्मा-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

मानव अधिकारों की अवधारणा एक सभ्य समाज की अवधारणा होती है। मानव अधिकार दुनिया के सभी देशों में कम या अधिक मात्रा में किसी न किसी संविधान के अंतर्गत सुनिश्चित किए जाते हैं। संपूर्ण विश्व में मानव इन्हीं उचित व अनुचित अधिकारों के लिए जूझता रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में मानव अधिकारों पर चर्चा होना एक आम बात है। मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए भारत में समय-समय पर विभिन्न आयोग जैसा कि अल्पसंख्यक आयोग, पिछड़ा वर्ग आयोग, अनुसूचित जाति व जनजाति व महिला संरक्षण आयोग गठित किए गए हैं, मगर फिर भी अधिकारों के हनन की घटनाएं होती रहती हैं। इसी संदर्भ में सैनिकों के भी कुछ मानवीय अधिकार होना स्वाभाविक हैं। वर्दी पहन लेने का यह अर्थ कदापि नहीं कि सशस्त्र बलों के कर्मियों के मानव अधिकारों का हनन नहीं होता।

सैनिक भी एक मनुष्य है। उसके भी अपने व्यक्तिगत व व्यावसायिक अधिकार होते हैं। हमने वर्षों तक संघर्ष करके स्वाधीनता प्राप्त की है जिसके लिए असंख्य देश भक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। जब हम निद्रा की आगोश में होते हैं और जब रात के सन्नाटे में रौंगटे खड़ी कर देने वाली डरावनी अवाजें आती हैं, तब यही वो सूरमें होते हैं जो हम सबकी सुरक्षा में लगे होते हैं। कितनी भी चिलचिलाती धूप हो या फिर हड्डियां गला देने वाली ठंड हो तो यही शूरवीर मौत को गले लगा कर देश के वर्चस्व की रक्षा करते हैं। कोई भी ऐसा दिन नहीं जाता जब हमारा कोई न कोई सैनिक अपने कर्त्तव्य की बलिबेदी पर अपनी शहादत नहीं देता। चाहे आतंकवादी हों या माओवादी, या फिर अराजकता फैलाने वाले पत्थरबाज, इन सभी का सामना हमारे सरहद के सेनानी अपने फौलादी हौसलों से करते हैं तथा जब इन हैवानों व शैतानों का सामना करने के लिए सरकार द्वारा दी गई बंदूक व गोली या आंसू गैस का सैनिक प्रयोग करते हैं, तब सभी तथाकथित मानव अधिकार संस्थाएं अपने बर्तनों को चमकाने के लिए निंदा का ढिंढोरा पीटना शुरू कर देती हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जैसे कि एमनेस्टी इंटरनेशनल व एशिया वॉच इत्यादि संस्थाएं विश्व स्तर पर हल्ला मचाना शुरू कर देती हैं। इन संस्थाओं को इन शैतानों के अधिकारों की चिंता ज्यादा रहती है तथा सैनिक जो खून से लथपथ होकर इनका सामना करते-करते शहादत पा लेते हैं, उन पर उनका ध्यान नहीं जाता। आज आतंकवाद भारत की प्रमुख समस्या है जिसने भारतीय शासन व्यवस्था को जर्जर कर दिया है। वर्ष 1988 से लेकर अब तक न जाने कितनी आतंकी घटनाएं हुई हैं तथा कितने ही सैनिकों को हम सबकी सुरक्षा करते-करते अपने प्राण गंवाने पडे़ हैं। वर्ष 2020 की ही बात करें तो भारत में आतंवाद की कुल 3552 घटनाएं हुईं जिनमें 996 स्थानीय लोग व 536 जवान शहीद हुए तथा 2020 आतंकियों को मौत के घाट उतारा गया। उधर नक्सलियों का सामना करते हुए भी न जाने कितने अर्धसैनिक बलों को अपनी जान गंवानी पड़ी। चाहे उत्तर-पूर्व राज्यों व जम्मू-कश्मीर में पनपता आतंकवाद हो या कारगिल युद्ध व गलवान घाटी की हाल ही में हुई घटना हो या फिर कहीं और जगह की माओवादी घटना हो, इन सबका सामना हमारे सैन्य बल ही करते हैं। उत्तर-पूर्वी राज्यों में वर्ष 1958 में जब पुलिस बल इन देश विराधी तत्त्वों को नियंत्रित नहीं कर पा रहे थे, तब फौज को आर्म्ड फोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट 1958 (अफस्पा) के अंतर्गत कुछ विशेष अधिकार दिए गए जिसके अंतर्गत सैनिकों व अधिकारियों को संदेहपूर्ण स्थानों की तलाशी व संदिग्ध लोगों को गिरफ्तार करने व उन पर अपनी आत्मरक्षा के लिए गोली चलाने के अधिकार दिए गए, जिसके परिणामस्वरूप सुरक्षा बलों ने वहां पर शांति स्थापित की थी। बाद में यह एक्ट जम्मू एवं कश्मीर में भी लागू किया गया तथा वहां आज लोगों को इसी कारण सुकून व शांति प्राप्त हुई है। यह ठीक है कि इस एक्ट का कुछ जवानों व अधिकारियों ने दुरुपयोग भी किया, मगर इसकी अवहेलना के लिए उन्हें सजाएं भी मिली हैं।

मानव अधिकार संस्थाओं का यह कहना कि इस एक्ट को निरस्त कर देना चाहिए, कोई तर्कसंगत सुझाव नहीं है। कई बार सेनाओं को बल का प्रयोग इसलिए भी करना पड़ता है क्योंकि यदि ऐसा न किया जाए तो यह लोग बहुत से नागरिकों को मौत के घाट उतार देंगे तथा देश में अराजकता फैला देंगे। गुंडीपुरा (जम्मू-कश्मीर) शहर की वर्ष 2017 की घटना इस बात की गवाह है कि जब गुंडीपुरा व पुतलीगांव यहां पर चुनाव चल रहे थे तथा जब पत्थरबाजों ने पोलिंग पार्टी व पुलिस कर्मियों को चारों तरफ से घेर रखा था, तब यदि वहां पर तैनात सेना की टुकड़ी के कमांडर मेजर नितिन गोगोई एकदम हरकत में आकर पत्थरबाज फारूक अहमद को अपनी जीप के बोनेट पर बांध कर उग्र भीड़ से गुजारने में कामयाब न होते तो दंगाइयों ने पोलिंग पार्टी के सभी सदस्यों को जिंदा जला दिया होता। कहां मेजर गोगोई की इस अतुलनीय सूझ-बूझ के लिए प्रशंसा होनी चाहिए थी और वहीं इन मानव अधिकार संस्थाओं ने इस घटना के विरुद्ध शोर मचाना शुरू कर दिया और केवल यही नहीं, स्थानीय पुलिस ने मेजर के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज कर ली और उसे गिरफ्तार करने की फिराक में थे। ऐसी और भी कई घटनाएं हैं जो हम सभी का दिल दहला देंगी, मगर नपुंसक नागरिक भी हिजड़ों की बादशाहत निभाते हुए पाए जाते हैं। वर्ष 2013 में पकिस्तान के सैनिकों ने भारत के दो होनहार जांबाजों (हेमराज सिंह व सुधाकर) के सिर काट दिए थे, तब भी इन मानव अधिकार संस्थाओं के लोग नपुंसकों की तरह छुपे रहे तथा किसी ने भी ऐसी जघन्य घटनाओं की निंदा नहीं की थी।

जिन मां-बाप के सपूतों को इस तरह से उन पर हथियार न उठाने की बंदिशें लगा कर शहीद कर दिया जाए, उनकी आत्माएं किस तरह से ऐसे लोगों को मुआफ कर सकती हैं? जम्मू-कश्मीर में सेनाओं पर पथराव करने वाले युवाओं के खिलाफ कुल 9700 प्राथमिकी दर्ज की गई थीं जिन सबको उस समय की मुख्यमंत्री ने यह कह कर रद्द करवा दिया कि यह उनका पहला अपराध है। ऐसे राजनेताओं की जितनी भर्त्सना की जाए, वह शायद उतनी ही कम होगी। मोदी सरकार ने सैनिकों के कल्याण हेतु काफी कुछ किया है, परंतु अब भी कुछ असंवेदनशील लोग सैनिकों के मानव अधिकारों के खिलाफ काम करने की फिराक में हैं। इन पर समय रहते नियंत्रण पाया जाना चाहिए।

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