सुलझे विचारों की प्रगतिशील नेता थीं शीला दीक्षित

-सक्षम भारत-

देश की राजधानी दिल्ली को आधुनिक दिल्ली का रूप देने वाली कांग्रेस की दिग्गज नेता शीला दीक्षित 81 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कह चिरनिद्रा में लीन हो गईं। आधुनिक दिल्ली की वास्तुकार के रूप में विख्यात शीला ने वर्ष 1984 में जब उत्तर प्रदेश के कन्नौज से राजनीति में पहला कदम रखा था, तब शायद उन्होंने स्वयं भी नहीं सोचा होगा कि आने वाले वर्षों में वो दिल्ली के लोगों के दिलों पर राज करेंगी और लगातार 15 वर्षों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड कायम करेंगी। सौम्य व्यक्तित्व की धनी शीला ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कभी किसी पर व्यक्तिगत हमले या आपत्तिजनक टिप्पणियां नहीं की और राजनीति की गरिमा का स्तर सदैव बनाए रखा। यही वजह रही कि राजनीति में उनके राजनीतिक विरोधी तो बहुत रहे किन्तु शत्रु कोई नहीं था। यही वजह रही कि विरोधी दलों के तमाम दिग्गज नेता भी उनके अंतिम दर्शन करने पहुंचे। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि एक केन्द्रशासित प्रदेश की मुखिया रहते उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल के साथ समन्वय की राजनीति का ऐसा श्रेष्ठ उदाहरण पेश किया, जिसके चलते कभी भी उनके इतने लंबे कार्यकाल में केन्द्र बनाम दिल्ली की चर्चा नहीं हुई। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1998 से 20104 तक केन्द्र में भाजपा सत्तारूढ़ रही किन्तु शीलाजी ने केन्द्र के साथ सामंजस्य स्थापित कर दिल्ली को विकास पथ पर अग्रसर किया। सही मायनों में शीलाजी के कार्यकाल में दिल्ली में इतने विकास कार्य हुए कि काम बोलता है की उससे बेहतर मिसाल विशेषकर दिल्ली में तो उससे पहले कभी देखने को नहीं मिली। पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए शीला ने दिल्ली में हरियाली को संरक्षित करते हुए हरियाली का दायरा बढ़ाने के लिए बहुत काम किया।
31 मार्च 1938 को पंजाब के कपूरथला में जन्मी शीला दीक्षित 1984 से 1989 तक कन्नौज लोकसभा क्षेत्र से सांसद रहीं। उस दौरान तीन साल तक केन्द्रीय मंत्री तथा सांसद रहने के दौरान यूनाइटेड नेशंस कमीशन ऑन स्टेटस ऑफ वीमेन में भारत की प्रतिनिधि भी रहीं लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रियता के दौरान लगातार चार लोकसभा चुनाव हारने के पश्चात् गांधी परिवार के विश्वासपात्र लोगों में शुमार शीला को 1998 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उस दौर में दिल्ली की जिम्मेदारी दी, जब दिल्ली की राजनीति में मदनलाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा तथा विजय कुमार मल्होत्रा जैसे भाजपा के आला नेताओं की तूती बोलती थी। लेकिन शीला ने करिश्माई अंदाज में भाजपा को पीछे धकेलते हुए कांग्रेस को लगातार तीन बार जीत दिलाकर 15 सालों तक मुख्यमंत्री रहते हुए दिल्ली का नक्शा ही बदल दिया। यह शीला का राजनीतिक कौशल ही था कि उस दौरान जब-जब देशभर में कांग्रेस के विरूद्ध हवा बही, उस दौर में भी शीला दिल्ली की सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रहीं।
2013 में कॉमनवेल्थ गेम्स और टैंकर स्कैम जैसे घोटालों में नाम सामने आने के बाद डेढ़ दशकों तक दिल्ली पर एकछत्र राज करती रही शीला सरकार को आम आदमी पार्टी ने ऐसा झटका दिया कि वो उससे उबर नहीं सकीं और पार्टी की उस हार के बाद सक्रिय राजनीति से शीला दीक्षित की विदाई हो गई। उसके बाद उन्हें एक रिटायर्ड राजनेता की भांति 11 मार्च 2014 को केरल का राज्यपाल बनाकर राजभवन भेज दिया गया किन्तु उसी वर्ष मोदी सरकार के सत्तारूढ़ होने के पश्चात् उन्होंने खुद 25 अगस्त 2014 को राज्यपाल पद त्यागकर दिल्ली का रूख किया। उसके बाद वह सक्रिय राजनीति से दूर रहीं। हालांकि करीब दो साल पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस द्वारा उन्हें भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया गया किन्तु कांग्रेस की हार के बाद माना जाने लगा था कि शीला का राजनीतिक कैरियर पूरी तरह खत्म हो चुका है। लेकिन इस साल लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली कांग्रेस की कमान शीला को दिए जाने के बाद शीला एक बार फिर सक्रिय राजनीति में लौट आई थीं। यह शीला का करिश्माई व्यक्तित्व ही था कि भले ही कांग्रेस इस साल हुए लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सभी सातों सीटें हार गई और खुद शीला भी भाजपा के मनोज तिवारी से तीन लाख से भी ज्यादा वोटों से पराजित हुईं किन्तु चुनाव से पहले दिल्ली में जहां कांग्रेस का कोई नामलेवा तक नजर नहीं आ रहा था, उसी दिल्ली में कांग्रेस आम आदमी पार्टी को पीछे छोड़ते हुए दूसरे नंबर की पार्टी बनी।
अगर शीला दीक्षित लगातार 15 वर्षों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री बनी रहीं और लोगों की चहेती मुख्यमंत्री के रूप में विख्यात रहीं तो उसकी सबसे बड़ी वजह यही रही कि उन्होंने दिल्ली में इन डेढ़ दशकों में ऐसे-ऐसे कार्य किए, जिन्होंने दिल्ली की तस्वीर बदलकर देश की राजधानी को आधुनिक दिल्ली का दर्जा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ट्रैफिक जाम से जूझती दिल्ली में फ्लाईओवरों और सड़कों का जाल बिछाने की बात हो या विश्वस्तरीय मेट्रो सेवा की दिल्ली में शुरूआत और उसका विस्तार, इनका श्रेय शीला को ही जाता है। इसके अलावा उन्होंने यातायात प्रदूषण से कराहती दिल्ली में स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के लिए सड़कों पर सीएनजी बसें उतारने का फैसला लिया। हालांकि इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था किन्तु अगर तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए शीला ने प्रदूषण की विकराल होती समस्या के मद्देनजर सार्वजनिक यातायात के लिए डीजल की बजाय सीएनजी बसें सड़कों पर उतारने के फैसले को अमलीजामा पहनाया तो यह शीला की दूरदर्शिता का ही प्रमाण था। आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देते हुए उन्होंने ट्रांसपोर्टरों के प्रबल विरोध के बावजूद दिल्ली की सड़कों पर अराजकता और प्रदूषण का पर्याय बन चुकी ब्लू लाइन बसों को दिल्ली की सड़कों से बाहर करते हुए सीएनजी चालित बसों की शुरूआत की। उसके बाद तीन पहिया ऑटो को भी सीएनजी में परिवर्तित किया गया। उनके कार्यकाल में स्कूलों की स्थिति में सुधार तथा लड़कियों की शिक्षा के लिए काफी प्रयास किए गए और बच्चियों को स्कूलों तक लाने के लिए पहली बार लड़कियों के लिए सैनिटरी नैपकिन बंटवाए गए। उन्होंने दिल्ली में कुछ विश्वविद्यालय बनवाने के साथ-साथ इंजीनियरिंग छात्रों के लिए ट्रिपल आईआईटी की भी नींव रखी।
बहरहाल, शीला दीक्षित के निधन के बाद दिल्ली कांग्रेस में एक ऐसा राजनीतिक शून्य पैदा हो गया है, जिसकी भरपाई कर पाना कांग्रेस के लिए मुश्किलभरा होगा। दिल्ली में अगले साल जनवरी-फरवरी में विधानसभा चुनाव होने हैं। लोकसभा चुनाव में दिल्ली में आप को पछाड़कर दूसरे स्थान पर रही कांग्रेस की इन चुनावों में नैया पार लगाने के अभियान में शीला दीक्षित पुरजोर तरीके से जुटी थीं। दिल्ली कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि उसके पास नेताओं की बड़ी फौज में ऐसा कोई नेता नहीं है, जो लोकप्रियता के मामले में शीला की शख्सियत के समकक्ष नजर आता हो। न ही एक भी ऐसा नेता है, जो कई गुटों में बंटी प्रदेश कांग्रेस को एकजुट करने की क्षमता रखता हो। ऐसे में अब दिल्ली में कांग्रेस कांग्रेस की दिक्कत बढ़ने के आसार हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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