लंबी लड़ाई की तैयारी

-सिद्धार्थ शंकर-

(ऐजेंसी/सक्षम भारत)

कृषि कानूनों पर सरकार और किसान संगठनों के बीच जारी खींचतान का दौर जल्द खत्म होने वाला नहीं है। सरकार की योजना आंदोलनरत किसान संगठनों को वार्ता की पेशकश करते रहने के साथ इन कानूनों के समर्थन में अभियान जारी रखने की है। इस बीच जरूरत पडने पर सरकार बातचीत का समर्थन करने वाले किसान संगठनों से वार्ता कर सकती है। हालांकि सरकार की योजना फिलहाल हड़बड़ी दिखाने की नहीं है। किसान संगठनों और सरकार के बीच बातचीत की संभावना नहीं बन रही है। सरकार न तो कानून वापस लेने के लिए राजी होगी और न न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानूनी गारंटी देगी। जबकि आंदोलनरत किसान संगठनों की मुख्य मांगें यही हैं। जाहिर तौर पर वार्ता की मेज पर आने के लिए दोनों पक्षों में से एक को अपने रुख में नरमी लानी होगी। फिलहाल दूर-दूर तक इसके आसार नहीं हैं। करीब एक महीने से जारी आंदोलन के बीच पांच दौर की बातचीत के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकल सका है। ऐसे में सरकार और किसान संगठनों के बीच माइंडगेम चल रहा है।
दोनों पक्ष एक दूसरे के झुकने का इंतजार कर रहे सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह तो बातचीत के लिए तैयार है, मगर किसान संगठन अपनी जिद पर अड़े हैं। सरकार हड़बड़ी के मूड में नहीं है। उसे उम्मीद है कि आंदोलन लंबा खिंचने के बाद किसान संगठन दबाव में आएंगे। आंदोलनरत किसान संगठनों को दबाव में लाने के लिए सरकार वार्ता समर्थक किसान संगठनों से अलग से बात कर सकती है। सरकारी रणनीतिकारों को लगता है कि नए कानूनों के समर्थन में चल रहा अभियान और सरकार के अपने रुख पर डटे रहने से किसान संगठन दबाव में आएंगे। इसके बाद कानूनों की वापसी और एमएसपी के इतर अन्य प्रावधानों पर बातचीत होगी। सरकार की तरह आंदोलनरत किसान संगठनों ने भी लंबी लड़ाई की तैयारी की है। एक महीने से जारी आंदोलन में सरकार की इच्छा के अनुरूप बड़े मतभेद सामने नहीं आए।
किसान संगठन यह मान कर चल रहे हैं कि लड़ाई लंबी खिंचेगी। बड़ी बात यह है कि किसानों में जमीनी स्तर पर पकड़ रखने वाले संगठनों में अब तक फूट नहीं पड़ी है। कानूनों के पक्ष में सरकार को समर्थन करने वाले किसान संगठनों का कोई मजबूत जमीनी आधार नहीं है। इस विवाद का हल निकालने के लिए कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ ही रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और गृहमंत्री अमित शाह भी मोर्चे पर लगे हैं। मगर अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है जिससे कहा जा सके कि आंदोलन खत्म होने वाला है। अब तो किसान इस लड़ाई को भारत से बाहर ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। किसानों ने ब्रिटेन के सांसदों को पत्र लिखने का मन बनाया है ताकि गणतंत्र दिवस पर अपने प्रधानमंत्री को भारत आने से रोकें। किसानों ने विदेश में बसे भारतीयों से भी आग्रह किया है कि वह जिस देश में हैं, वहां भारतीय दूतावास के बाहर किसान आंदोलन के समर्थन में धरना प्रदर्शन करें। किसान नेता हरेंद्र सिंह लखोवाल, एडवोकेट प्रेमसिंह, हरदेव सिंह संधु, मेजर सिंह पुन्नावाल ने कहा, किसानों ने सरकार के प्रस्ताव को नकारने के बाद अब लिखित में जवाब देने का फैसला किया है। इसके लिए बुधवार को सभी संगठनों से मंत्रणा कर केंद्र को जवाब भेजा जाएगा। किसानों ने सरकार से दो टूक पूछा है कि किसान कानून रद्द होंगे या नहीं, इसके बाद वह बताएंगे कि बातचीत के लिए जाएंगे या नहीं। किसानों का यह कदम सही है या नहीं, यह बहस का विषय जरूर है।

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