राजनैतिकशिक्षा

कानून से नहीं रूकेगा दलबदल

-अजीत द्विवेदी-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

दलबदल को लेकर सबसे बुनियादी सवाल यह है कि यह कानूनी मामला है या राजनीतिक नैतिकता का मामला है? इस सवाल के जवाब से ही इस समस्या का हल निकलना है। दुर्भाग्य से भारत में दलबदल को पूरी तरह से कानूनी मामला बना दिया गया है, इसलिए यह समस्या दिन प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है और यह भी स्थापित होता जा रहा है कि कानून के जरिए इसका समाधान नहीं निकल सकता है। वैसे भी भारत में जो चीज कानून के दायरे में आ जाती है वह नैतिकता से परे हो जाती है। कानून के दायरे में आते ही वह इस तरह उलझ जाती है कि उसे सुलझाना नामुमकिन हो जाता है। जैसे अभी दलबदल का मामला उलझा है। महाराष्ट्र के ताजा घटनाक्रम ने इससे जुड़े कई सवालों को फिर से उभार दिया है।

सबसे पहला और अहम सवाल तो यह है कि विधायकों की अयोग्यता का फैसला करने का अधिकार किसका है? संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे दलबदल कानून के नाम से भी जाना जाता है उसमें साफ कहा गया है कि विधायकों की अयोग्यता का फैसला स्पीकर करेगा और स्पीकर की गैरहाजिरी में डिप्टी स्पीकर करेगा। लेकिन अगर स्पीकर या डिप्टी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लंबित है तो वह फैसला कर पाएगा या नहीं, इस सवाल का जवाब नहीं है। महाराष्ट्र के घटनाक्रम से यह सवाल उठा है क्योंकि शिव सेना के बागी विधायकों का साथ दे रहे दो निर्दलीय विधायकों ने महाराष्ट्र विधानसभा के डिप्टी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे दिया। इसके बाद बागी विधायकों ने डिप्टी स्पीकर की ओर से दिए गए अयोग्यता के नोटिस को इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने भी डिप्टी स्पीकर के फैसले को पलट कर बागी विधायकों को जवाब देने के लिए दो हफ्ते का समय दे दिया। सो, एक सवाल यह भी है कि क्या अयोग्यता का फैसला होने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट स्पीकर या डिप्टी स्पीकर के फैसले में दखल दे सकता है? उम्मीद करनी चाहिए कि 11 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में इस मसले पर सुनवाई होगी तो कोई स्पष्ट जवाब मिलेगा।

लेकिन यह तय है कि सुप्रीम कोर्ट का चाहे कोई भी फैसला हो या संविधान में लिखी गई कोई भी बात हो या संसद से बना हुआ कोई भी कानून हो वह दलबदल को नहीं रोक सकता है, अगर राजनीति में नैतिकता और शुचिता की बहाली नहीं होती है। नैतिकता और शुचिता का सवाल बहुत बड़ा है। आज के संदर्भ में देखें तो राजनीति में इनकी बहाली एक असंभव लक्ष्य है। लेकिन ज्यादा समय नहीं बीता, जब इसे राजनीति में बहुत सहज माना जाता था। जब कोई दलबदल कानून नहीं था तब भी नेता एक ही पार्टी में जीवन बीता देते थे। हेमवती नंदन बहुगुणा की मिसाल है कि जब 1981 में सर्वशक्तिशाली इंदिरा गांधी से उनके मतभेद हुए और उन्होंने कांग्रेस छोड़ी तो कोई कानून बाध्यता नहीं होने के बावजूद उन्होंने लोकसभा सीट से भी इस्तीफा दे दिया। वे उपचुनाव लड़े और इंदिरा व संजय गांधी के तमाम प्रयासों के बावजूद गढ़वाल की अपनी पारंपरिक सीट से जीते। कुछ दिन पहले की मिसाल बिहार के नेता दिग्विजय सिंह की है, जो जनता दल यू से अलग हुए तो राज्यसभा से इस्तीफा दिया और बांका लोकसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ कर जीते। इसका मतलब है कि नैतिक बल दिखाने वाले नेताओं का जनता पहले भी सम्मान करती थी और आज भी करती है।

बहरहाल, सोचें कि अब ऐसा क्या बदल गया कि पहले दलबदल कानून नहीं होने के बावजूद नेता एक ही पार्टी में या एक ही विचारधारा के साथ जीवन बीता देते थे और अब कपड़े की तरह पार्टियां बदल रहे हैं? सबसे बड़ा बदलाव तो यह हुआ है कि राजनीति में विचारधारा का लोप हो गया है। थोड़े से अपवाद हैं लेकिन पार्टियों व नेताओं के पास विचारधारा नहीं बची है। दूसरा बदलाव यह हुआ है कि राजनीति समाजसेवा का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि सत्ता और धन हासिल करने का माध्यम बन गई है। यह असीम सत्ता, अकूत संपत्ति और विलासिता का जीवन हासिल करने का साधन बन गई है। इसलिए पार्टियां और नेता दोनों अपने आचरण में भ्रष्ट हुए हैं। हैरानी नहीं है कि सबसे ज्यादा भ्रष्ट वह हुआ या दलबदल का सबसे ज्यादा शिकार वह पार्टी हुई जो सबसे लंबे समय तक सत्ता में रही। जिसने सत्ता का सुख कम भोगा उसके यहां अब भी विचारधारा या नैतिकता कुछ बची हुई है।

इसलिए जब तक नैतिकता की पुनर्स्थापना नहीं होती है और विचारधारा का आग्रह मजबूत नहीं होता है तब तक सिर्फ कानून के दम पर दलबदल को नहीं रोका जा सकता है। पिछले कई अनुभवों से यह प्रमाणित हुआ है कि कानून से बचने का कोई न कोई रास्ता खोज लिया जाता है। दलबदल कानून में प्रावधान है कि अगर कोई सांसद या विधायक पार्टी के ह्विप के खिलाफ वोट करता है तो उसकी सदस्यता चली जाएगी लेकिन अगर दो-तिहाई सांसद या विधायक पार्टी ह्विप का उल्लंघन करके किसी दूसरी पार्टी के साथ चले जाते हैं तो उनके ऊपर दलबदल का कानून लागू नहीं होगा। दलबदल कानून से बचने का एक रास्ता यह है कि सांसद या विधायक अपनी सीट से इस्तीफा दे दे। इसके अलावा दलबदल कानून से बचने का एक रास्ता जोर-जबरदस्ती का है। जिसके हाथ में सत्ता होती है वह फैसला लंबित रखता है। जैसे तृणमूल कांग्रेस के दो सांसदों- शिशिर अधिकारी और सुनील मंडल भाजपा के साथ चले गए हैं लेकिन एक साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी स्पीकर ने उनकी अयोग्यता पर फैसला नहीं किया है। इसी तरह भाजपा के विधायक मुकुल रॉय तृणमूल में चले गए हैं लेकिन विधानसभा के स्पीकर ने उनकी अयोग्यता पर फैसला नहीं किया है। इसके अलावा भी कई उलझे हुए और आड़े-तिरछे रास्ते हैं, जिनसे विधायक या सांसद दलबदल कानून से बचते रहे हैं।

कुछ लोगों की सलाह है कि यह कानून बना दिया जाए कि किसी पार्टी से जीतने वाला सांसद या विधायक अगर दलबदल करता है तो उसे अनिवार्य रूप से इस्तीफा देकर फिर से चुनाव लड़ना होगा। लेकिन क्या हो जाएगा? कर्नाटक और मध्य प्रदेश में यहीं तो हुआ। कांग्रेस से जीते विधायकों ने पार्टी छोड़ी, इस्तीफा दिया और सरकार गिर गई। बाद में वे भाजपा की टिकट से जीत कर विधानसभा में पहुंचे और मंत्री बने। एक सलाह यह है कि दलबदल करने वाले सांसद या विधायक पर कम से कम एक चुनाव की पाबंदी लगाई जाए। यानी अगर वह लोकसभा सदस्य है तो उसे उस लोकसभा में दोबारा चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी जाए और विधायक है तो उस विधानसभा में नहीं लड़ने दिया जाए। लेकिन इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि आज भी नेता अगर किसी वजह से अयोग्य होते हैं तो अपने बेटे-बेटी, पत्नी या किसी दूसरे रिश्तेदार को चुनाव लड़ाते हैं।

तभी यह तय है कि जब तक राजनीतिक दलों और नेताओं की नैतिकता और आचरण की शुचिता बहाल नहीं होती है तब तक दलबदल नहीं रूकेगा। अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि दलबदल करा कर अगर सत्ता मिलती है तो वे उसे चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करेंगे। जब तक नेताओं में यह भावना नहीं आती है और राजनीति में सत्ता को ही सब कुछ मानने की धारणा नहीं बदलती है तब तक कानून से कुछ नही होगा।

 

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