समझ से परे है चुनाव सुधार बिल के विरोध में विपक्ष का हंगामा

-अजय कुमार-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

देश में चुनाव की प्रक्रिया में सुधार की जरूरत काफी समय से महसूस की जा रही थी, बोगस वोटिंग हो या फिर जो मतदाता किन्हीं कारणों से मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पाते हैं, दोनों ही लोकतंत्र के लिए चिंता के विषय हैं। इसके लिए चुनाव आयोग और देश की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) तक कई बार भारत सरकार को आगाह कर चुकी है। बुद्धिजीवी और समाज सुधारक भी निष्पक्ष चुनाव के लिए उपयोगी कदम उठाने की बात करते रहते हैं, लेकिन हमारे नेताओं और सरकारो ने इस ओर कभी कोई ध्यान ही नहीं दिया है। अब मोदी सरकार ने कुछ सख्त कदम उठाए हैं तो विपक्ष चुनाव सुधारों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। यहां तक की चुनाव प्रक्रिया को मतदाता की निजता से जोड़ दिया है, वोटर कार्ड को आधार कार्ड से जोड़े जाने के खिलाफ ऐसा हो हल्ला मचाया जा रहा है जैसे वोटर कार्ड के आधार से लिंक होते ही मतदाता की सारी जानकारी सरकार के पास चली जाएगी, जबकि जो जानकारी सरकार के पास जाने की बात विपक्ष के नेता कर रहे हैं, वह जानकारी पहले से ही सरकार के पास मौजूद है, सरकार के पास लोगों की जानकारी है तो इसमें बुराई भी क्या है। इस पर चिंता तब तक नहीं करना चाहिए जब तक की सरकार अपने पास मौजूद आकड़ों का बेजा इस्तेमाल नहीं करती है।

बहरहाल, मोदी सरकार की आलोचना के बजाए उसकी इस बात के लिए तारीफ करना चाहिए कि उसने चुनाव सुधार के लिए बड़ा कदम उठाया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वह साझा मतदाता सूची बनाने की दिशा में जल्द तेजी देखने को मिलेगी। यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में साझा मतदाता सूची का वादा किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ की बात कह चुके हैं। मोदी सरकार बनने के बाद विधि आयोग ने भी 2015 में अपनी रिपोर्ट में एक देश-एक चुनाव और साझा मतदाता सूची की सिफारिश की थी, वैसे पहले भी भारत निर्वाचन आयोग ने वर्ष 1999 और वर्ष 2004 में इसी तरह की रिपोर्ट तत्कालीन सरकार को दी थी, लेकिन उस समय की सरकारों ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की थी।

मोदी सरकार पूरे देश में एक ही मतदाता सूची पर राज्य सरकारों के बीच सहमति बनाने और इसी अनुरूप विधायी बदलाव करने पर विचार कर रही है। इस सिलसिले में दो विकल्प अपनाने पर विचार किया जा सकता है। पहला, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243 (के) और 243 (जेडए) में संशोधन करके देश के सभी चुनावों के लिए एक समान मतदाता सूची को अनिवार्य किया जा सकता है। यह नियम राज्य निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची तैयार करने और स्थानीय निकायों के चुनावों का संचालन करने का अधिकार देता है। दूसरा, निर्वाचन आयोग या भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों को अपने कानूनों में संशोधन करने और नगरपालिका तथा पंचायत चुनावों के लिए राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची को अपनाने के लिए राजी किया जाए। बता दें संविधान का अनुच्छेद 324 (1) चुनाव आयोग को संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए निर्वाचक नामावली की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार देता है।

गौरतलब हो, इस समय देश में कई मतदाता सूचियां मौजूद हैं। देश के कई राज्यों में पंचायत और नगरपालिका चुनावों के लिए जिस मतदाता सूची का प्रयोग किया जाता है वह संसद और विधानसभा चुनावों के लिए उपयोग की जाने वाली सूची से भिन्न होती है। इस प्रकार के अंतर का मुख्य कारण यह है कि हमारे देश में चुनावों की देखरेख और उसके संचालन की जिम्मेदारी भारत निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग को दी गई है। कुछ राज्य अपने राज्य निर्वाचन आयोग को स्थानीय चुनाव के लिए राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार की गई मतदाता सूची का उपयोग करने की स्वतंत्रता देते हैं। जबकि कुछ राज्यों में निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची को केवल आधार के तौर पर प्रयोग किया जाता है। इस समय उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, असम, मध्य प्रदेश, केरल, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर शेष राज्य और केंद्रशासित प्रदेश स्थानीय निकाय के चुनावों के लिए राष्ट्रीय चुनाव आयोग की मतदाता सूची का प्रयोग करते हैं। लिहाजा संविधान में संशोधन करना आसान होगा।

आम-आदमी के मन में इस सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर पूरे देश के लिए एक ही मतदाता सूची बनाए जाने की आवश्यकता क्यों है? तो हमें यह समझना होगा कि इसके माध्यम से ही मोदी सरकार की ‘एक देश-एक चुनाव’ की अवधारणा को मूर्त रूप दिया जा सकेगा, जिसकी घोषणा बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में की थी। इसके अलावा एक मतदाता सूची होने से अलग-अलग मतदाता सूची के बनाने में आने वाले खर्च और श्रम दोनों की बचत होगी। इसके साथ ही एक ही मतदाता सूची बनाने के पीछे यह तर्क भी दिया जाता है कि दो अलग-अलग संस्थाओं द्वारा तैयार की जाने वाली अलग-अलग मतदाता सूचियों के निर्माण में काफी अधिक दोहराव होता है, जिससे मानवीय प्रयास और व्यय भी दोगुने हो जाते हैं। जबकि एक मतदाता सूची के माध्यम से इसे कम किया जा सकता है। इसके अलावा अलग-अलग मतदाता सूची होने से मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होती है, क्योंकि कई बार एक मतदाता सूची में व्यक्ति का नाम मौजूद होता है, जबकि दूसरे में नहीं। लिहाजा देश में साझा मतदाता सूची बनाए जाने की आवश्यकता है।

खैर, उक्त नजरिया सत्ता पक्ष का है, जबकि विपक्ष की अपनी शंकाए हैं। विपक्ष कह रहा है कि जिस हड़बड़ी में मोदी सरकार द्वारा चुनाव सुधार विधेयक-2021 पारित कराया गया है। वह अच्छी मिसाल नहीं हैं। विपक्ष का आरोप है कि आधार को वोटर आईडी कार्ड से जोड़ने की बात जब से शुरू हुई है, तभी से इसके संभावित दुरुपयोग की आशंकाएं भी जताई जा रही हैं। इन्हीं आशंकाओं की वजह से इसका विरोध भी हो रहा है। 2015 में चुनाव आयोग की तरफ से आधार डेटा के सहारे मतदाता सूची से फर्जी नाम हटाने और दोहराव मिटाने का एक पायलट प्रॉजेक्ट शुरू किया गया था। मगर सुप्रीम कोर्ट ने इस पहल पर रोक लगा दी थी। यह बात बार-बार स्पष्ट होती रही है कि आधार कार्ड का इस्तेमाल पते के सबूत के रूप तो किया जा सकता है, लेकिन इसे किसी की नागरिकता का प्रमाण नहीं करार दिया जा सकता। हालांकि मौजूदा विधेयक में आधार नंबर को वोटर आईडी कार्ड से जोड़ने की व्यवस्था को ऐच्छिक रखा गया है और इसी आधार पर सरकार इसके विरोध को अनावश्यक बता रही है, लेकिन विपक्ष को लगता है कि भारत सरकार जब चाहेगी,एच्छिक वाले प्रावधान को खत्म करके इसे जरूरी करने में देरी नहीं करेगी।

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