पंजाब को अस्थिर करने की कोशिश

-कुलदीप चंद अग्निहोत्री-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

अकाल तख्त के जत्थेदार हरप्रीत सिंह पिछले कुछ दिनों से पंजाब की स्थिति को लेकर चिंता प्रकट कर रहे हैं। उनका कहना है कि ईसाई मिशनरियां पंजाब के लोगों को ईसाई पंथ में दीक्षित कर रही हैं, जिसे रोका जाना चाहिए। उनका कहना है कि हालत मुगल काल जैसी हो रही है, जिसका अभिप्राय है कि मुगल काल में पंजाब में इस्लाम पंथ में मतांतरित किया जाता था और आज उन्हें यीशु मसीह के पंथ में मतांतरित किया जा रहा है। हालत यहां तक हो गए हैं कि जालंधर में एशिया का सबसे बड़ा चर्च बनाने की तैयारियां हो रही हैं। हरप्रीत सिंह ने मुगल काल का उदाहरण दिया है, उसमें गहरे अर्थ छिपे हैं। कोई अपनी इच्छा से अपना मजहब यानी पूजा-पाठ का तरीका बदल ले, इसमें भला किसी को क्या एतराज हो सकता है। लेकिन लालच या भय से मजहब बदलने के लिए षड्यंत्र किए जाएं, यह निश्चय ही अपराध की श्रेणी में आता है। मुगल काल में मजहब परिवर्तन का यह कार्य राजसत्ता के माध्यम से लालच और डर द्वारा किया जाता था।

यही कारण था कि 1947 से पहले सप्त सिंधु (जो पंजाब का ही पूर्ववर्ती नाम था) का बड़ा हिस्सा पश्चिमी पंजाब, खैबर पख्तूनखबा और सिंध का अधिकांश भाग इस्लाम मजहब में मतांतरित हो गए थे। मुगलों के इस अभियान का मुक़ाबला मध्यकाल की दशगुरु परंपरा, जिसकी शुरुआत श्री नानक देव जी ने की थी, ने साहसपूर्वक किया। शायद तभी किसी ने कहा था, होते न गोविंद सिंह तो सुन्नत होती सबकी। लेकिन जब सप्त सिंधु पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया तो उन्होंने पंजाब को अपने मजहब में दीक्षित करने का अभियान शुरू कर दिया। सबसे पहले ईसाई मत में मतांतरण का अड्डा लुधियाना ही बना था। गुरदासपुर और अमृतसर के देहाती इलाके बाद में निशाने पर आए। अंग्रेजों ने गुरु ग्रंथ साहिब का अनुवाद एक ईसाई पादरी ट्रम्प से इस मतांतरण अभियान को गति देने के लिए ही करवाया था। तभी से चला यह अभियान अभी तक निरंतर चल ही रहा है। अलबत्ता इतना अंतर जरूर पड़ा है कि पहले यह अभियान मोटे तौर पर अनुसूचित जातियों तक ही सीमित था, अब मिशनरियों ने पंजाब के जाट समुदाय को भी अपने घेरे में ले लिया है। इस पृष्ठभूमि में हरप्रीत सिंह के वक्तव्य में, मुगल काल के उल्लेख को समझने की जरूरत है। जिस प्रकार मुगल काल में मतांतरण के लिए लालच व भय का इस्तेमाल किया जाता था, उसी प्रकार इक्कीसवीं शताब्दी में अब ईसाई मिशनरियां पंजाब में मतांतरण के लिए लालच व भय का इस्तेमाल कर रही हैं। व्यापक अर्थों में फ्रॉड या धोखाधड़ी का भी इस्तेमाल हो रहा है।

इसमें क्या राज्य सत्ता की भी भागीदारी है? यह तो जांच से ही पता चल सकता है, लेकिन देश में आम मान्यता है कि जबसे कांग्रेस पर सोनिया परिवार का कब्जा हुआ है, तब से किसी न किसी प्रकार से देश में ईसाई मजहब में मतांतरण के अभियान को प्रत्यक्ष या परोक्ष हवा दी जा रही है। धोखाधड़ी व लालच से इस मतांतरण अभियान का पहले ही नोटिस लिया जाना चाहिए था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ इस विषय पर अनेक बार चिंता प्रकट कर चुका है। लेकिन इस षड्यंत्र में लगे लोग तुरंत ध्यान बंटाने के लिए संघ को ही निशाने पर लेने लगते थे। कम्युनिस्टों को वही पंजाब अनुकूल लगता है जो अपनी जड़ों से कट जाए। मजहबी सिख या वाल्मीकि, भगवान वाल्मीकि से कट जाएं और आधर्मी रविदास से किनारा कर लें। जो लोग अपनी जड़ों, अपनी परंपराओं, अपने इतिहास और अपनी विरासत से जुड़े रहते हैं, वहां कम्युनिज्म की अनास्था की विषबेल फल-फूल नहीं सकती। यही कारण है कि पंजाब की धरती पर कम्युनिज्म बाब-बार जड़ जमाने की कोशिश करता है और फिर मुर्झा जाता है। यही कारण है कि कम्युनिस्टों को ईसाई मिशनरियों का यह मतांतरण अभियान अपने हितों के अनुकूल लगता है। राजनीतिक दल इसलिए चुप रहते हैं कि उन्हें एकमुश्त वोटों की जरूरत रहती है। यदि पंजाब में भी मतांतरित पंजाबियों का ईसाई मजहब के नाम पर एक तगड़ा समूह उभर आता है तो उनको डरा कर या फुसला कर एकमुश्त वोट लिए जा सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को न तो वोट लेने हैं और न ही चुनाव लडना है। इसलिए वह शुरू से ही इस विपत्ति से सचेत करता आ रहा है। यही कारण है कि वह पंजाब में उन स्वार्थी समूहों के निशाने पर आ जाता है जिनको ईसाई मिशनरियों के इस मतांतरण अभियान में अपना लाभ दिखता है। कांग्रेस को यह नीति सर्वाधिक अनुकूल लगती है क्योंकि उनकी वैचारिक जड़ हिंदुस्तान के इतिहास व दर्शन में है ही नहीं। वे उसी रास्ते पर चल रहे हैं जो गोरे महाप्रभु हिंदुस्तान के लिए निर्धारित कर गए थे। शायद यही कारण होगा कि ईसाई मिशनरियों ने अपने एक चंगाई सम्मेलन में मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के चित्र का भी इस्तेमाल किया। इसमें कोई शक नहीं कि मिशनरियां इस संक्रमण काल में पंजाब को अस्थिर करना चाहती हैं। सही समय पर जत्थेदार हरप्रीत सिंह ने पंजाबवासियों को सचेत किया है।

हरप्रीत सिंह का पंजाब के इतिहास और परंपराओं को लेकर गहरा अध्ययन है। इतना ही नहीं, उन्होंने विभिन्न मजहबों का भी अध्ययन किया है। बड़े स्तर पर मतांतरण के क्या ख़तरे हो सकते हैं, इसका भी उनको इल्म है। समय की मांग है कि पंजाब के सभी राजनीतिक दल हरप्रीत सिंह की इस चिंता की गंभीरता को समझें और इसका सामना करने की रणनीति पर विचार करके कोई समाधान निकालें। यह समाधान निकालना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि हमारा दुश्मन देश पाकिस्तान भी पंजाब को बार-बार अस्थिर करने के प्रयासों में लगा है। पाकिस्तान से पंजाब में नशीले पदार्थों की तस्करी के मामले किसी से छिपे नहीं हैं। पाकिस्तान का प्रयास है कि किसी तरह पंजाब की युवा पीढ़ी को नशेबाज बना दिया जाए, ताकि वह पंजाब की तरक्की और देश की एकता-अखंडता में कोई अंशदान न कर सके। इसलिए पंजाब सरकार को भी पाकिस्तान के इस प्रयास को नेस्तनाबूद करने के लिए आगे आना चाहिए। वास्तव में पाकिस्तान पंजाब की समृद्ध युवा पीढ़ी को देखना नहीं चाहता। इसलिए पंजाब की युवा पीढ़ी को बरगलाने का अभियान उसने छेड़ा हुआ है। यह बिल्कुल ठीक समय है, जब पंजाब में सक्रिय सभी दलों को न केवल पाकिस्तान के खिलाफ सामने आना चाहिए, बल्कि मतांतरण अभियान पर भी अंकुश लगाने के लिए चिंतन करना चाहिए। तभी हम एक समृद्ध पंजाब की कल्पना कर सकते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *