आपातकाल एक काला अध्याय

-सुरेश भारद्वाज-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

अभिव्यक्ति की आजादी एक बहुचर्चित विषय है और 25 जून का दिन इस बारे चिंतन करने का एक महत्वपूर्ण दिन है। 25 जून 1975 को इस देश में वो सब घटित हुआ जिसकी कल्पना करना भी विभित्स्कारी है। स्वार्थ के आगे लोकतंत्र को धराशायी करने का आपातकाल एकमात्र उदाहरण है। और यह सब अचानक ही नहीं हुआ। व्यक्तिपूजा की कांग्रेस की परिपाटी का ही परिणाम था जो कि 1974 में तत्कालीन अध्यक्ष डीके बरूआ ने इंदिरा ही इंडिया और इंडिया ही इंदिरा जैसा नारा दिया। इस विचार के खिलाफ जो भी घटित होता वो इंदिरा गांधी को असुरक्षित कर देता। इसी तानाशाही विचारधारा ने आपातकाल को जन्म दिया। हालांकि आज के परिवेश में कुछ तत्व अभिव्यक्ति की आजादी के बारे में चर्चा करते हैं और दुःर्भाग्य से ऐसी विचारधारा आज चर्चा कड़ी करना चाहती है जिसने 1975 में आज ही के दिन देश को आपातकाल के अंधकार में धकेल दिया था और कारण था सत्ता छिन जाने का डर। न्यायालय व न्यायिक प्रक्रियाओं पर अंगुली उठाने वाली विचारधाराएं अचानक से भूल गयीं कि एक समय सत्ता की लोलुप्ता में देश के संविधान को उन्हीं के द्वारा रौंदा जा चुका है। लेकिन आज के समय में एक नयी प्रवृत्ति ने जन्म ले लिया है। कांग्रेसी विचारधारा अपने इस कुकृत्य को आने वाली पीढ़ी से छिपाना चाहती है और इसके लिए दुष्प्रचार का सहारा लिया जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर व्यर्थ में सवाल खड़े किए जाते हैं और ये बताने का प्रयास होता है जैसे देश में हालात सामान्य न हो। और कांग्रेस का साथ वामपंथ और दूसरी समर्थित विचारधाराएं देती हैं जिनका लक्ष्य एक झूठा परिप्रेक्ष्य तैयार करना है। लेकिन इस कालखंड का मेरा निजी अनुभव है।

आपातकाल लगते ही देश से लोकतंत्र की मर्यादाएं रौंद दी गयी और मौलिक अधिकार छीन लिए गए। जिन नागरिकों ने सरकार का विरोध किया उन्हें बिना दलील व अपील के जेल में डाला गया। इस सब का आधार बना इलाहाबाद उच्च न्यायालय का एक मुकद्दमा जो राज नारायण बनाम उत्तर प्रदेश के नाम से जाना गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इस मामले में एक निर्णय दिया जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इतना भयभीत हुई कि देश पर कब्जा करने का प्रपंच रच डाला। देश में पहले ही सरकार की खिलाफत हो रही थी और बिहार में लोकनायक जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन चरम पर था। लेकिन इस मामले में सिन्हा ने अपने निर्णय में न केवल इंदिरा गांधी को रायबरेली से सांसद के रूप में चुनाव को अवैध करार दे दिया बल्कि अगले छह साल तक उनके कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक भी लगा दी। ऐसे में इंदिरा गांधी न लोकसभा की सदस्य रहीं, न ही राज्यसभा जा सकती थीं। सारे विकल्प तलाशने के बाद कांग्रेस की सरकार ने तय किया कि देश को आपातकाल के अंधकार में झोंक दिया जाए। आज शोर मचाने वाली विचारधारा ने उस समय अभिव्यक्ति के सभी स्नोतों पर प्रतिबंध लगाने का काम किया और सभी यातनाओं, षड्यंत्रों के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व आनुषंगिक संगठनों का भूमिगत गतिविधियां जारी रखने में महत्वपूर्ण योगदान रहा। जिस मीडिया के कंधे पर बंदूक रख कर सरकार को घेरने का कुत्सित प्रयास कांग्रेस व समर्थित विचारधारा द्वारा किया जा रहा है, उसी मीडिया को तालाबंद कर दिया गया था। देश भर में हुए अत्याचार की कहानी शाह कमीशन की रिपोर्ट बयान करती है, लेकिन कांग्रेस विचारधारा अपने उस कुकृत्य पर चुप है और देश में ऐसा माहौल बनाने का प्रयास कर रही है जिससे उनका दुष्कार्य जनता भूल जाए।

लेकिन हम सबने अंग्रेजों के शासनकाल के रोलेट एक्ट जिसे काला कानून भी कहा जाता है, के बारे में सुना था, मगर आपातकाल का कालखंड निश्चित रूप से उससे भी भयावह था। आपातकाल में लोगों के मौलिक अधिकार छीन लिए गए। ये वे अधिकार हैं जिनके बिना किसी नागरिक का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। इन अधिकारों की प्राप्ति के लिए लोगों ने एक लंबी लड़ाई लड़ी थी। आपातकाल का जिसने भी विरोध किया, उन्हें जेलों में डाल दिया गया। इनमें अटल बिहारी वाजपेयी तथा लालकृष्ण आडवाणी के नाम भी शामिल हैं। हिमाचल प्रदेश में भी शांता कुमार तथा असंख्य अन्य विपक्ष के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इस दौरान मुझे भी गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। इसके बावजूद लोकतंत्र के प्रहरी आपातकाल के खिलाफ लड़ते रहे और अंततः उन्हें जीत हासिल हुई। बाद के वर्षों में आपातकाल हटा दिया गया। जब लोकसभा के चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी को हार का सामना करना पड़ा और वह सत्ता से बाहर हो गईं। इस तरह देश में लोकतंत्र का बहाल कराने में विपक्ष के नेताओं की बड़ी भूमिका रही। इंदिरा गांधी ने केवल अपनी सत्ता बचाने के लिए पूरे देश को आपातकाल में झोंक दिया और लोगों से सभी स्वतंत्रताएं और अधिकार छीन लिए। जेलों में जिन नेताओं को डाला गया, उन्हें केवल कैद ही नहीं काटनी पड़ी, बल्कि उनके साथ मारपीट भी कई गई। इसके बावजूद वे लोग डरे नहीं और अंततः लोकतंत्र बहाल हो गया। ऐसे ही लोगों के कारण आज देश में लोकतंत्र जीवित है और आगे भी रहेगा।

 

 

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