नशा माफिया के प्रति समय रहते जागना होगा

-अनुराग पराशर-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

आए दिन एक बार फिर से सभी अखबारों की सुर्खियां हैं कि फलां जिले में चरस की खेप पकड़ी गई, फलां जिला से बड़ा तस्कर पकड़ा गया, चिट्टे की बड़ी खेप पकड़ी गई वगैरा-वगैरा। लगता है जहां एक ओर इसमें संलिप्त लोग पकड़े जा रहे हैं, वहीं बड़ी संख्या में नशे के व्यापारियों का समाज में इतने अंदर गली-कूचों में मौजूद होना स्पष्ट दर्शा रहा है कि नशे के व्यापारी किस तरह अपनी पैठ प्रदेश के आंतरिक स्थानों तक बना पाने में सफल हुए हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि एक बार फिर पुलिस मुस्तैद है या यह जागरूकता कार्यक्रम की सफलता या नशा विरोधी सरकारी या गैर सरकारी संस्थाओं व कार्यालयों का दबाव है। कुछ भी हो, इसके परिणामस्वरूप यह बात तो स्पष्ट है कि एक बार फिर नशा प्रदेश में अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रहा है। आश्चर्य है कि कोरोना काल में भी ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं। समय जागने का आ गया है, ऐसा न हो कि देर हो जाए। नशा जो भी हो, इसे ठीक नहीं ठहराया जा सकता।

नशा शब्द के जेहन में आते ही तस्वीर उभरती है एक ऐसे व्यक्ति की जिसने अपना मूल स्वभाव छोडकर एक ऐसी अवस्था जानबूझ कर ओढ़ ली है जो उसके मूल स्वभाव से बिल्कुल अलग है और वह अल्पकालीन समय के लिए इस अवस्था में आनंद महसूस करता है। अल्पकालीन आनंद कुछ ही दिनों में आदत या मजबूरी कब बन जाती है, इसे वह खुद भी नहीं जानता। वर्तमान प्रतिस्पर्धा के युग में हम तनाव लेने या इससे लडने के बजाय सहनशीलता कम होने की दिशा में आनंद को प्राथमिकता देने की बात तक कह रहे हैं। आश्चर्य की बात है कि इस आनंद लेने के लिए अधिक संख्या में युवा पीढ़ी ही सामने आ रही है, जबकि युवा काल में युवा को हर परिस्थिति का सामना करने में सक्षम होना ही उसके व्यक्तित्व का आवश्यक तत्त्व होता है। इस तरह नशे का शिकार सबसे अधिक युवा पीढ़ी ही हो रही है। शराब, भांग, स्मैक, गांजा, अफीम से अधिक आजकल ‘चिट्टा’ नवयुवक-युवतियों में अधिक पांव पसार रहा है, जो कि एक सिंथेटिक नशा होने के कारण सबसे अधिक खतरनाक सिद्ध हो रहा है। पहले तो यह समझने की आवश्यकता है कि चिट्टा केवल एक ड्रग नहीं है। इसका सफेद रंग ही लैब टेस्टिंग के बाद इसका सिंथेटिक रूप बता सकता है, पर कहते इसे चिट्टा ही हैं। वैसे चिट्टा होता अधिकतर मेथाम्फेटामीन ही है। इसे सीधे मुंह से सूंघ कर, धुएं के जरिए या नस, मांसपेशियों या त्वचा में इंजेक्शन लगाकर प्रयोग में लाया जाता है।

इसके बाद इससे ग्रस्त आदमी मेंटल डिसऑर्डर का शिकार हो जाता है और उसका व्यवहार भी सामान्य आदमी के अनुरूप नहीं रह पाता। इसकी लत जिसे लग जाए, उसका इलाज बार-बार करने पर भी तमाम उम्र उसका पूरी तरह से ठीक होना मुश्किल हो जाता है। इसीलिए इसके पहले समाधान में इससे युवकों, युवतियों या बच्चों को दूर रखना ही प्रमुख है। अब हम आते हैं अन्य उपायों पर। हमें नशे का मूल कारण और इसका निदान आज ही सोचना होगा। नशे का प्रभाव जिसमें मुख्य रूप से सिंथेटिक नशा शामिल है, शारीरिक, मानसिक व सामाजिक रूप में भयावह होने वाला है।

इसके विरुद्ध आम व्यक्तियों को आम राय बनानी होगी। हिमाचल वासियों को इसके विरुद्ध युद्ध छेडना ही होगा, वरना समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर वाली इस देवभूमि पर नशे का कलंक न लग जाए। हाल ही में 15 अगस्त 2020 से 31 मार्च 2021 तक नशा मुक्ति अभियान देश के नशा मुक्ति प्राथमिकता वाले 272 जिलों में आयोजित किया गया। इसमें हिमाचल के शिमला, कुल्लू, चंबा और मंडी जिले भी शामिल थे। कुल्लू में अंतरराष्ट्रीय ड्रग माफिया काफी सक्रिय है और स्थानीय युवाओं को लालच देकर इस धंधे में धकेल रहा है। प्रशासन और गैर सरकारी संस्थाओं का इस ओर ध्यान है और हाल ही में नशा तस्करों की काफी संख्या में पकड़ ने नशा विरोधी अभियान को संबल दिया है, इसमें कोई दो राय नहीं है। समय की पुकार है कि हमें नशे की छोटी-छोटी घटनाओं पर ध्यान देना होगा और आम जनता को भी इसमें भाग लेकर इस बुराई को जड़ से खत्म करने में सहयोग देना होगा। आम जनता का सहयोग इसलिए भी अपेक्षित है क्योंकि आज जो इस घर का, उस घर का बच्चा इसका शिकार हो सकता है, कल हमारे घर का बच्चा भी हो सकता है। ध्यान में आया है कि खासकर सिंथेटिक नशे में लिप्त नशाकर्ता छोटी-मोटी चोरियों से शुरू होकर बड़े-बड़े आपराधिक मामलों में शामिल हो जाते हैं और इन्हें ड्रग माफिया का संरक्षण भी प्राप्त होता है।

नशा विरोधी कार्यकर्ता या आम लोग जो नशा विरोधी अभियानों में आकस्मिक, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष्य रूप से जुड़े हैं, नशाकर्ता इन्हें भी कई तरीकों से अपने गुस्से का शिकार बनाने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। आम नागरिकों को भी इन नशाकर्ताओं पर पूरी तरह नजर रखनी होगी और इन्हें नशा मुक्ति केंद्र के लिए प्रेरित करना होगा। पुनर्वास के बाद भी इनकी गतिविधियों पर लगातार नजर रखनी ही होगी। इन नशाकर्ताओं द्वारा स्ट्रीट लाइटों को तोडकर ब्लैक स्पॉट स्थापित करना, ताकि अंधेरे का लाभ उठाकर यह व्यापार फल-फूल सके, जैसे अन्य जन विरोधी कार्यों को रोकना होगा। जिन क्षेत्रों में चिट्टा व्यापार की अधिक आशंका है, उन चिन्हित ब्लैक स्पाट्स को रोशनी युक्त बनाकर उन्हें किसी भी हालत में खत्म करना ही होगा। नशे के विरुद्ध गांवों में भी जागरूकता लानी होगी। अभियान में प्रमुख रूप से नशा करने वालों और इनके व्यापारियों की आउटरीच, नशे के विरुद्ध जागरूकता, ड्रग पर आधारित आबादी की पहचान और प्रभावी नशामुक्ति पुनर्वास जैसे कार्यों को मुख्य केंद्र बिंदु बनाना होगा। आवश्यकता मानकर नशे के विरुद्ध सरकारी कोशिशों पर ही निर्भर न होकर इसे जन जागरण का मुद्दा बनाना होगा। तभी हम इस पहाड़ी प्रदेश को नशामुक्त देवभूमि का दर्जा प्रदान कर पूरे देश में इसे सम्मान के प्रदेश की संज्ञा देने में पूरी तरह सफल होंगे, जिसमें सफलता जनता के अपेक्षित सहयोग के बिना असंभव है।

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