खाद्य प्रसंस्करण का परिदृश्य

-डा. जयंतीलाल भंडारी-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

हाल ही में केंद्र सरकार ने उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के तहत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए स्वीकृत 10900 करोड़ रुपए के संबंध में दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कहा गया है कि इस पीएलआई योजना से देश में मूल्यवर्धित खाद्य उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा। इससे विदेशी निवेश और निर्यात में बढ़ोतरी होगी। किसानों को उनकी पैदावार के बेहतर दाम मिलने के साथ ही कृषि उपज की बरबादी को कम किया जा सकेगा। साथ ही इससे 2026-27 तक करीब ढाई लाख रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। उल्लेखनीय है कि खाद्य प्रसंस्करण सेक्टर की पीएलआई योजना के तहत रेडी टू ईट और रेडी टू कुक, डेयरी क्षेत्र, फल एवं सब्जी प्रसंस्करण, अनाज का प्रसंस्करण, मांस-मछली, पोल्ट्री प्रसंस्करण, उपभोक्ता वस्तुएं, पैकेट बंद खाद्य और पेय पदार्थ के विनिर्माताओं को उनकी निवेश और संवर्धित बिक्री की प्रतिबद्घता के आधार पर प्रोत्साहन दिया जाएगा। यद्यपि इन सभी खाद्य उत्पादों से संबंधित बहुत अच्छे कृषि आधार भारत के पास हैं, लेकिन इनमें खाद्य प्रसंस्करण के मामले में भारत बहुत पीछे है। विभिन्न रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल खाद्य उत्पादन का 10 फीसदी से भी कम हिस्सा प्रसंस्कृत होता है।

जबकि फिलिपींस, अमरीका, चीन सहित दुनिया के कई देशों में खाद्य प्रसंस्करण भारत की तुलना में कई गुना अधिक है। ऐसे में खाद्य प्रसंस्करण सेक्टर की पीएलआई योजना में खाद्य प्रसंस्करण से संबंधित विभिन्न भारतीय कंपनियों को तेजी से विकास करने का मौका मिलेगा। इसके साथ ही इस क्षेत्र के तहत नवोन्मेषी उत्पादों और सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) को विशेष सहायता प्राप्त होगी । गौरतलब है कि कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के मुताबिक भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग देश के कुल खाद्य बाजार का करीब 32 फीसदी है। भारत विश्व स्तर पर कई कृषि और संबंधित उत्पादों का प्रमुख उत्पादक देश है। दुनिया में भारत सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। विश्व स्तर पर भारत गेहूं, फलों, सब्जियों, केला, आम, अमरूद, पपीता, अदरक, भिंडी, चावल, चाय, गन्ना, काजू, नारियल, इलायची और काली मिर्च आदि के प्रमुख उत्पादक के रूप में जाना जाता है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि सरकार के द्वारा देश में खाद्य प्रसंस्करण सेक्टर की व्यापक संभावनाओं को मुठ्ठियों में करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। छोटे फ्रूट प्रोसेसिंग उद्योगों को वित्त, तकनीक और अन्य तरह की मदद पहुंचाने के लिए खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय ने ‘केन्द्रीय प्रायोजित पीएम फॉर्मलाइजेशन ऑफ माइक्रो फूड प्रोससिंग एंटरप्राइज योजना’ की शुरुआत की है। इस योजना के तहत 2020-21 से 2024-25 तक 10000 करोड़ रुपए के खर्च किए जाने सुनिश्चित किए गए हैं। इस योजना के तहत राज्यों की जिम्मेदारी होगी कि वे कच्चे माल की उपलब्धता का ध्यान रखते हुए हर जिले के लिए एक खाद्य उत्पाद की पहचान करें। ऐसे उत्पादों की सूची में आम, आलू, लीची, टमाटर, साबूदाना, कीनू, पेठा, पापड़, अचार, बाजरा आधारित उत्पाद, मछली पालन, मुर्गी पालन भी शामिल हैं। वर्ष 2021-22 के चालू वित्त वर्ष के बजट में भी वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट के आधार पर चुने गए उत्पादों का प्रोडक्शन करने वाले उद्योगों को प्राथमिकता के आधार पर मदद सुनिश्चित की गई है। यह भी उल्लेखनीय है कि कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के अंतर्गत विभिन्न फलों, खाद्यान्नों और फूलों की खेती के लिए ईपीएफ का गठन किया गया है। मौजूदा ‘कृषि-क्लस्टरों’ को मजबूत करने और अधिक उत्पाद-विशेष वाले क्लस्टर बनाने पर भी जोर दिया गया है।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को प्रोत्साहन देने के इन कदमों के साथ-साथ सितंबर 2020 में कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड के लिए एक लाख करोड़ रुपए की वित्तपोषण सुविधा से कृषि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए लाभप्रद है। सरकार ने फसल कटाई के बाद की सुविधाएं विकसित करने और शीतगृह का बुनियादी ढांचा विकसित करने का उद्देश्य रखने वाली इकाइयों के लिए 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत सुनिश्चित की है। खाद्य प्रसंस्करण को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार लॉजिस्टिक्स क्षेत्र को बुनियादी ढांचे का दर्जा दे चुकी है। इससे सस्ते कर्ज के साथ निर्यात में प्रतिस्पर्धी माहौल बना है। साथ ही देश में शुरू की गई किसान ट्रेनें भी खाद्य प्रसंस्करण बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हुए दिखाई दे रही हैं। वस्तुतः खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र कृषि और विनिर्माण दोनों क्षेत्रों का महत्त्वपूर्ण घटक है। जहां खाद्य प्रसंस्करण कृषि क्षेत्र में किसानों की आय बढ़ाने में मदद करता है, वहीं इसकी बदौलत फसल उत्पादन में वृद्धि और उसका मूल्यवर्धन होता है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से उपज का अधिकतम इस्तेमाल हो पाता है और प्रसंस्कृत वस्तुएं उपभोक्ताओं तक सुरक्षित और साफ-सुथरी स्थिति में पहुंच पाती हैं। खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों और महिलाओं के रोजगारपरक क्षेत्रों में अहम है। खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र कई अन्य पूंजी आधारित उद्योगों की तुलना में ज्यादा रोजगार प्रदान करता है। खास प्रसंस्करण क्षेत्र में अच्छी नौकरियों और स्वरोजगार के भरपूर अवसरों की संभावनाएं बढ़ गई हैं। अब पीएलआई योजना से डेयरी क्षेत्र, फल एवं सब्जी प्रसंस्करण, अनाज का प्रसंस्करण, मांस-मछली पोल्ट्री प्रसंस्करण तथा उपभोक्ता वस्तुएं, पैकेट बंद खाद्य और पेय पदार्थ के प्रसंस्करण में रोजगार की व्यापक संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। खासतौर से सरकारी, सहकारी तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों में खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा और अनुसंधान में अच्छे मौके हैं। एफसीआई मैनेजर्स, बीआईएस, एग्मार्क इंस्पेक्टरों, खाद्य इंस्पेक्टर आदि के रूप में भी मौके हैं।

प्राइवेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियां जैसे कोका कोला, पेप्सी, कैडबरी, क्वालिटी वाल्स, मैक्डोनॉल्ड, निरूलाज, ग्लेक्सो इंडिया, पारले, ब्रिटानिया, वाडिलाल आदि में भी रोजगार की व्यापक संभावनाएं बढ़ गई हैं। निश्चित रूप से खाद्य प्रसंस्करण सेक्टर में बढ़ती हुई आर्थिक, निर्यात और रोजगार संभावनाओं को मुठ्ठियों में लेने के लिए जरूरी है कि इस सेक्टर की डगर पर जो बाधाएं आ रही हैं, उनका उपयुक्त निराकरण किया जाए। ग्राम स्तर पर खाद्य सामग्रियों की भंडारण क्षमता अधिकतम की जाना होगी। इससे न सिर्फ खाद्य नुकसान घटाने में मदद मिलेगी बल्कि इससे ग्रामीण आबादी को आत्मनिर्भर बनाने में भी मदद मिलेगी। इसके अलावा अच्छी भंडारण सुविधाओं से किसानों को कई तरह से अपनी उपज को लाभदायक बनाने में मदद मिल सकेगी, जिनमें अपने अनाज को मंडियों, सहकारी समितियों और स्थानीय व्यापारियों को बेचना शामिल है। इससे घरेलू खाद्य प्रसंस्करण और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। हम उम्मीद करें कि खाद्य प्रसंस्करण सेक्टर की पीएलआई योजना से फसलों की कटाई के बाद फसल की बरबादी रोकने, बेहतर खाद्य सुरक्षा, गुणवत्ता प्रमाणन व्यवस्था, तकनीकी उन्नयन और लॉजिस्टिक सुधार के कारण देश खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से संबंधित अपार संभावनाओं को साकार करने की डगर पर तेजी से आगे बढ़ेगा। हम उम्मीद करें कि केंद्र सरकार के द्वारा खाद्य प्रसंस्करण सेक्टर के लिए लाई गई पीएलआई योजना से खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ेगा। इस क्षेत्र के कारण किसानों की आय बढ़ेगी और वैश्विक बाजार में भारतीय खाद्य प्रसंस्कृत उत्पादों की ब्रांड विकसित करने में मदद मिलेगी।

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