काशी में लाशों के सौदागर!

-राजेंद्र राजन-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

वर्ष 2009 में राजेश झाला की एक चर्चित व पुरस्कृत फिल्म पुणे फिल्म इन्स्टीच्यूट में रिलीज हुई थी: ‘चिल्ड्रन ऑफ द पायर’। यानी ‘चिता के बच्चे’। मुझे भी वहां फिल्म एप्रीसिएशन कोर्स के दौरान यह फिल्म देखने का सौभागय प्राप्त हुआ था और कोर्स के छात्रों ने घंटों इस फिल्म के बारे में झाला से सवाल पूछे थे। इस डाक्यूमेंटरी फिल्म में वाराणसी में डोम जाति के बच्चे काशी के घाटों पर लाशें जलाते रहते थे दिन-रात। उनकी उम्र 6 साल से लेकर 10-12 साल के मध्य थी। वे सब डोम जाति के बच्चे थे जिसका सदियों से यही पेशा रहा है। इस फिल्म ने पूरी दुनिया में खूब हलचल पैदा की थी और अमरीका की एक संस्था ‘प्लान इंटरनेशनल’ ने ऐसे कोई 15-20 बच्चों को शिक्षा के लिए गोद लिया था और कई साल तक हरिद्वार के एक प्राइवेट बोर्डिंग स्कूल में उन्हें पढ़ाकर इन्हें सभ्य नागरिक बनाया और लाशों के नरक से बाहर निकाला था। उस जमाने में इस फिल्म की दुनियाभर में खूब चर्चा हुई थी और उसे ढेर सारे पुरस्कारों से नवाजा गया था। वाराणसी के घाटों पर शवों की अंत्येष्टि को शुभ माना जाता है क्योंकि हिंदू माइथोलोजी के अनुसार मृत्यु के उपरांत मोक्ष प्राप्ति व सीधे स्वर्ग की यात्रा के लिए काशी को अंत्येष्टि के लिए अति उत्तम स्थल माना जाता है।

कोरोना काल में अपने प्रियजनों की मौत के बाद दाह संस्कार के लिए उनके परिजन दर-दर भटकने को बाध्य हैं क्योंकि इस महामारी ने देश व दुनियाभर में व्यवस्था को चरमरा कर रख दिया है। किंतु दुःखद व पीड़ादायक पहलू यह है कि वाराणसी के गंगातट पर नए किस्म का ‘माफिया’ सक्रिय हो चुका है जो लाशों का सौदागर बन चुका है और दुष्टता व धृष्टता की पराकाष्ठा पर उतर चुका है। सामान्य दिनों में जिस शव की अंत्येष्टि 2000/- या 3000/- रुपए में सुलभ व संभव थी, उसके अंतिम संस्कार के लिए ये लोग कालाबाजारी पर उतर आए हैं और मृतक व्यक्ति के परिजनों से एक शव को जलाने के लिए 25 से 30 हजार या 50 हजार रुपए तक वसूल रहे हैं। सरकार-प्रशासन बेबस हैं और ये संगठित माफिया महामारी में भी अनैतिक व ़गैरकानूनी तरीके से मुनाफे से अपनी झोलियां भरने में व्यस्त हैं। वैसे तो पूरे देश में ही श्मशानघाटों की तस्वीरें भयावह हैं और हमारे टीवी चैनल उन्हें अपनी टीआरपी में इजाफा करने के लिए यूं दिखा रहे हैं मानो भारत ने मंगल ग्रह पर जीवन की खोज कर ली हो और वह वहां बस्तियां बसाने जा रहा हो। न्यूज चैनलों पर प्रसारित कंटेंट पर सरकार तो क्या, सुप्रीम कोर्ट का भी कोई नियंत्रण नहीं रहा है। वह भी बेबस प्रतीत होता है क्योंकि अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र के नाम पर न्यूज चैनलों के मालिक करोड़ों-अरबों के खेल में व्यस्त हैं। काशी में गंगातट के किनारे मणिकर्णिका व हरिशचंद्र घाटों पर बेहद डरावनी तस्वीरें देखने को मिल रही हैं जहां प्रतिदिन 150 से 200 लाशें महज कोरोना मृत्यु के बाद जलाने के लिए लोग पहुंच रहे हैं। कोरोना से मरे व्यक्ति के शव को स्पर्श करना ऐसा है मानो आपने जहरीले सांप के बिल में हाथ डाल दिया हो।

वाराणसी की फिजां से बाहर निकलकर पूरे देश में सोशल मीडिया पर फैलने वाली कहानियां बताती हैं कि कोरोना के कारण मृत्यु को प्राप्त लाशों को कंधा देने के लिए 24 हजार रुपए तक की डिमांड की जाती है। यानी एक कंधे के 6 हजार रुपए। कुछ मीटर तक पीपीई किट में उठाकर चिता पर रखने के लिए। यह बिल्कुल नई तरह का बाजार है जो तथाकथित पवित्र कही जाने वाली काशी में पूरी शिद्दत से पाप के रूप में पांव पसार चुका है। अंत्येष्टि में शामिल पुरोहितों, पुजारियों को जब मुंहमांगे दाम नहीं मिलते तो परिजनों को शव को वापस ले जाने के लिए बाध्य करते हैं। 20 से 25 हजार तो आम रेट है। चिता सजाने के लिए इस्तेमाल होने वाली लकड़ी के दाम ‘सोने’ से भी महंगे हो चुके हैं। दूसरे व्यक्ति के जले शव से बची लकडि़यों को भी नए शव के ढेर में रखी लकडि़यों में ठूंस दिया जाता है। मणिकर्णिका घाट में सामान्य मृत्यु यानी कोरोना से नहीं, के लिए कभी बेहतर व संतोषजनक प्रबंध होते थे। मात्र 2 या 3 हजार में आम नागरिक अपने बिछड़े प्रिय की अंत्येष्टि कर सकता था। अब सामान्य मौतों के लिए इस तथाकथित पवित्र घाट पर 15 से 20 हजार रुपए वसूल किए जा रहे हैं यानी कफन से लेकर हवन सामग्री, लकड़ी और तमाम तामझाम के लिए लूटपाट का खेल जारी है और सरकार गूंगी-बहरी होकर सब देख रही है। ‘जब रोम जल रहा था तो नीरो बंसी बजा रहा था।’ यही उक्ति कटाक्ष के रूप में वाराणसी और देश के अन्य शहरों के श्मशानघाटों पर खरी उतरती है। महामारी ने अनेक समुदायों की धार्मिक आस्थाओं को भी ध्वस्त किया है।

ईसाई समुदाय के लोग कब्रों के लिए स्पेस खोजने की बजाय उन्हें जलाने पर बाध्य हैं और अपने खोए हुए प्रियजनों की राख को अपने निर्धारित कबिस्तान में गड्ढे कर उसे मिट्टी में दबा रहे हैं। अपने को खोने का ़गम एक तरफ और पुजारियों, पुरोहितों व कफन व उसका सामान बेचने वालों की असंवेदनशीलता व क्रूरता दूसरी तरफ। क्या ऐसे लोगों पर कानून के तहत कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? उन गरीबों, बेसहारा व अभावग्रस्त लोगों का क्या कसूर है जो दाने-दाने के लिए मोहताज हैं। लाश को जलाने के लिए कहां से लाएंगे हजारों रुपए? ऐसे में अगर वे गंगा में शवों को बहाने के लिए मजबूर हैं तो उनका क्या कसूर है? योगी आदित्य नाथ की सरकार ने आपराधिक तत्वों पर लगाम लगाने के लिए पिछले दिनों सार्थक प्रयास किए हैं जिसकी तारीफ भी हुई है। लेकिन कुंभ में लाखों भक्तजनों व श्रद्धालुओं को न्योता देकर पूरे देश को कथित रूप से कोरोना की दूसरी लहर में झोंक देने के आरोप भी योगी सरकार पर लगे हैं। यहां तक कि इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने आपत्तिजनक टिप्पणियां भी की हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। यूपी के सैकड़ों-हजारों श्मशानघाटों पर लूटपाट, गुंडागर्दी, ब्लैकमेलिंग का खेल बेखौफ जारी है। सरकार को काशी के उन घाटों जहां शवों को जलाया जा रहा है, में पुलिस व प्रशासन के कर्मियों की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि वे माफिया पर नजर रख सकें।

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