लोकतंत्र की अग्नि परीक्षा है बंगाल के नतीजे
शकील अख्तर
-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-
बंगाल की जनता ने बिना डरे वोट दिया है। उसका जो जनादेश है वही सामने आना चाहिए। चुनाव आयोग एक संस्था के तौर पर तो पूरी तरह डरा हुआ, समर्पित है। मगर काम उसे आदमियों से लेना है। मतगणना केन्द्रों में गिनती सही से देखने और बताने की जिम्मेदारी जिन हजारों अधिकारियों और कर्मचारियों पर है अगर वे नहीं डरे तो नतीजे सही आएंगे।
किसी बड़े पहलवान को हराने के लिए बड़ी तादाद में लोगों को इक_ा करके ले जाया जाता था। और मुकाबला शुरू होते ही लोग अचानक अखाड़े में घुसकर जीत गया जीत गया के नारे लगाते हुए अपने पहलवान को कंधे पर उठा लेते थे!
चार मई सोमवार को यही कोशिशें हैं! चुनाव केवल बंगाल का है मगर पूरे देश निगाहें इस बात पर लगीं हैं कि क्या नतीजे वही आएंगे जो मतदाताओं ने वोटिंग मशीन में डाले हैं या जीत गए जीत गए का शोर करके देश के लोकतंत्र में आखिरी कील ठोक दी जाएगी?
जिस तरह माहौल बनाया जा रहा है उससे बहुत आशंकाएं हो गई हैं। सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि केन्द्र सरकार के कर्मचारी गिनती कर सकते हैं। शुक्र है यह नहीं कहा कि जो लाखों केन्द्रीय सुरक्षा बल वहां भेजे गए हैं वे भी गिनती कर सकते हैं।
एग्जिट पोल के माध्यम से पहले ही यह माहौल बना दिया है कि भाजपा जीत रही है। गोदी मीडिया उसको और फैला रहा है। ऐसा माहौल बना दिया है कि अगर लोकतंत्र के ताबूत में आखिरी कील ठोकना तय ही कर लिया है तो भाजपा की जीत पर किसी को आश्चर्य न हो। इसे स्वाभाविक मान लिया जाए। मगर इसके बावजूद अगर ‘वह फूल खिल कर रहेंगे जो खिलने वाले हैं’ हो गया तो यह लोकतंत्र की बहुत बड़ी जीत माना जाएगा। और बंगाल की जनता को इसका पूरा श्रेय होगा।
यह साहिर लुधियानवी का शेर है। प्रगतिशील शायर, फिल्मों में उनके लिखे गीतों से बहुत लोकप्रिय भी हैं।
‘हजार बर्क गिरे, लाख आंधियां उ_ें
वो फूल खिल कर रहेंगे जो खिलने वाले हैं !’
बर्क मतलब बिजलियां। बहुत आशावाद का शेर है। और अपने लोकतंत्र के लिए ऐसी आशा सब कर भी रहे हैं। उम्मीद है जनता की जीत होगी। उसने जो अपने वोट के जरिए कहा है वही चार मई को मतगणना केन्द्रों से सामने आएगा। वह नहीं जो एग्जिट पोल के जरिए प्रचार किया गया है। हर बार की तरह एग्जिट पोल गलत साबित होंगे।
चुनाव आयोग एग्जिट पोल को सही साबित करने की कोशिश नहीं करेगा, बल्कि मतदाताओं के वोट को सही रूप से पेश करेगा। देश में पहली बार ऐसा हो रहा है। पांच राज्यों में चुनाव हुए। सबकी मतगणना हो रही है। मगर चिंता केवल बंगाल की। और दरअसल यह बंगाल की चिंता नहीं है यह चिंता देश के लोकतंत्र की है।
अगर चुनाव आयोग को अपने मनचाहे नतीजे ही घोषित करना हैं तो फिर चुनाव की सारी प्रक्रियाओं की क्या जरूरत? चुनाव आयोग को सीधे नतीजे ही घोषित करना चाहिए। जब दो चार दबंग गांव मिलकर इस तरह जीत गया जीत गया के शोर में अपना पहलवान जिता लेते हैं तो फिर वहां दंगल लड़ने ही कोई नहीं जाता। खुद ही फलाना क्षेत्र केसरी की घोषणा करते रहते हैं। और एक दिन उन गांवों से पहलवानी ही खतम हो जाती है।
लोकतंत्र की अग्नि परीक्षा है बंगाल चुनाव। अगर मनमानी की तो बहुत गंभीर परिणाम होंगे। हरियाणा की जनता ने पता नहीं कैसे स्वीकार कर लिए? शायद वहां कांग्रेस की आपसी लड़ाई से उसे लगा कि यह लोग इसी काबिल थे। महाराष्ट्र में विपक्ष में बहुत सारे दल थे। किसी एक दल का जनता पर असर नहीं था। वहां भी जीत गए जीत गए चल गया। बिहार में भी ऐसा ही हुआ। कांग्रेस तो कमजोर थी ही, तेजस्वी भी कोई विशेष प्रभाव नहीं डाल पाए।
यह सब चुनाव आयोग को ढाल मिल गई। कर्नाटक लोकसभा चुनावों से लेकर इन सब राज्यों की विधानसभाओं में चुनाव आयोग ने बहुत बड़े पैमाने में गड़बड़ियां कीं। मगर विपक्ष भी उस तरह नहीं लड़ पाया जैसे इन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में उसे लड़ना था। वह भी पहले से ऐसे बहाने की भाषा बोल रहा था कि चुनाव आयोग जीतने तो देगा नहीं!
मगर बंगाल में स्थितियां बिल्कुल अलग हैं। यहां ममता बनर्जी ने पूरी ताकत से मोदी और अमित शाह का विरोध किया है। उनके कार्यकर्ता भी हिम्मत के साथ लड़े। और उन सबसे ऊपर जनता भी ममता के साथ थी। जितने पत्रकार यहां से गये सबने कहा, लिखा कि 15 साल के बाद जितनी इनकम्बेन्सी हो जाती है। ममता के खिलाफ उतनी नहीं है। नाराजगी है मगर ऐसी नहीं कि उन्हें कुर्सी से उतारना चाहे। और दूसरी बात वहां का भद्रलोक भाजपा की आक्रामक और अहंकारी राजनीति को बिल्कुल नहीं चाहता। वह राजनीतिक रूप से जागरूक है और उसे मालूम है कि जहां-जहां भाजपा की राज्य सरकारें है वहां जनता का क्या हाल है। वह मोदी अमित शाह की बड़ी-बड़ी बातों पर नहीं जा रहा।
लेकिन यह सब माहौल 29 अप्रैल तक था। एग्जिट पोल आने के पहले तक। एग्जिट पोल इसी सच के माहौल को तोड़ने के लिए लाए गए। एक बड़ा झूठ फैला दिया गया। जीत रहे हैं! जीतेगा भई जीतेगा! और फिर जीत गए जीत गए!
जब आप यह पढ़ रहे होंगे तो शायद ट्रेन्ड आना शुरू हो चुके होंगे। मगर ऐसे में जो हमेशा कहा जाता है कि दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। वैसा कहने का माहौल नहीं रहने दिया।
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो गई है। सुप्रीम कोर्ट भी गिनती से ठीक पहले तक उसकी हर बात का समर्थन करता रहा। प्रधानमंत्री और केन्द्रीय गृह मंत्री ने जीत की घोषणा कर दी है। एग्जिट पोल तो कह ही रहे हैं। गोदी मीडिया ने साफ शब्दों में जीत बोल रहा है। कभी ऐसा नहीं हुआ कि मतदान के लास्ट फेज के बाद प्रधानमंत्री और केन्द्रीय गृह मंत्री इस तरह जीत की घोषणा करें। सब सेफ साइड रखते हैं।
और वोटिंग हो जाने के बाद प्रधानमंत्री पूरे देश का हो जाता है। मगर यहां यह सब बात नहीं! बस हर चुनाव जीतना है। कैसे? इससे कोई मतलब नहीं। इसलिए वोटिंग के बाद जीत के दावे करके मतगणना अधिकारियों पर फाइनल दबाव डाल गया कि समझ लो हम क्या चाहते हैं!
लेकिन फिर भी यकीन है कि यह देश ऐसे डरने वाला नहीं है। बंगाल की जनता ने बिना डरे वोट दिया है। उसका जो जनादेश है वही सामने आना चाहिए। चुनाव आयोग एक संस्था के तौर पर तो पूरी तरह डरा हुआ, समर्पित है। मगर काम उसे आदमियों से लेना है। मतगणना केन्द्रों में गिनती सही से देखने और बताने की जिम्मेदारी जिन हजारों अधिकारियों और कर्मचारियों पर है अगर वे नहीं डरे तो नतीजे सही आएंगे। लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो परिणाम बहुत गंभीर हो सकते हैं।
बंगाल की जनता झूठे नतीजों को स्वीकार नहीं करेगी। वहां एक प्रतिरोध की बहुत सशक्त परंपरा है। देश के दूसरे राज्यों की तरह वह झूठ और गलत को स्वीकार नहीं करेगी। और बंगाल का प्रतिरोध पूरे देश में फैल सकता है।
कौन सोचेगा इस बारे में? मोदी और अमित शाह से उम्मीद नहीं है। चुनाव आयोग पूरी तरह उनके इशारों पर है। सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल के मामले में तो निराश ही किया है।
ऐसे में वे हजारों हजार अधिकारी और कर्मचारी जो मतगणना केन्द्रों में हैं वे ही उम्मीद के आखिरी चिराग हैं। जैसे स्वतंत्रता संग्राम में असहयोग आंदोलन के दौरान सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों में एक बिजली सी कौंध गई थी और उन्होंने अन्यायपूर्ण आदेशों को मानने से इनकार कर दिया था वैसा फिर हो सकता है। सौ साल पहले वे भारतीय ही थे और आज भी वे ही भारतीय हैं। एक स्थिति के बाद अन्याय का साथ देने से इनकार!
