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एनसीईआरटी विवाद में तीन विशेषज्ञों ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा

-‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ वाले अध्याय पर ब्लैकलिस्ट किए जाने के खिलाफ दी दलील

नई दिल्ली, 07 अप्रैल (ऐजेंसी/सक्षम भारत)। एनसीईआरटी की कक्षा 8वीं की नई सोशल साइंस की किताब ‘समाज की खोज’ के विवादित अध्याय को लेकर अब नया मोड़ आ गया है। इस अध्याय को तैयार करने वाले तीन प्रमुख शिक्षाविदों—प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार—ने खुद को ब्लैकलिस्ट किए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इन विशेषज्ञों का मुख्य तर्क है कि विवादित चैप्टर ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं, बल्कि एक विस्तृत सामूहिक प्रक्रिया का परिणाम था। उन्होंने अदालत से अपनी बात रखने का मौका मांगा है, ताकि उनकी दशकों की शैक्षणिक साख पर लगे दाग को साफ किया जा सके।

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की पाठ्यपुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ जैसे संवेदनशील मुद्दे के जिक्र को ‘आपत्तिजनक’ करार दिया। अदालत ने टिप्पणी की थी कि इस तरह के कंटेंट से न्यायपालिका की छवि धूमिल होती है, जिसके बाद किताब के प्रकाशन और प्रसार पर तुरंत रोक लगा दी गई। कोर्ट के कड़े रुख के बाद 11 मार्च को इन तीनों विशेषज्ञों को सभी शैक्षणिक जिम्मेदारियों से अलग करने का निर्देश दिया गया था। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच के सामने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी संस्था को निशाना बनाना नहीं, बल्कि नई शिक्षा नीति के तहत संदर्भों को स्पष्ट करना था।

सुप्रीम कोर्ट की इस सख्ती के बाद केंद्र सरकार और एनसीईआरटी ने भविष्य के पाठ्यक्रमों की समीक्षा के लिए उच्च स्तरीय कमेटियों का गठन किया है। विवादित अध्याय और उच्चतर कक्षाओं के विधि अध्ययन की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा और वरिष्ठ वकील के.के. वेणुगोपाल जैसे दिग्गजों की तीन सदस्यीय समिति बनाई गई है। इसके अतिरिक्त, शिक्षा मंत्रालय ने एक 20 सदस्यीय हाई पावर कमेटी भी गठित की है जो राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के साथ मिलकर पाठ्यक्रम के विभिन्न पहलुओं पर विचार करेगी। वर्तमान में यह मामला न केवल शिक्षा जगत बल्कि कानूनी गलियारों में भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

 

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