राजनैतिकशिक्षा

बनारस के धर्म-युद्ध से उपजे सवाल

-डॉ योगेन्द्र-

-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-

देश को धर्म युद्ध नहीं चाहिए। देश को न्याय और समता कायम करने के लिए जनयुद्ध चाहिए। बनारस की गंगा हो या भागलपुर की, उसमें कोई स्नान के लिए जाता है, तो उसे रोकने का कोई अधिकार किसी को नहीं है। संत हों या आम आदमी-दोनों में कोई अंतर नहीं है। दोनों की आजादी को छीनने की कोशिश सरकार को नहीं करनी चाहिए। दरअसल आज की धार्मिक गतिविधियां अध्यात्म की ओर न जाकर राजनीति की ओर मुड़ गई है। धार्मिक कार्य मनुष्य को नफ़रत, ईर्ष्या और वासना से मुक्त नहीं कर रहे। एक संत को तपस्या में नहीं, सत्ता में मजा आने लगता है। फ़ूहड़ और लोगों को उत्तेजित करने वाली बोली बोलने लगता है। मनुष्य और मनुष्य में अंतर करने लगता है, तब वह संत नहीं रह जाता, न धार्मिक व्यक्ति यह जाता है। ऐसे व्यक्ति धार्मिक चिह्न भले धारण कर ले, लेकिन वे धार्मिक नहीं रह जाते। बनारस के गंगा घाट पर एक संत धरने पर हैं, क्योंकि उन्हें शाही स्नान से रोका गया। बनारस की गंगा पूरी तरह से प्रदूषित है। धर्म और पुण्य कमाने के नाम पर पाखंड खूब होता है, लेकिन मैंने किसी भी शंकराचार्य को गंगा प्रदूषण के खिलाफ धरने पर बैठने की बात नहीं सुनी। गंगा पर राजनीति बहुत होती है, लेकिन गंगा को बचाने का जद्दोजहद नहीं होता। प्रधानमंत्री को गंगा वोट के लिए बुला लेती है। बीच-बीच में प्रधानमंत्री गंगा की आरती उतार लेते हैं। गंगा घाट को थोड़े चमका देते हैं। उनके पूंजीपति मित्र की जब चाहत होती है कि गंगा घाट पर मुनाफा कमाने का साम्राज्य कायम किया जाय, तब प्रधानमंत्री और उनके प्यादे के द्वारा तोड़फोड़ शुरू होती है। वर्षों पुराने मंदिर तोड़ने में भी वे देर नहीं करते। वे जानते हैं कि मंदिर तोड़ देने से कोई देवता कुपित नहीं होंगे।
शंकराचार्यों को कभी समता में भरोसा नहीं रहा। वे हिन्दुओं में भी समता कायम नहीं कर सके, बल्कि कहना चाहिए कि इसके लिए उन्होंने कोशिश नहीं की। हिन्दुओं की ठेकेदारी करना अलग बात है, हिन्दुओं को मानसिक रूप से श्रेष्ठ बनाना दूसरी बात। जो धर्म किसी को श्रेष्ठ और किसी को हीन बनाता है, वह दरअसल धर्म नहीं है। धर्म को अलौकिक सत्ता में भरोसा होता है। वह यह मानता है कि ईश्वर ने ही सभी को जन्म दिया। सभी ईश्वर की संतानें हैं। दरअसल धर्म की यह सामान्य अवधारणा भी धार्मिक लोग नहीं मानते। कहना चाहिए कि जो मनुष्य और मनुष्य में विभेद करता है, वह और कुछ हो, धार्मिक नहीं है। इस देश में धार्मिक क्रांति की भी जरूरत है। हमने धर्म के ठेकेदार पैदा किए हैं। वे तरह तरह के भ्रमजाल पैदा करते रहते हैं। जो सच्चा सनातनी होगा, क्या वह जाति में विश्वास करेगा? अगर विश्वास करता है तो सनातन होने के दंभ पर गहरा अविश्वास करना चाहिए। अयोध्या को धर्म युद्ध का एक अखाड़ा बनाया गया। बनारस में भी इसके कुछ प्रयोग हुए। ज्ञानवापी को लेकर हंगामे शुरू भी हुए थे। हम फर्जी धार्मिक चेतना फैला कर जनता को गुमराह कर रहे हैं और देश को तबाह करने पर तुले हैं। सर्वोच्च मठाधीश बनने के सपने में ही किसी के लिए दुत्कार और तिरस्कार छिपा है। सर्वोच्च पदों से जब निकृष्ट विचार उगले जाते हैं तो पूरी सभ्यता कलंकित होती है। हम किसी भी स्तर पर इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। तिरस्कार, दुत्कार, नफ़रत और गैर बराबरी को तवज्जो देने वाले सभ्यता के भक्षक हैं। हर धर्म अपनी सर्वोच्चता की घोषणा करते है और उसकी आड़ में अमानवीयता का नंगा नाच करता है।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *