राजनैतिकशिक्षा

अंकिता भंडारी मुद्दे से जीवंतता की ओर बढ़ती कांग्रेस!

-डॉ. श्रीगोपाल नारसन-

-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-

जब तक अंकिता भंडारी हत्याकांड मुद्दा पुनः नही उठा तब तक कांग्रेस उत्तराखंड में सुसुप्त अवस्था मे थी, कांग्रेस में व्याप्त कमजोरी के बावजूद कांग्रेसी संगठनात्मक मजबूती पर कोई ध्यान नही दे रहे थे, वह तो भला हो उर्मिला सनावर का जिसने बैठे बिठाए अंकिता भंडारी मुद्दा उछाल कर कांग्रेस को पनपने का अवसर दे दिया, हालांकि कांग्रेस के राजनीतिक दबाव के चलते ही अंकिता भंडारी हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने का मार्ग प्रशस्त हो पाया। इस समय भी उत्तराखंड की राजनीति इन दिनों अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर उबाल पर है। पिछले कई दिनों से राज्य के अलग–अलग हिस्सों में लोग सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं और अंकित भंडारी के लिए न्याय की मांग कर रहे हैं। इस मामले में सत्तारूढ़ बीजेपी से जुड़े नेताओं के नाम सामने आने के बाद सियासी घमासान और तेज हो गया है। कांग्रेस ने इसे लेकर राज्य में ‘न्याय यात्रा’ शुरू की है।
वास्तव में उत्तराखंड में महिलाओं के खिलाफ अपराध तेजी से बढ़े हैं। अगर सरकार साफ और पारदर्शी तरीके से काम करती, तो सिस्टम सुधर सकता था। लेकिन जब ऊपर बैठे लोग भ्रष्टाचार को बढ़ावा देंगे, तो अधिकारी भी वही मॉडल अपनाएंगे। दूसरा बड़ा मुद्दा बेरोजगारी है। राज्य में पर्यटन के जरिए लाखों युवाओं को रोजगार दे सकते हैं। हर विधानसभा क्षेत्र में 10 हजार परिवारों को अलग-अलग सेक्टर में रोजगार देने का ब्लूप्रिंट तैयार किया गया है। अंकिता भंडारी हत्याकांड पर उठी सियासी लहर में भाजपा की घेराबंदी को कांग्रेस आगे भी पुरजोर तरीके से जारी रखेगी। प्रदेश कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा की अध्यक्षता में प्रदेश कांग्रेस की राजनीतिक मामलों की बैठक में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को धार देने की रणनीति पर मंथन हुआ है। निर्णय हुआ कि पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रदेश की भाजपा सरकार और सत्ताधारी दल के विरुद्ध गुटबंदी को किनारे रखकर एकजुट होकर संघर्ष तेज करेंगे।
संगठन को हर स्तर पर सक्रिय किया जाएगा। जिला इकाइयों से लेकर ब्लाक व बूथ इकाइयों को जनता के बीच मुद्दों को उठाया जाएगा। विशेष रूप से अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर 11 जनवरी को उत्तराखंड बंद को सफल बनाने के लिए कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंकी, फिर भी पूर्ण बंद नही हो पाया, अलबत्ता उत्तराखंड को बंद कराने में पहाड़ी क्षेत्रों में कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों को ज्यादा सफलता मिली। यह भी तय किया गया कि इस मुद्दे पर मुख्य विपक्षी दल किसी भी स्तर पर ढिलाई नहीं करेगी। साथ ही प्रदेश सरकार के विरुद्ध एंटी इनकंबेंसी का वातावरण बनाया जाएगा। सरकार पर ठोस रणनीति के साथ आगामी दिनों में आक्रमण तेज करने के लिए कांग्रेस ने इस मुद्दे पर नए सिरे से भाजपा को घेरने का प्लान तैयार किया है। बैठक में पार्टी का जनाधार मजबूत करने पर भी मंथन किया गया। साथ ही प्रांतीय कार्यकारिणी को लेकर भी चर्चा की गई। कांग्रेस लगातार अंकिता मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर है। पार्टी सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रही है और यह आरोप लगा रही है कि मामले से जुड़े सभी पहलुओं की पूरी तरह निष्पक्ष जांच नहीं हुई है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि कुछ बड़े और प्रभावशाली चेहरों की भूमिका को लेकर अब भी सवाल बने हुए हैं और जब तक हर सवाल का जवाब नहीं मिलेगा, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। कांग्रेस इसे महिला सुरक्षा और न्याय से जोड़कर जनता के बीच ले जा रही है।
वहीं भाजपा कांग्रेस के इन प्रदर्शनों को राजनीतिक स्टंट बता रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि जब एसआईटी जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने के बाद चले मुकदमे में अदालत ने आरोपियो को दोष सिद्ध कर तीनों आरोपियों को उम्रकैद की सजा दे दी है, तो फिर इस मुद्दे को बार-बार उछालने का मकसद साफ तौर पर राजनीतिक है। बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस के पास कोई ठोस जनहित का मुद्दा नहीं बचा है, इसलिए वह अंकिता भंडारी को ढाल बनाकर 2027 के विधानसभा चुनाव की जमीन तैयार करना चाहती है।
सन 2017 में सत्ता गंवाने के बाद से कांग्रेस लगातार ऐसे मुद्दों की तलाश में है, जो भावनात्मक रूप से जनता से जुड़ सकें। महिला अपराध, सुरक्षा और न्याय जैसे विषय स्वाभाविक रूप से संवेदनशील हैं और इन्हें लेकर जनभावनाएं आसानी से भड़काई जा सकती हैं। ऐसे में अंकिता भंडारी हत्याकांड कांग्रेस के लिए एक प्रभावी सियासी हथियार बनता नजर आ रहा है। क्या इस राजनीति से पीड़िता के परिवार को वास्तविक संतोष और न्याय मिल पा रहा है, यह भी विचारणीय प्रश्न है। आने वाले समय में अंकिता भंडारी हत्याकांड न्याय और संवेदनशीलता का प्रतीक बनकर आगे बढ़ता है या फिर 2027 की सियासी बिसात का एक अहम मोहरा बनकर रह जाता है, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन जनता की नजरें अब राजनीति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और पारदर्शिता पर टिकी हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का कहना है कि अंकिता भंडारी ने अपनी हत्या होने के चंद घंटे पहले अपने दोस्त से वीडियो मैसेज में यह कहा था कि रिज़ॉर्ट में वीआईपी आने वाले हैं और मुझ पर दबाव डाला जा रहा है कि मैं उन्हें विशेष सर्विस दूँ और मैंने इनकार कर दिया है। अंकिता ने यह भी कहा कि यहाँ सब कुछ ठीक नहीं है और उक्त कथन के चंद घंटों बाद ही अंकिता की हत्या हो जाती है। हरीश रावत ने कहा कि अंकिता की हत्या की रिपोर्ट लिखे जाने में भी आनाकानी होती है। उसके शव को निकालने में बहुत विलंब होता है। मोबाइल आदि, जो महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते थे, उन्हें बरामद नहीं किया जाता है। फिर रिज़ॉर्ट में सीसीटीवी कैमरे तोड़े जाते हैं, जेसीबी मशीन से रिजॉर्ट के कुछ कक्षों को भी तोड़ा जाता है तथा अंत में रिजोर्ट में आग भी लगा दी जाती है। साक्ष्य नष्ट करने की इस प्रक्रिया से यह स्पष्ट हो जाता है कि ये वीआईपी है और कोई अति महत्वपूर्ण व्यक्ति है जिसको जांच के दायरे से बचाने के लिए उपरोक्त सब कदम उठाए गये हैं। इस केस में वीआईपी है, यह अंकिता के बयान से सिद्ध हो जाता है। उसका बयान एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है। हत्या के कुछ कारण या मोटिव होता है। इस प्रकरण में वीआईपी को विशेष सेवा देने से इंकार करना हत्या का कारण बना है और इसी कारण स्वरूप रिजोर्ट स्वामी के लिए अंकिता को हमेशा के लिए चुप कराना भी आवश्यक हो गया। सारा कारण या उद्देश्य, इस वीआईपी शब्द के चारों तरफ खड़ा है। निश्चय ही न्याय के ऑप्शन हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट हैं, जहां बारीकी से निचले न्यायालय के निर्णय की विवेचना होती है। वहॉ अंकिता के हत्यारों को दंड मिले इसके लिए वीआईपी पर एफ आवश्यक थी, जो बहुत देर से कांग्रेस के दबाव में दर्ज हो पाई। वह भी अंकिता के माता पिता की तहरीर के बजाए गैर फरीखअनिल जोशी की तहरीर पर। इस केस में वीआईपी अपने आप में एक महत्वपूर्ण आईडेंटिटी है। अंकिता के हत्यारों को अंतिम रूप से दंड मिले उस हेतु भी वीआईपी और रिजोर्ट आदि स्थानों पर साक्ष्य मिटाने वालों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज होना अति आवश्यक है अन्यथा हम अंकिता हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं का नारा लगाते रह जाएंगे और कातिल बाहर खुले में हम सबका मजाक उड़ाएंगे। इस वीआईपी को कानून के शिकंजे में आना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि उत्तराखंड में दूर-दूर रिजोर्ट और होमस्टे बन गए हैं उनके संचालन के लिए कोई स्पष्ट मार्ग निर्देशिका नहीं है। धानड्य बनने की होड़ में कुछ लोग इन स्थलों का दुरुपयोग कर सकते हैं जैसा वनंतरा रिजॉर्ट में हुआ। लेकिन कांग्रेस को सन 2027 के चुनाव के लिए स्वयं में भी परिवर्तन करना होगा। ज़मीनी कांग्रेस कार्यकर्ताओ को सम्मान देने के साथ ही आपसी गुटबाजी भी समाप्त करनी होगी। पूर्व प्रधानमंत्रीराजीव गांधी की दुःखद मृत्यु के बाद आम कार्यकर्ता से बडे नेताओ का संवाद टूट सा गया है। यही कांग्रेस की कमजोरी का कारण है। कहने में गुरेज नही कि कांग्रेस में दूसरी पक्ति के नेता
चुनाव के समय कांग्रेस हाईकमान को अन्धेरे में रखकर टिकटो को बेचने तक का धन्धा करते है और ऐसे अवसरवादियों और दलबदलुओं को अपने नीजि स्वार्थ के लिए टिकट दिलवा देते है जिनका पार्टी से कोई मतलब या वास्ता नही होता। अच्छा हो कांग्रेस की शीर्ष नेता सोनिया गांधी और कांग्रेस सांसद व नेताप्रतिपक्ष राहुल गांधी राजीव गांधी की तरह सीधे धरातल से जुडे कार्यकर्ताओं से संवाद स्थापित करे। आम कार्यकताओं से हकीकत जाने और उनसे सीधा संवाद भी स्थापित करे ताकि आम कार्यकर्ता का मनोबल बना रह सके। कहने में गुरेज नही कि कांग्रेस में दूसरी पक्ति के नेता चुनाव के समय कांग्रेस हाईकमान को अन्धेरे में रखकर टिकटो को बेचने तक का धन्धा करते है और ऐसे अवसरवादियों और दलबदलुओं को अपने नीजि स्वार्थ के लिए टिकट दिलवा देते है जिनका पार्टी से कोई मतलब या वास्ता नही होता। संगठन पर मजबूत पकड करना राजीव गांधी को आता था। कांग्रेस के कैडर बिल्डिगं कार्यक्रम के माध्यम से उन्होने संगठन को धरातल स्तर पर मजबूत करने की कौशिश की थी। इस कार्यक्रम के प्रशिक्षको व कार्यकर्ताओं से वे कांग्रेस की वास्तविक तस्वीर जान लेते थे। याकि कांग्रेस का टिकट किसे मिलना चाहिए, कौन जीत सकता है, किसकी छवि अच्छी है यह सब उन्हे इसी कैडर बिल्डिगं के प्रशिक्षको से पता चल जाता था। साथ ही पार्टी विरोधी लोगो और कांग्रेस से गददारी करने वालो की जानकारी भी उन्हे सहज ही हो जाती थी। जब किसी नेता को या फिर कार्यकर्ता को पार्टी में शामिल करना होता तो उसकी खुफिया जाचं भी इन्ही कैडर बिल्डिंग के लोगो से कराई जाती थी। जिसके परिणाम हमशा अच्छे रहे। वे मामूली से मामूली कार्यकर्ता को भी तरजीह देते थे। यही उनके बडप्पन का राज था। लेकिन आज सत्ता से दूर होने पर भी कांग्रेस के बड़े नेताओं से मिलना टेढ़ी खीर है, बड़े नेता केवल अपना स्वागत कराते है, कार्यकर्ताओं को सम्मान देना उनके लिए दूर की बात है, इसी कारण कांग्रेस सिमटती चली गई और सत्ता से दूर हो गई।

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