डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनः राजनीति में दार्शनिकता के शिखर पुरुष

-देवेन्द्रराज सुथार-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

भारत के पहले उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक ऐसे ऋषि तुल्य महापुरुष थे जिन्होंने अपनी अप्रतिम विद्वता, चिंतन की ऊंचाई और उच्च मानवीय गुणों से भारत को गौरवान्वित किया। सत्य को जानने की तीव्र जिज्ञासा ने उन्हें धर्मग्रंथों के अध्ययन में प्रवृत्त किया। उन्होंने भारत के धर्म ग्रंथों के अध्ययन के साथ ही विश्व के प्रमुख धर्मों के ग्रंथों का भी गहन अनुशीलन किया। राधाकृष्णन ने प्रमुख रूप से श्रीमद भगवतगीता, श्रीमद्भागवत, वेद, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र आदि का सांगोपांग अध्ययन करने के साथ ही गीता, उपनिषद और ब्राहृसूत्र का अंग्रेजी में प्रांजल अनुवाद किया और उन पर प्रामाणिक भाष्य लिखे।

बीस वर्ष की अल्पायु में ही डॉ. राधाकृष्णन की पहली पुस्तक ‘दि एथिक्स ऑफ वेदान्त एंड इट्स मटेरियल सपोजिशन’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक से उन्हें विश्व भर में कीर्ति मिली और उनकी गणना इस युग के महानतम मौलिक चिंतकों और दर्शनशास्त्र के प्रामाणिक भाष्यकारों में होने लगी। वैसे तो डॉ. राधाकृष्णन का चिंतन अपनी व्यापकता में मानव जीवन के सभी पक्षों को समेट लेता है, परंतु धर्म, विज्ञान, शिक्षा और इनके परस्पर संबंध पर उन्होंने जो कहा उसका आंशिक रूप में भी अगर मानव जाति पालन कर ले तो हिंसा और प्रतिशोध की ज्वाला में जल रहा समस्त विश्व मानव के लिए आनंद लोक बन सकता है।

डॉ. राधाकृष्णन ने अपना जीवन शिक्षक के रूप में शुरू किया। देश के अनेक प्रतिष्ठित पदों की शोभा बढ़ाते हुए देश के राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर अधिष्ठित हुए लेकिन जीवन भर उनका आदर्श शिक्षक ही रहा। शिक्षक के प्रति उनकी उदात्त भावना का सम्मान कर देश में उनके जन्मदिन को ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। विज्ञान, शिक्षा और प्रौद्योगिकी में निष्णात और आध्यात्मिक चारित्रिक और नैतिक रूप से समुन्नत मानव ही डॉ. राधाकृष्णन का सपना था। धर्म के विषय में आदमी आज जितना किंकर्तव्यविमूढ़ है, उतना कभी नहीं रहा। इस सदी में विज्ञान और प्रौद्योगिकी चमत्कारों की चकाचैंध में आज के आदमी को धर्म, आत्मा, अध्यात्म आदि बीते कल की अप्रासंगिक बातें करने लगी हैं। उसने भौतिक सुख साधनों के विकास की धुन में अपने आंतरिक स्वरूप को भुला दिया है। डॉ. राधाकृष्णन की दृष्टि में आधुनिक मानव की यही सबसे बड़ी भूल है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी से मनुष्य ने अपने लिए भौतिक सुख साधन तो जुटा लिए परंतु अपनी सहज अधोगामी वृत्तियों को ऊंचा करने का उसने कोई उपाय नहीं किया। इससे उसके चारित्रिक सद्गुणों का अधोगमन निरंतर होता रहा। फलस्वरूप जिस विज्ञान से हमारा जीवन अधिक सुखमय होना चाहिए, वही हमारे अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है। रुग्ण चित्त के व्यक्ति के लिए सुख साधन विनाश ही लाते हैं।

डॉ. राधाकृष्णन की दृष्टि में ‘धर्म सही आस्था, सही भावना और सही कर्म’ है। धर्म के नाम पर विश्व में जितना अनर्थ हुआ है उतना किसी और नाम पर नहीं। कारण सिर्फ यह है कि धर्म के मर्म को न समझ कर विभिन्न पूजा पद्धतियों, कर्मकांडों, नियमों, रीति-रिवाजों आदि बाह्य स्वरूपों को ही हम धर्म मानकर चलते रहे। डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार उपरोक्त प्रकार के धर्म के बाहरी स्वरूप भिन्न-भिन्न धर्मों में भिन्न होते हैं, परंतु उन सबका मात्र उद्देश्य आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि, आंतरिक शुचिता और धर्म का विवेक प्राप्त करना है। धर्म मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास की पूर्ण संभावनाओं को प्राप्त करने का साधन है। यह बाहर से आई हुई वस्तु नहीं, वरन् मानव के अंदर से जाग्रत एक आंतरिक अनुशासन है, जिसके तहत मानव संसार की सभी सुख समृद्धियों का सम्यक उपयोग करते हुए अपना जीवन सहजता में जीकर दिव्यता की ओर अग्रसर होता है।

समाज की सुख समृद्धि के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के उपयोग के डॉ. राधाकृष्णन पूरी तरह हामी थे। परंतु मानव के श्रेष्ठ गुणों, आध्यात्म, चरित्र और जीवन के उच्च मूल्यों की कीमत पर सिर्फ विज्ञान और प्रौद्योगिकी के पीछे भागना डॉ. राधाकृष्णन सबसे बड़ा अविवेक मानते थे। उनके अनुसार धर्म और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने कहा कि ‘बिना विज्ञान का धर्म अंधविश्वास के सिवा कुछ नहीं। इससे केवल भ्रम और असमंजस प्राप्त होता है। इसी तरह धर्म के बिना विज्ञान से मानव जाति के अस्तित्व के विनाश का खतरा सुनिश्चित है। विज्ञान हमारे सामने प्रकृति की संपदाओं और शक्तियों को उजागर करता है, जबकि धर्म हमें मानव जाति और प्राणी मात्र के हित में इन संपदाओं और शक्तियों का सदुपयोग करने का रास्ता बताता है।’

वे चाहते थे कि विज्ञान हमारे पांव हो और धर्म हमारी आंख। भौतिक समृद्धि के साथ-साथ गहरे नैतिक बोध का पूर्ण समन्वय ही जीवन को अधिक दिव्य और आनंदपूर्ण बना सकता है। वह चाहते थे कि मानव विज्ञान का दास न बनकर अपनी आत्मा की दिव्यता और श्रेष्ठता को पहचान कर विज्ञान का उपयोग सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय करे। डॉ. राधाकृष्णन भारतवासियों को पश्चिम से सबक लेने की सलाह देते हैं। वहां जो वैज्ञानिक चत्मकार हुए हैं, वे निःसंदेह अकल्पनीय हैं, पर वहां शांति और आनंद का अभाव है। कारण सिर्फ यही है कि उन्होंने आध्यात्म को पिछड़ापन और दिमागी कमजोरी मान लिया। विज्ञान की प्रगति में वहां उच्च नैतिक गुणों व मानव मूल्यों का विकास पिछड़ गया। डॉ. राधाकृष्णन ने स्पष्ट कहा कि हमारी नियति का निर्धारण हमारी भौतिक समृद्धि से नहीं, हमारी आध्यात्मिक शक्ति से होगा।

देश की आजादी के बाद भारत में शिक्षा के स्वरूप और उसकी दिशा के संबंध में डॉ. राधाकृष्णन ने बहुमूल्य सुझाव दिए। यह और बात है कि देश आज भी उन सुझावों का अपनी शिक्षा नीति में ईमानदारी से समावेश नहीं कर सका। वे चाहते थे कि शिक्षा ऐसी हो जिससे व्यक्ति के व्यक्तित्व का चहुंमुखी और संतुलित विकास हो। शिक्षा के साथ व्यक्ति में अच्छे-बुरे का विवेक विकसित होना चाहिए। विवेक से उनका तात्पर्य शाश्वत और क्षणिक, यथार्थ और भ्रम तथा भले तथा बुरे की समझ है। डॉ. राधाकृष्णन चाहते थे कि भारत के युवक-युवतियों में विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा अन्य व्यावसायिक विषयों में दक्षता होने के साथ-साथ उच्च मानवीय और नैतिक गुणों का भी पूरा विकास हो। मानवीय गुणों के बिना भौतिक प्रगति का कोई महत्व नहीं है। बिना करुणा के कोरा शिक्षित व्यक्ति दानवीय हो जाता है। देश में शिक्षा के सही दिशा में विकास के लिए डॉ. राधाकृष्णन चाहते थे कि अधिकाधिक योग्य, मेधावी, चरित्रवान और शिक्षा के लिए समर्पित व्यक्ति इस क्षेत्र में आएं।

शिक्षकों को वे सलाह देते हैं कि वे विद्यार्थियों से सम्मान मांगने की बजाय अपनी योग्यता, उत्कृष्ट गुणों तथा शिक्षा के प्रति समर्पण से विद्यार्थी समुदाय और सम्पूर्ण समाज का सम्मान अर्जित करें। डॉ. राधाकृष्णन की युवाओं को सलाह है कि किसी भी क्षेत्र में हो, पुस्तकें अवश्य पढ़ें। श्रेष्ठ पुस्तकें पढ़ना सभी के लिए आवश्यक है। वह सलाह देते हैं कि हर व्यक्ति वही करे जो वह कर रहा है, बस करने के साथ गहरा नैतिक बोध जुड़ा होना चाहिए। चिकित्सक, वकील, इंजीनियर, श्रमिक, उद्योगपति, अधिकारी, राजनेता, वैज्ञानिक जो भी हो, जो वे कर रहे हैं यदि वे अपने कार्य को नैतिक बोध के साथ करें तो उनका कार्य राष्ट्र और मानव जाति के लिए भी मंगलकारी होगा।

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