राजनैतिकशिक्षा

डबल ईंजन सरकार मणिपुर में हिंसा रोकने में नाकाम क्यों?

(लेखक- मनोज कुमार अग्रवाल)

-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-

पूर्वोत्तर के अद्वितीय खूबसूरती वाले सेवन सिस्टर राज्यों में से एक राज्य मणिपुर कुछ समय की शांति के बाद एक बार फिर से सुलग उठा है। बीते सात अप्रैल को बिशनुपुर जिले के त्रोंगलाओबी गांव में हुए बम विस्फोट में एक बीएसएफ जवान के दो नाबालिग बच्चे मारे गए, जबकि उनकी मां घायल हो गई। मृतकों में एक पांच महीने का नवजात शामिल था। मैतेई नागरिक समाज समूहों ने आरोप लगाया है कि चुड़ाचांदपुर के कुकी-जो उग्रवादी समूह इस हमले के के पीछे हैं और उन्होंने केंद्रीय सुरक्षा बलों को हटाने की मांग भी की है। इस घटना के बाद मैतेई समुदाय के लोगों ने भारी प्रदर्शन शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बलों के कैंप पर हमला बोल दिया। अफवाहों का सहारा लेकर कुछ लोग कैंप में घुसने और हथियार लूटने की कोशिश करने लगे। स्थिति नियंत्रण से बाहर होते देख सीआरपीएफ जवानों ने फायरिंग की, जिसमें तीन स्थानीय निवासी मारे गए। इस तरह पांच मौतें पिछले 10 दिनों में हो चुकी हैं।
आपको बता दें जानकारी के अनुसार राज्य में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है, जिससे स्थानीय लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है। मेइरा पाइबी समूहों ने घाटी क्षेत्रों में पांच दिन का बंद बुलाया है और 25 अप्रैल तक दोषियों की गिरफ्तारी की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि अगर कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन और तेज होगा।
मुख्यमंत्री कार्यालय और गृह मंत्री ने शांति की अपील की है, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। स्थानीय लोग न्याय की मांग कर रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि सुरक्षा बल हमलावरों की पहचान करने में नाकाम रहे हैं। फिलहाल इंटरनेट सेवाएं कई जिलों में निलंबित हैं और तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है।
गौर तलब है कि दुनिया भर में होने वाली राजनीतिक हिंसा और संघर्षों का डेटा ट्रैक करने वाला स्वतंत्र अमेरिकी संगठन आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा प्रोजेक्ट ने एक साल पहले मई 2025 में एक रिपोर्ट जारी की थी, जो मणिपुर में 2023-2025 के बीच होनी वाली हिंसा पर बनाया गया महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसके अनुसार, लगभग शुरुआती 24 महीनों में मणिपुर में 1,000 से अधिक राजनीतिक हिंसा की घटनाएँ और 396 मौतें हुई थीं। लगभग 67000 लोग शरणार्थी शिविरों में रहने को बाध्य हुए। एनसीआरबी के एक शोध के अनुसार, इस समय राहत शिविरों में रहने वाले 65.8% लोग पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से जूझ रहे हैं।
बता दे कि उत्तर-पूर्व हमेशा ऐसा नहीं था। 1949 में तमाम कोशिशों के बाद मणिपुर और त्रिपुरा का भारत में विलय हुआ था। फिर 70 के दशक में मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा पूर्ण राज्य बने, मिज़ो शांति समझौते से होते हुए मिज़ोरम, 1987 में राज्य बना और चीन के लाख दबाव के बावजूद अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। पूरे उत्तर पूर्व में बहुत सारी उठा-पटक के बाद 90 के दशक के अंत में शांति की शुरुआत होने लगी थी। 2000-2014 के बीच का समय इस शांति को स्थायित्व में बदलने का समय था। शांतिपूर्ण बदलाव के समय में 2014 में मोदी सरकार आ गयी जिसे उत्तर पूर्व की शांति को मजबूती देनी थी लेकिन सरकार की अक्षमता मई 2023 में खुलकर तब सामने आ गई जब मणिपुर में मैतेई और कुकी-जो समुदाय के बीच भीषण हिंसा भड़क गई। हिंसा बढ़ती जा रही थी और मोदी सरकार लाचारों की तरह हिंसा को बढ़ते देख रही थी। गृहमंत्री अमित शाह ने 29 मई से 1 जून, 2023 के बीच मणिपुर का दौरा करके एक बेहतर काम किया लेकिन शायद उनमें वो क्षमता ही नहीं थी कि वो इस संघर्ष को रोक पाने के उपाय खोज पाते। शायद इसीलिए इसके बाद वो एक साल तक मणिपुर गए ही नहीं।
अप्रैल 2024 में वो फिर से मणिपुर गए लेकिन इस बार उनका मक़सद मणिपुर में शांति नहीं, मणिपुर में लोकसभा चुनाव प्रचार करना था। इसके बाद वो आज तक मणिपुर नहीं गए। मतलब, भारत के गृहमंत्री, जिसके ऊपर भारत की आंतरिक सुरक्षा का वैधानिक दायित्व है वो मणिपुर जैसे संवेदनशील और हिंसाग्रस्त प्रदेश में 3 मई 2023 से आज तक मात्र दो बार ही गए, यह वास्तव में दुखद है।
जो हालात दोबारा बन रहा है उसमे केंद्र सरकार और मणिपुर की बीजेपी सरकार को तमाम हालात की उच्च स्तरीय जांच कर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए नही तो यह देश के लिए बेहद दुखद होगा कि एक राज्य पिछले 3 सालों से लगातार हिंसा की आग में झुलस रहा है और सरकार की तमाम कोशिश नाकाम हो रहा है गौरतलब है कि इससे पहले मई 2023 में जो हिंसा मणिपुर में शुरु हुई थी, उसमें अब तक कम से कम 260 लोगों की जान जा चुकी है और लगभग 60,000 लोग विस्थापित हुए हैं। यह हिंसा सबसे पहले मैतेई और कुकी समुदायों के बीच शुरू हुई थी और अब लगभग सभी समूह इसमें शामिल हो गए हैं। मणिपुर में मैतेई और कुकी पहले भी मिल-जुलकर नहीं रहते थे, मैतेई समुदाय मुख्य रूप से इंफाल घाटी के मैदानी इलाकों में रहते हैं, जबकि कुकी पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करते हैं। लेकिन तीन सालों की हिंसा के बाद अब मैतेई और कुकी न केवल अपने-अपने क्षेत्रों में सिमट गए हैं, बल्कि एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय के इलाके में जाने का जोखिम भी नहीं एक राज्य के भीतर ऐसा बंटवारा एक भारत-श्रेष्ठ भारत के अनुरूप तो बिल्कुल नहीं है, लेकिन सरकार सच देखकर भी आंख फेर रही है।
2023 में हिंसा इसलिए भड़की थी, क्योंकि मैतेई समदापाको अनुसूचित जनजाति दर्जा की मांग पर मणिपुर हाईकोर्ट ने फैसला लिया था कि मैतेई समुदाय को एसटी सूची में शामिल किया जाए। 2012 से ही मैतेई समुदाय यह मांग कर रहा था ताकि उन्हें आरक्षण, सरकारी नौकरियों और शिक्षा में लाभ मिले। लेकिन तब कुकी-जो समुदाय ने डर जताया कि एसटी दर्जा मिलने पर मैतेई पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन खरीद सकेंगे, उनकी राजनीतिक शक्ति बढ़ेगी जबकि आदिवासियों की जमीन, नौकरियाँ तथा संसाधन प्रभावित होंगे। इस फैसले का विरोध शुरु हुआ और 3 मई 2023 को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर ने पहाड़ी जिलों में ट्राइबल सॉलिडैरिटी यानी आदिवासी एकता मार्च निकाला। इस मार्च के बाद इम्फाल घाटी और पहाड़ी क्षेत्रों में हिंसा भड़क उठी। और फिर उसकी आग कितनी फैल गई, ये सबने देखा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मणिपुर चर्चा में आ गया था, क्योंकि यहां दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर उनके साथ सामूहिक बलात्कार का मामला सामने आया था। तब भी तत्कालीन मुख्यमंत्री बीरेन सिंह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उम्मीद थी कि वे जल्द से जल्द हालात सामान्य करने के लिए कदम उठाएंगे।
पिछले साल फरवरी में एन बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगा, सितंबर में प्रधानमंत्री मोदी ने मणिपुर का दौरा किया और इस साल फरवरी में भाजपा के ही युम्नाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व में नयी सरकार बनी।
लेकिन चंद महीनों की शांति के बाद अब फिर हिंसा भड़की है तो कुछ सवाल भी नए सिरे से खड़े हो गए हैं। जैसे, क्या युम्नाम खेमचंद सिंह भी मणिपुर की नाजुक जातीय संरचना को संभाल कर काम नहीं कर पा रहे हैं। दूसरा सवाल कि क्या सुरक्षा बलों और जांच एजेंसियों में कहीं कोई बड़ी खामी है, जो वो हिंसा को भड़कने और फैलने से रोक नहीं पा रहे हैं। तीसरा और सबसे अहम सवाल, क्या जिस वक्त देश ऊर्जा के गंभीर संकट में फंसा है, मोदी सरकार की नाकाम विदेश नीति की सच्चाई सबके सामने आ चुकी है, क्या ऐसे में मणिपुर में हिंसा की आड़ में कोई बड़ा खेल हो रहा है, जिस पर लोगों का ध्यान न जाए। ध्यान रहे कि मणिपुर हो या लद्दाख, ये प्राकृतिक संपदा के धनी क्षेत्र हैं और अब तक शांतिप्रिय ही रहे हैं। मगर अब वहां अराजक ताकतें सिर उठा रही हैं।
मणिपुर में मौजूदा वक्त में चाहे जिस कारण से हिंसा भड़की हो, अब उस पर तत्काल काम करना होगा। सरकार को बिना देरी कुछ सख्त और जरूरी फैसले लेकर मणिपुर में शांति स्थापित करनी चाहिए।

 

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