राजनैतिकशिक्षा

ईरान-अमेरिका युद्ध के दुष्परिणाम

(लेखक-राजीव खंडेलवाल)

-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-

“लोकतंत्र बदनाम — धार्मिक तानाशाही के आगे लोकतंत्र हारा?”
यूरेनियम संवर्धन के लिए युद्ध करना और युद्धविराम तोड़ना — कितना उचित?
विश्व में शासन की तीन प्रमुख प्रणालियाँ हैं—लोकशाही (लोकतंत्र), राजशाही (राजतंत्र) और तानाशाही। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका और इज़राइल स्वयं को लोकतांत्रिक मूल्यों के वाहक के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि ईरान की शासन प्रणाली इन तीनों से भिन्न एक विशिष्ट “धर्मतांत्रिक गणतंत्र” है।
ईरान की शासन प्रणाली: एक अनोखा मिश्रण।
ईरान में विलायत-ए-फकीह सिद्धांत लागू है, जिसके अंतर्गत सर्वोच्च नेता का चयन प्रत्यक्ष जनता द्वारा नहीं, बल्कि विशेषज्ञों की सभा द्वारा किया जाता है। यह प्रणाली लोकतंत्र और तानाशाही का ऐसा मिश्रण है, जिसमें “ऊपर से लोकतंत्र, भीतर से तानाशाही का कठोर नियंत्रण” स्पष्ट झलकता है।
वर्ष 1979 की इस्लामी क्रांति ने मोहम्मद रेजा पहलवी की राजशाही का अंत कर दिया और धर्म आधारित शासन की स्थापना की। आज ईरान एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ धर्म और राजनीति “एक ही सिक्के के दो पहलू” बन चुके हैं। वर्तमान में पहलवी निर्वासित रूप से अमेरिका में रह रहे है।
लोकतंत्र की पराजय?
28 फरवरी 2026 से प्रारंभ ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध संघर्ष ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिका, जो स्वयं को लोकतंत्र का “झंडाबरदार” मानता है, ने परमाणु कार्यक्रम पर चल रही सहमति बनाने की वार्ता के अंतिम चरण में अचानक आक्रमण (इजरायल के दबाव अथवा कहने से) कर “बातचीत की मेज उलट दी”। विपरीत इसके नागरिक ठिकानों पर हमले कर निर्दोषों की मौत, एक साथ 168 स्कूली बच्चों की नृशंस हत्या के (26 फरवरी 2026) की ये सब घटनाएँ लोकतांत्रिक एवं मानवीय मूल्यों पर “कालिख पोतने” के समान प्रतीत होती हैं।
दूसरी ओर, ईरान ने “सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे” जैसी रणनीति अपनाते हुए संयम और जवाबी कार्रवाई का संतुलन बनाए रखा। ट्रंप के उत्तेजित करने वाले बयानों से प्रभावित, विचलित हुए बिना, ईरान इस्लामाबाद शांति वार्ता में सौम्यता पूर्वक लेकिन दृढ़ता से अपनी सार्वभौंमिकता एवं संप्रभुता के साथ वार्ता में भाग लिया। हर गंभीर धमकी भरे बयानों का भी जवाब आक्रर्मण कार्रवाई किये जाने तक ‘‘संयम’’ का परिचय देते हुए कार्रवाई के बाद ‘‘माकूल’’ जवाब दिया। परिणामस्वरूप, वैश्विक जनमत का एक बड़ा वर्ग ईरान खासकर वहां की जनता के पक्ष में सहानुभूति रखने लगा।
विडंबना यह रही कि जिस ईरान में कुछ समय पूर्व जनता शासकों के खिलाफ शासन परिवर्तन (resim change) के लिए सड़कों पर थी, वही जनता बाहरी हमले के विरोध में एकजुट हो गई। यह स्थिति “घर का भेदी लंका ढाए” के विपरीत “बाहरी खतरे व आक्रमण ने अंदरूनी मतभेद भुला दिए” का उदाहरण बन गई।
उधर अमेरिका में भी व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। सभी 50 राज्यों में लगभग 3000 स्थानों पर 90 लाख से अधिक नागरिकों द्वारा No kings विरोध प्रदर्शन हुए। जिससे यह स्पष्ट हुआ कि लोकतंत्र के भीतर भी असहमति की आवाजें “अंगारों की तरह सुलग रही हैं”। ट्रम्प की रेटिंग गिरी है। स्पष्ट है, ट्रंप के बेकहूफियों से भरे इन गलत कदमों से ‘‘लोकतंत्र हारा’’ व इस्लामिक तानाशाही शासक विजयी भाव से मद मस्तक हो गया। अमेरिका की विश्वशनीयता घाटी तथा जगहंसाई हुई अलग।
परमाणु शक्ति: दादागिरी एवं दोहरा मापदंड?
ईरान-अमेरिका-इस्लामाबाद शांति वार्ता के असफल होने का प्रमुख कारण अमेरिका ने यूरेनियम संवर्धन पर सहमति न होना बतलाया। प्रश्न यह उठता है कि जो राष्ट्र स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वे दूसरे देश जो परमाणु संपन्न हथियारों से संपन्न देशों के आक्रमण से ग्रसित हैं, भयभीत हैं, को इस अधिकार से वंचित क्यों करना चाहते हैं?
संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के पांचों स्थाई सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन परमाणु अप्रसार संधि (NIT) के सदस्य होकर भी परमाणु अस्त्र संपन्न राष्ट्र हैं। जबकि शेष चार राष्ट्र भारत, पाकिस्तान, इज़राइल और उत्तर कोरिया परमाणु हथियार संपन्न देश एनपीटी के सदस्य नहीं हैं। यह स्थिति “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाली कहावत को चरितार्थ करती है तथापि 191 देश एनपीटी के सदस्य हैं, जिन्होंने परमाणु बम न बनाने का वायदा किया है। जहां तक ईरान का प्रश्न है, उसके पास 60% से अधिक संवर्धित यूरेनियम है, जिससे कभी भी 90% संवर्धन कर परमाणु बम बनाया जा सकता है। 1980 के दशक में ईरान इराक युद्ध के दौरान ईरान के संस्थापक सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह रुहोल्लाह खोमेनी परमाणु बम को इस्लाम के विरुद्ध बतलाया। वर्ष 2003 में अली खामेनेई ने इसके विरुद्ध फतवा जारी किया। बड़े राष्ट्र अपने लिए नियम अलग और दूसरों के लिए अलग बनाते हैं—यह “दोगली नीति” वैश्विक असंतोष को जन्म देती है।
यदि परमाणु शक्ति का उपयोग शांति के लिए उचित है, तो वही अधिकार अन्य देशों को क्यों नहीं? यह प्रश्न आज भी “गले की हड्डी” बना हुआ है।
ईरान से क्या सीख!
इस संघर्ष से यह स्पष्ट होता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, आत्मविश्वास और रणनीतिक संयम से बड़ा से बड़ा दबाव भी झेला जा सकता है। उसने दृढ़ और सर्वकालीन नीति से विश्व के जनमानस में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाई है।
ईरान ने यह सिद्ध कर दिया कि “चींटी भी हाथी को नचा सकती है”, यदि उसके पास धैर्य और संकल्प के साथ स्पष्ट नीति हो। अनेक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, सैन्य दबाव तथा तुलनात्मक सैन्य कमजोर ढांचे के बावजूद ईरान ने अपने हितों की बखूबी रक्षा की, विश्व को एक नई दिशा दी और विरोधियों को नाकों चने चबाकर लगभग घुटने टेकने के लिए मजबूर कर पुनः वार्ता की मेज पर आने को विवश किया।
निष्कर्ष।
ईरान- अमेरिका युद्ध ने वैश्विक राजनीति के कई मिथकों को तोड़ा है। लोकतंत्र के दावे के साथ आचरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि लोकतांत्रिक राष्ट्र स्वयं ही अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करें, तो यह लोकतंत्र की साख को “खोखला” कर देता है।
अंततः, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस संघर्ष ने यह संदेश दिया—
“ताकत ही सत्य नहीं होती, बल्कि धैर्य, संयम और सुस्पष्ट राष्ट्रनीति ही स्थायी विजय व सम्मान दिलाती है।”

 

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