राजनैतिकशिक्षा

स्पीकर पर ‘अविश्वास’

-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-

लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास और उन्हें पद से हटाने के प्रस्ताव का नोटिस अधूरे विपक्ष ने दिया है। प्रस्ताव पर 119 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और सपा नेता अखिलेश यादव समेत तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसदों और आम आदमी पार्टी (आप) के तीन सांसदों ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं, लिहाजा विपक्ष विभाजित और अधूरा है। साफ है कि यह कांग्रेस का प्रस्ताव है और उसे वामदलों का समर्थन हासिल है। हालांकि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने वाममोर्चे से गठबंधन तोड़ कर अकेले ही चुनाव लडऩे की घोषणा की है। केरल में ये दोनों पक्ष धुर प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन केंद्र की राजनीति में एक-दूसरे से चिपके हैं। यह अहम सवाल और संदेह है कि नेता प्रतिपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए? जबकि स्पीकर के खिलाफ अविश्वास का आधार ही नेता प्रतिपक्ष हैं। आरोप हैं कि स्पीकर ने उन्हें सदन में बोलने क्यों नहीं दिया? कांग्रेस और विपक्ष के 8 सांसदों का निलंबन वापस लिया जाए। कांग्रेस की जिन महिला सांसदों ने प्रधानमंत्री मोदी की सीट का घेराव किया था और उस पर स्पीकर ने जो आशंकित टिप्पणी की थी, उस पर भी कांग्रेस स्पीकर के व्यवहार से नाराज है। कमाल यह है कि सदन में प्रधानमंत्री की सीट का घेराव हो और स्पीकर अप्रत्याशित, अप्रिय घटना होने की आशंका व्यक्त करें और संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू उस घेराबंदी का वीडियो जारी करें, लेकिन एक प्राथमिकी तक दर्ज नहीं की गई! क्या प्रधानमंत्री की सुरक्षा गंभीर और संवेदनशील मुद्दा, सरोकार नहीं है? बहरहाल मोदी कालखंड के दौरान अविश्वास प्रस्तावों का उल्लेख करने से पहले देश को यह बताना बेहद जरूरी है कि लोकसभा के प्रथम स्पीकर गणेश वासुदेव मावलंकर के खिलाफ भी 15 दिसंबर, 1954 को अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया गया था। उन्हें ‘लोकसभा का जनक’ माना जाता है और उन्हें ‘दादा साहेब’ कहकर संबोधित करते थे।

अविश्वास का सिलसिला यहां से शुरू हुआ और 24 नवंबर, 1966 को तत्कालीन स्पीकर सरदार हुकुम सिंह के खिलाफ मधु लिमये ने नोटिस दिया। 1967 में स्पीकर नीलम संजीवा रेड्डी के प्रति अविश्वास व्यक्त किया गया। 15 अप्रैल, 1987 को तत्कालीन स्पीकर बलराम जाखड़ के खिलाफ सीपीएम नेता सोमनाथ चटर्जी ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। सोमनाथ बदलते समीकरणों के तहत कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार के दौरान स्पीकर बने। केंद्र में भाजपा-एनडीए सरकार के दौरान स्पीकर रहे बालयोगी के खिलाफ 2001 में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। गौरतलब यह है कि ये तमाम अविश्वास प्रस्ताव नाकाम रहे और किसी भी स्पीकर को उनके पद से हटाया नहीं जा सका। इस बार भी यह ‘तमाशा’ साबित होगा। अभी तो नोटिस का समय 14 दिन का है। सांसदों के हस्ताक्षरों की पुष्टि होगी। यदि सब कुछ ठीक रहा, तो बजट सत्र के दूसरे चरण में, 9 मार्च के बाद, अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में कार्रवाई शुरू होगी। विपक्ष ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ भी 2018 और 2023 में अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस दिए। दोनों बार मत-विभाजन की नौबत आई और विपक्ष का प्रस्ताव बहुमत के मामले में पराजित हुआ। बहरहाल स्पीकर के प्रति अविश्वास और उन्हें हटाने का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 94 (सी) में निहित है। इस बार भी यह प्रस्ताव एक ‘मजाक’ साबित होगा, क्योंकि विपक्ष ही विभाजित है। कथित ‘इंडिया’ के तहत 233 सांसद हैं, लेकिन संसद में ‘इंडिया’ की कोई पहचान नहीं है। न उसका नेता, न संविधान, न ही कार्यकारिणी संसद में बताई गई है, लिहाजा संसद में ‘इंडिया’ को कोई मान्यता नहीं है। मोदी सरकार के नेतृत्व वाले एनडीए के 293 सांसद हैं और कुछ सांसद ऐसे हैं, जो एनडीए का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन सरकार के पक्ष में मतदान करते रहे हैं। दरअसल स्पीकर का पद निष्पक्षता, तटस्थता, संवैधानिक मर्यादा, लोकतांत्रिक संतुलन का प्रतीक माना जाता रहा है। स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ कांग्रेस के आरोप बेमानी हैं, क्योंकि स्पीकर ने व्यवस्था दी कि नियमानुसार नेता विपक्ष सदन में किसी अप्रकाशित किताब के अंश नहीं पढ़ सकते।

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