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महाबोधि महाविहार अधिनियम 1949 के खिलाफ तेज हुआ आंदोलन, बौद्ध समाज ने उठाई प्रबंधन अधिकार की मांग

नई दिल्ली।(विजय कुमार भारती) संपूर्ण विश्व के बौद्धों की सर्वोच्च आस्था का केंद्र महाबोधि महाविहार आज भी बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 की विसंगतियों से जूझ रहा है। बौद्ध समाज का कहना है कि उनके सबसे पवित्र तीर्थ स्थल का प्रबंधन अब तक पूर्ण रूप से बौद्धों के हाथों में नहीं होना, एक ऐतिहासिक और संवैधानिक अन्याय है।
बौद्ध संगठनों का तर्क है कि भारतीय संविधान प्रत्येक धर्म को अपने धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन का अधिकार देता है, ऐसे में केवल बौद्धों को इस अधिकार से वंचित रखना लोकतंत्र और समानता की भावना के खिलाफ है। उनका कहना है कि महाबोधि महाविहार केवल एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं, बल्कि बौद्ध धर्म की आत्मा और पहचान का प्रतीक है।
देशभर में इस मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन, सभाएं और जनजागरूकता अभियान तेज हो गए हैं। आंदोलनकारी संगठनों का कहना है कि यह संघर्ष अब केवल धार्मिक मांग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।
बौद्ध समाज के नेताओं का दावा है कि देशभर में फैला बौद्ध समुदाय आज एक संगठित और प्रभावशाली मतदान शक्ति के रूप में उभर चुका है, जो चुनावी राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। उनका स्पष्ट संदेश है कि यदि सरकार और प्रशासन ने इस मांग की अनदेखी जारी रखी, तो इसका असर आने वाले चुनावों में दिखाई देगा।
आंदोलनकारियों ने केंद्र और राज्य सरकार से मांग की है कि बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 को तत्काल रद्द कर महाबोधि महाविहार का संपूर्ण प्रबंधन बौद्ध समाज को सौंपा जाए। उनका कहना है कि करोड़ों बौद्धों की भावनाओं और अधिकारों की उपेक्षा अब और नहीं की जा सकती।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह आंदोलन इसी तरह व्यापक होता गया, तो यह भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

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