मध्यप्रदेश कांग्रेस में नेतृत्व का संकट

-रहीम खान-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

-वर्तमान अध्यक्ष एवं कार्यकर्ताओं के बीच संवादहीनता

-97 विधायकों के पश्चात निराशा का वातावरण

मध्यप्रदेश जो कभी कांग्रेस पार्टी का सुरक्षित टापू था। किंतु पार्टी के भीतर बड़े नेताओं के वर्चस्व की लड़ाई और संगठन को मजबूत करने के तरफ ध्यान नहीं देना या फिर जिन्हें संगठन की बागडोर सौंपी गई उनके द्वारा अपने दायित्वों के निर्वाहन के प्रति गंभीर नहीं रहने का परिणाम है कि प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का संगठन क्षतविक्षत हालत में है। जिला कांग्रेस कमेटियां केवल कागजों में ही शोभायमाय है। जमीन पर इसकी वह भूमिका नहीं है जिसकी आवश्यकता है। राजनीति में सरकार तो आती जाती है किंतु संगठन हमेशा अपनी जगह पर कायम रहता है। इस नजरिये से प्रदेश में कांग्रेस संगठन की स्थिति दम तोड़ने वाली है। दुर्भाग्य की बात है कि विगत 17 साल के अंतराल में यह पहला अवसर है जब विधानसभा सदन के भीतर कांग्रेस पार्टी के 97 विधायक होने के बाद भी पार्टी के भीतर निराशा का वातावरण है। प्रदेश में 15 माह के कार्यकाल के बाद सत्ता से बाहर होने के बाद भी कांग्रेस पार्टी अपना नया प्रतिपक्ष नेता नहीं चुन पाई है। ये बेकार की बात है कि दिल्ली वाले तय करेगें कि प्रतिपक्ष नेता कौन होगा ? वास्तविकता यह है कि कांग्रेस के भीतर ही नेताओं में आपसी तालमेल समन्वय का अभाव है। जिसके कारण नौ माह बाद भी कांग्रेस अपना नया प्रतिपक्ष नेता नहीं ढूंढ पाई। मुख्यमंत्री के रूप में विफल होने वाले कमलनाथ मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में भी कोई बहुत बड़ा उत्साह अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं में नहीं जगा पाये। वर्तमान समय प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष और पार्टी कार्यकर्ताओं में संवादहीनता की खाई बहुत चैड़ी है। हजारों रूपये खर्च करके पार्टी कार्यकर्ता नेता प्रदेश अध्यक्ष से मिलने उनके बंगले में जाते है जहां उन्हं 2-3 या 5 मिनट से ज्यादा का समय नहीं मिल पाता। इनके पास अपने नेता और विधायक की बात सुनने का समय नहीं जो लोग इनके व्यक्तिगत जयजयकार के नारे लगाते है वह तो इनसे मिलने में सफल हो जाते है परन्तु जो जय जय कांगे्रस बोलता है वह उपेक्षा का दंश भोगकर वापस लौट जाता है। कांग्रेस जिस संघर्ष के दौर से गुजर रही है वहां उसके लिये सबसे पहली जरूरत कार्यकर्ताओं में नये राजनीतिक ऊर्जा का संचार करना है जिसकी कमी साफ दिखाई पड़ती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कमलनाथ अपने ही कार्यकर्ताओं में नये ऊर्जा का संचार करने में विफल रहे है बकौल एक पूर्व विधायक कमलनाथ के पास वफादारी ही नहीं अवसरवादिता हावी रहती है। यही कारण है कि इनका अपने ही लोगों के साथ सीधा संवाद बहुत कमजोर है। ये छिंदवाड़ा के लोगों को तो प्राथमिकता देते है परन्तु प्रदेश के दूर दराज के क्षेत्र के आने वाले लोगों के लिये इनके पास समय नहीं होता।

बहरहाल मध्यप्रदेश में वर्तमान समय कांग्रेस पार्टी राजनीतिक लड़ाई के जिस दौर से गुजर रही है वहां कांग्रेस के भीतर पार्टी अध्यक्ष जब तक अपने संगठन के लोगों को पर्याप्त समय नहीं देगें उनकी और उनके क्षेत्र की समस्याओं को नहीं सुनेगें तब तक एक मजबूत संगठन के रूप में कांग्रेस नहीं उभर पायेगी। केवल हवा हवाई व्यक्तिगत जय जयकार को ही राजनीतिक औपचारिकता समझने से बात नहीं बनेगी। कमलनाथ जैसी अनुभवी राजनेता के पास उस नजर का अभाव रहा है जो सही में कांग्रेस के लिये कुछ कर सकते है। जो लोग चुनाव में अपने वार्ड में 50 वोट नहीं दिलाते ऐसे नेता हमेशा कमलनाथ की आंख का तारा बने रहते है। जिसके चलते अनेक जिलों में कांग्रेस संगठन की सारी गतिविधियां कागजों में सिमट कर रह गई है। चार कार्यकारी अध्यक्ष बनाये जाने के बाद भी मध्यप्रदेश में कांग्रेस संगठन का उदासीन और कमजोर होना केन्द्रीय नेतृत्व के प्रदेश के प्रति उपेक्षित दृष्टिकोण को ही प्रदर्शित करता है। कांग्रेस संगठन के भीतर निराशा का वातावरण कब तक बना रहेगा। इत्यादि प्रश्न कांग्रेस के गलियारे में पार्टी कार्यकर्ताओं के मध्य जिज्ञासा का विषय बने हुए है। नेतृत्व वह होता है जो अपने व्यवहार विचार और कार्यो से अंतिम छोर पर खड़े कार्यकर्ता का मन भी जीत लेता है। लेकिन कांग्रेस के भीतर एकदम उलट स्थिति है। वहीं दूसरी तरफ प्रदेश में सत्ताधारी भाजपा अगर कांग्रेस के द्वारा उठाये जा रहे मुद्दों को प्रभावी नहीं होने दे रही है तो उसका एक महत्वपूर्ण कारण बूथ स्तर तक उसका पार्टी संगठन का सक्रिय और मजबूत होना। किसान आंदोलन जैसे बड़े प्रोग्राम भी प्रदेश के कई जिलों में कमजोर कांग्रेस संगठन के चलते विफल हो गये।जो पार्टी अध्यक्ष अपने २० महिने के कार्यकाल में अपनी पार्टी की ऑफिसियल वेब साइट को अपडेट नहीं कर पाए वह पार्टी संगठन को किस तरह से नई गति दे पाएंगे ये बढ़ा सवाल काँग्रेस का जमीनी कार्यकर्त्ता पूछ रहा हैं ?

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