राजनैतिकशिक्षा

हिंसक भीड़ के मायने

-: ऐजेंसी/सक्षम भारत :-

विपक्ष अक्सर तानाशाही शासन की बात करता रहता है। उसे लोकतंत्र और संविधान बचाने की घोर चिंता है, जबकि दोनों ही बेहद सुरक्षित हैं। विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी के कालखंड को ‘अघोषित आपातकाल’ करार देता रहा है। विपक्षी नेता और मुख्यमंत्री प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के समन नोटिसों को खारिज कर रहे हैं। विपक्ष की शिकायत है कि मोदी सरकार जांच एजेंसियों को, विपक्षी नेताओं के खिलाफ, एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है, जबकि सत्ता-पक्ष के कई केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों पर घोटालों के गंभीर आरोप हैं। ईडी, सीबीआई, आयकर विभाग उन पर छापे की कार्रवाई नहीं कर सकते। मोदी सरकार विपक्षी नेताओं को जेल में डाल कर उन्हें चुनाव प्रचार से वंचित रखना चाहती है, ताकि भाजपा-एनडीए एक और बार जीत कर केंद्र में सरकार बना सकें। बेशक इन आरोपों की अपनी तार्किकता है, लेकिन सर्वोच्च अदालत ने विपक्ष की सामूहिक दलीलों को खारिज कर दिया था कि जांच एजेंसियां विपक्ष को प्रायोजित मामलों में फंसा रही हैं।

दरअसल यह आम चुनाव, 2024 का दौर है। चुनाव बेहद करीब हैं, लिहाजा विपक्षी गठबंधन भी मंथन और विमर्श कर रहा होगा कि राजनीति, नीति-निर्माण और शासन का कौनसा मॉडल मतदाताओं के सामने प्रस्तुत किया जाए! यह सवाल भी उसके विचारार्थ होगा कि कानून का राज उचित है अथवा भीड़ को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाए? हिंसक भीड़ को संरक्षण देना और उसे कानून के राज से बचाना क्या संवैधानिक है? पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस पार्टी के जिस नेता के भडक़ाने और उकसाने पर भारी भीड़ ने ईडी के अफसरों पर जानलेवा हमला किया, क्या ‘भीड़ के शासन’ वाले मॉडल की यही व्यवस्था देश में होनी चाहिए? वह गुंडागर्दी कराने वाला नेता आज कहां है? राज्य की पुलिस ने क्या कार्रवाई की है?

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खामोश और निरुत्तर क्यों हैं? ममता ने खुद हिंसक राजनीति के दंश झेले हैं, जानलेवा हमलों का मुकाबला किया है, नतीजतन बंगाल ने उन्हें सत्ता का लगातार जनादेश दिया है। सवाल है कि उनके शासन में भी वही रक्तपात क्यों किया जा रहा है, जिसे झेलकर वह मुख्यमंत्री के पद तक पहुंची हैं? बंगाल में हिंसक टकराव और हमले बार-बार देखे जाते रहे हैं। चाहे पंचायत के चुनाव हों या घोटालों की जांच के लिए एजेंसियों के छापों की कार्रवाई हो, स्थानीय समर्थकों की भीड़ खून का नंगा नाच करती है। क्या ममता ऐसी कानून-व्यवस्था की पक्षधर हैं? वह अक्सर लोकतंत्र, संविधान, संघीय ढांचे का चीत्कार करती रही हैं। कितना खोखला विरोधाभास है? बीते शुक्रवार को ईडी की टीम ने तृणमूल नेता शाहजहां शेख के घर पर छापा मारना था। शेख पर करोड़ों रुपए के राशन घोटाले का आरोप है। उसने गरीबों का अन्न छीना है। उसके वफादार समर्थकों ने टीम का रास्ता रोका, वाहनों पर हमला किया, डंडों और लोहे की रॉड से तीन अफसरों को घायल कर दिया। वे अस्पताल में उपचाराधीन हैं। उन घायल अफसरों ने यह भी बताया है कि स्थानीय पुलिस को फोन कॉल्स की गईं, लेकिन कोई मदद नहीं मिली। पुलिस की प्रतिक्रिया बिल्कुल ठंडी रही। कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, यह सत्तारूढ़ पार्टी और राज्य सरकार की प्रतिक्रिया थी। दरअसल केंद्रीय जांच एजेंसियों के खिलाफ तृणमूल सरकार और बंगाल में उनके समर्थकों का यह रवैया नया नहीं है। इसे रोकना होगा।

 

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