अमृत महोत्सव : देश के लिये मर मिटने का संकल्प

-निलय श्रीवास्तव-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

देश के लिए वह ऐतिहासिक क्षण होगा जब 75वाँ अमृत महोत्सव मनाया जा रहा होगा। अमृत महोत्सव देश की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में उत्साह में भर देने वाला पर्व तो है ही साथ ही स्वतंत्रता संग्राम में अपनी जान न्यौछावर करने वाले शूरवीरों को सच्ची श्रद्धांजलि देने का माध्यम भी है। अमृत महोत्सव अर्थात्् दिवंगत स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग का अमृत, नये विचारों का अमृत, नये संकल्पों के साथ नयी ऊर्जा और आत्मनिर्भरता का अमृत। इस कार्यक्रम को जन उत्सव में परिवर्तित करने वाले देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों में ष्स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की तरह ही आजादी के 75 वर्ष पूरे होने का यह सफर आम भारतीय के अथक परिश्रम, नव ऊर्जा और उत्साह का प्रतिबिम्ब है। हमें देश के संविधान पर गर्व है, मजबूत लोकतंत्र के लिए विश्व में अपनी अलग पहचान स्थापित करने वाला भारत देश ज्ञान और विज्ञान से समृद्ध होकर मंगल से लेकर चंद्रमा तक अपनी विशिष्ट छाप छोड़ रहा है।

आजादी के अमृत महोत्सव के इस वृहद कार्यक्रम में मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार भी पूरे उत्साह, जोश ए खरोश के साथ अपनी भागीदारी सुनिश्चित करवा रही है। सभी जानते हैं कि मध्यप्रदेश का स्वतंत्रता संग्राम सम्बंधी इतिहास उल्लेखनीय और प्रासंगिक रहा है। यहाँ अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ लड़ाई लडकर शूरवीरों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर स्वतंत्रता की लड़ाई में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के प्रयासों से ऐसे प्रबृद्धजनों के बारे में समय-समय पर कार्यक्रम चलाये जाते हैं ताकि लोगों के स्मृति पटल पर वे हमेशा बने रहें तथा आमजन को देश पर मर मिटने का संकल्प मिलता रहे। इसी कड़ी में मध्यप्रदेश सरकार का उद्देश्य श्हर घर तिरंगाश् अभियान का आगाज कर प्रदेश के लोगों को देश के प्रति समर्पित रहने का संदेश देकर देश और प्रदेश की तरक्की, सुरक्षा और सम्पन्नता में सहभागी बनाने का प्रयास है। श्हर घर तिरंगाश् अभियान को लेकर मध्यप्रदेश के लोगों में अपार उत्साह बना हुआ है। युवा पीढ़ी के साथ बच्चे भी इसे लेकर उत्साहित हैं। तिरंगा यात्रा को लेकर पूरे मध्यप्रदेश में उत्साहजनक माहौल निर्मित है। मध्यप्रदेश में निश्चित रूप से ऐसे आयोजन होते रहने चाहिये।

यहाँ बता दें कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान देश और अपने प्रदेश से अपार प्रेम करते हैं, यह प्रेम कभी -कभी उनकी बातों में स्पष्टतरू झलकता भी है। स्वाधीनता सेनानियों का सम्मान कर उनकी स्मृतियों को जन सामान्य तक पहुँचाने का अभिनव प्रयोग मध्यप्रदेश में हो रहा है। विभिन्न जाति और धर्म के लोगों को एक सूत्र में बाँधकर रखने वाले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान विभिन्न स्तर के आयोजन कर सरकार और जनता के बीच की दूरी को मिटा रहे हैं, इसके लिए वे प्रशंसा के पात्र हैं। आजादी मिले 75 साल का लम्बा समय बीत चुका है। आजादी की सुखद अनुभूति है लेकिन जब देश के विभाजन की बात सामने आती है तो एक शूल हृदय में चुभता है। महज राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए देश का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान का जन्म हुआ। मानव हिंसा और पलायन की जो दर्दनाक तस्वीरें दुनिया ने देखीं उससे सभी हतप्रभ रह गए। नरसंहार ऐसा था जिससे रोंगटे खड़े हो गए। संदर्भ ग्रंथो के अनुसार भारत के विभाजन से प्रभावित तीन प्रमुख राज्य पंजाब, बंगाल और सिन्ध में हिन्दू, सिख और मुस्लिम गांव थे। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य गांवों में इन तीनों समुदायों के लोग थोड़ी- थोड़ी संख्या में थे। विभाजन के फैसले के बाद साठ लाख गैर मुसलमानों को नये बने पश्चिमी पाकिस्तान क्षेत्र से बाहर निकलना पड़ा और 65 लाख मुसलमानों को भारतीय हिस्से के पंजाब, दिल्ली आदि जगहों से निकल पश्चिम पाकिस्तान जाना पड़ गया था। मानवता के इतिहास में पहले कभी किसी भी विषम परिस्थिति में इतने कम समय में इतनी बड़ी आबादी का स्थानांतरण नहीं हुआ था। विभाजन के फैसले से प्रभावित हिंसा में मारे गए लोगों की संख्या तीस हजार से लेकर 7 लाख के दरम्यान होने का अनुमान लगाया गया था।

भारत विभाजन के बाद अब देश पुनरावृत्ति नहीं चाहता। धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में आरम्भ से ही उथल पुथल रही है। स्वतंत्रता के पश्चात्् 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरिसिंह ने अपनी रियासत का विलय भारत में कर दिया था। इस विलय को गर्वनर जनरल माउंटवेटन ने 27 अक्टूबर को स्वी.ति प्रदान कर दी थी। अन्य रजवाड़ों की तरह कश्मीर भी भारत में शामिल हो गया लेकिन पाकिस्तान इससे खुश नहीं था। उसने विघटनकारी ताकतों को जुटाकर कश्मीर की शांति को भंग करने की योजना बनायी। कश्मीर में अलगाववादियों को मिलाकर आतंकी हमले लगातार किये गए। कश्मीरी पंडितों का विस्थापन और स्थानीय नागरिकों को धर्म आधारित बांटने की साजिश अभी भी जारी है। हिन्दू कश्मीरी पंडितों का पलायन चिंता का विषय है। याद रहे कि जनवरी 1990 में कश्मीर घाटी से हिन्दू कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ था। मस्जिदों से घोषणा की गयी थी कि कश्मीरी पंडित काफिर हैं और उन्हें कश्मीर छोडना होगा। यदि कश्मीर नहीं छोड़ा तो उन्हें इस्लाम कबूल करना होगा अन्यथा उन्हें मार दिया जायेगा। कश्मीरी मुसलमानों को पंडित घरों की पहचान करने का निर्देश दिया गया ताकि उनका धर्म परिवर्तन कर डराया धमकाया जा सके। जिन लोगों ने मजबूर होकर कश्मीर छोडने का फैसला लिया उन्हें घर की महिलाओं को वहीं छोडने के लिये कहा गया। इस तरह कश्मीर में कभी शांति नहीं रही। आतंक, अलगाव को बढ़ावा देने वाली ताकतें हमेशा प्रभावी रहीं। कश्मीर को लेकर आज भी देश में एक राय है, यह भारत का हिस्सा है और भविष्य में रहेगा। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है इसे जुदा कर देश को एक और विभाजन की पीड़ा देने के मंसूबे कभी सफल नहीं होंगे।

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