जनता के अधिकारों को बेच रहे हैं सांसद, विधायक और पार्षद

-सनत जैन-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक अपने अधिकार मत के माध्यम से राजनीतिक दल और उसके उम्मीदवार को देकर अपना प्रतिनिधि चुनता है। यही प्रतिनिधि जब दल-बदल करता है, तो वह अपने मतदाताओं के साथ धोखा करता है। लोकतंत्र में नंबर के खेल में पार्षद, विधायक, सांसद जनता के मिले अधिकारों को लाखों करोड़ों रुपए में बेचकर निजी फायदा उठाते हैं। वहीं अपने मतदाताओं, जिनके अधिकार से वह अधिकार पाते हैं, के साथ धोखा कर उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। मतदाता पार्टी की विचाराधारा, नेतृत्व एवं उम्मीदवार को देखकर अपना मत देकर उसे अपना प्रतिनिधि चुनता है।

क्रॉस वोटिंग और हार्श ट्रेडिंग ने लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं मतदाताओं के विश्वास को भारी नुकसान पहुंचाया है। अब कोई भी धन-पशु, धन खर्च करके नगर पालिका, नगर निगम, राज्य सरकार के लिए करोड़ों रुपए का निवेश कर अरबों रुपए कमा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में दल-बदल की बीमारी बड़ी तेजी के साथ बढ़ती ही जा रही है। बिना चुनाव लड़े, कोई भी राजनीतिक दल किसी भी राज्य में अपनी सरकार बनाने में सफल हो रहे हैं। अल्पमत में होते हुए पार्षदों, विधायकों एवं सांसदों को खरीद कर सत्ता पर काबिज होने के दर्जनों मामले हैं। उसके बाद भारी भ्रष्टाचार कर सैकड़ों और हजारों गुना कमाने का खेल बड़े पैमाने पर देश में चल रहा है। इसमें कारर्पोरेट जगत की भागीदारी ने चिंता को और बढ़ा दिया है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत नागरिक का वोट है। आम मतदाता, जिसके वोट से जनप्रतिनिधि चुने जाते हैं। वही जनप्रतिनिधि अपने मतदाता की पीठ में छुरा भोंककर मतदाता को उसके अधिकार से वंचित कर आर्थिक और मानसिक नुकसान पहुंचाता है। ऐसे जनप्रतिनिधियों को सबक सिखाने की जरूरत है। दल बदल कानून का अब कोई मतलब नहीं रह गया है। “समरथ को नहिं दोष गुसाईं” की तर्ज पर दल-बदल कानून के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जिन पर डाली गई है। वह अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूर्णत: असफल साबित हुए हैं। हाल ही में न्यायपालिका का जो रुख देखने को मिल रहा है। वह अप्रत्यक्ष रूप से दल बदलुओं को फायदा पहुंचा रहा है। जिसके कारण अब स्थिति बद से बदतर होती जा रही है।

विशेष रुप से पंचायत, नगरीय संस्थाओं और विधानसभाओं में जिस तरीके से नेता बिक रहे हैं, उसके बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था और लोकतंत्र पर मतदाताओं का विश्वास खत्म होने लगा है। नगरीय संस्थाओं, राज्य सरकारों तथा केन्द्र सरकार ने पिछले वर्षों में जनता के ऊपर लगातार टैक्स बढ़ाये हैं। बहुमत के बिना, बिना बहस के कानून बन रहे हैं। जनता को जो सुविधायें नि:शुल्क मिलती थी उस पर भारी-भरकम शुल्क वसूला जा रहा है। नित नये कानून बनाकर आम जनता के मौलिक अधिकारों को खत्म किया जा रहा है। चुने हुए प्रतिनिधियों को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया जाता है। निर्वाचित प्रतिनिधियों को बोलने के लिए 2 से 5 मिनिट का समय दिया जाता है। विधानसभा और लोकसभा के जो सत्र पहले महीनों चलते थे, वह कुछ ही दिनों में हो-हल्ले के बीच समाप्त हो जाते हैं। विधानसभा, लोकसभा और राज्य सभा में हो-हल्ले के बीच बड़े-बड़े कानून बन जाते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में मनी बिल के रुप में ईडी को जो अधिकार दिये गए हैं। उसने नागरिकों के मौलिक अधिकारों को समाप्त कर दिया है। न्यायपालिका सरकार के दबाव में काम करती हुई दिखने लगी है। हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति भी सरकारी पसंद से हो रही है। जिसके कारण आम नागरिकों का लोकतांत्रिक व्यवस्था से विश्वास टूट रहा है। न्यायपालिका पर जो विश्वास था। वह भी टूट रहा है। जॉंच एजेंसियॉं एवं संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर जनता का विश्वास खत्म होना चिंता का विषय है। ऐसी स्थिति लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक मानी जाती है। इस स्थिति में तानाशाही अथवा बगावत दो ही रास्ते खुलते हैं, दोनों ही आम जनता एवं देश के लिए नुकसानदायक होते हैं।

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