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एनआरसी ने मानवीय संकट पैदा किया है: जन न्यायाधिकरण

नई दिल्ली, 09 सितंबर (ऐजेंसी/सक्षम भारत)। न्यायालय द्वारा असम में एनआरसी की प्रक्रिया के लिए समयसीमा तय करने पर जोर देने के चलते इससे संबंधित लोगों पर दबाव बढ़ा है। एक ष्जन न्यायाधिकरणष् ने यह बात कही। न्यायाधिकरण ने आलोचना करते हुए कहा कि इस कवायद से ‘‘मानवीय संकट पैदा’’ हो गया है। इस न्यायाधिकरण में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एम बी लोकुर और कुरियन जोसफ, और दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ए पी शाह शामिल हैं। न्यायाधिकरण ने कहा कि हालात चिंताजनक हैं ‘‘क्योंकि इस संकट के खत्म होने के कोई संकेत नहीं है।’’ असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) की अंतिम सूची जारी होने के एक सप्ताह बाद 7-8 सितंबर को नागरिकों की ज्यूरी ने इस मुद्दे पर चर्चा की। एनआरसी की अंतिम सूची में 19 लाख से अधिक लोग बाहर हो गए हैं। एनआरसी में शामिल होने के लिए 3.30 करोड़ से अधिक लोगों ने आवेदन किया था। दो दिन चली चर्चा के दौरान न्यायाधिकरण ने चार सवालों पर फोकस किया- क्या एनआरसी की प्रक्रिया संविधान के अनुरूप है? संवैधानिक प्रक्रियाओं और नैतिकता को बनाए रखने में न्यायपालिका की क्या भूमिका है? मानवीय संकट क्या हैं और एनआरसी को देश के बाकी हिस्सों में लागू करने के नतीजे क्या होंगे? इस दौरान एनआरसी में शामिल होने से रह गए लोगों, और विभिन्न अग्रणी विशेषज्ञों के विचार और अनुभव सुने गए। न्यायाधिकरण ने कहा, ‘‘हम सब इस बात पर सहमत हैं कि एनआरसी ने एक मानवीय संकट पैदा किया है। हम चिंतित हैं क्योंकि इस संकट के कम होने के कोई संकेत नहीं है।’’ इसमें कहा गया कि असम में बड़ी संख्या में धार्मिक, भाषाई या जातीय अल्पसंख्यक इस भय में जी रहे हैं कि उन्हें कह दिया जाएगा कि वे इस देश के नहीं हैं। उन्हें कभी भी वोट देने से रोका जा सकता है। उन्हें कभी भी डिटेंशन सेंटर भेजा जा सकता है।

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