न्यायालय का ‘एक्सपायर’ दवा के कथित पुनःउपयोग से जुड़ी याचिका पर अदालत के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार

नई दिल्ली, 10 जनवरी (ऐजेंसी/सक्षम भारत)। उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा उस याचिका पर पारित आदेश में सोमवार को हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें ‘एक्सपायर’ (ऐसी दवाएं जिनके इस्तेमाल करने की समय-सीमा समाप्त हो चुकी हो) हो चुकी दवाओं के उत्पादन संबंधी मूल विवरण को हटाकर और उन पर फिर से मोहर लगाकर उनके कथित पुनः उपयोग का मुद्दा उठाया गया था।

शीर्ष अदालत ने कहा कि वह एक ‘‘सही आदेश’’ था।

उच्च न्यायालय ने 27 फरवरी 2020 को अपने एक आदेश में इस संबंध में दायर याचिका पर यह कहते हुए विचार करने से इनकार कर दिया था कि ऐसा प्रतीत होता है कि दवाओं की ‘लेबलिंग’ के तरीके के लिए पर्याप्त प्रावधान मौजूद है।

उच्च न्यायालय ने याचिका का निपटारा करते हुए यह भी कहा था कि याचिकाकर्ता के पास औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियम, 1945 से संबंधित नियमों के कथित उल्लंघन के लिए उचित मंच पर आग्रह करने का अधिकार है।

शीर्ष अदालत में न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी की पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की।

याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता अमित साहनी ने शीर्ष अदालत को बताया कि उन्होंने शुरू में इस मुद्दे पर संबंधित प्राधिकरण को एक प्रतिवेदन भेजा था और उसके बाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।

उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय में दायर याचिका में उन्होंने संबंधित अधिकारियों को यह निर्देश देने का अनुरोध किया था, ‘‘दवा पर मोहर लगाने के मौजूदा तंत्र को अन्य तरीकों जैसे विधि अर्थात मुद्रण आदि से बदला जाए, ताकि मौजूदा निर्माण तिथि/समय-सीमा समाप्त होने की तिथि/मूल्य आदि को मिटाने के बाद नई ‘एक्सपायर’ तिथि के साथ नए सिरे से मोहर लगाकर ‘एक्सपायर’ दवा के पुनःउपयोग से बचा जा सके या कम से कम किया जा सके।’’

पीठ ने कहा, ‘‘ ऐसा कुछ है, जिस बारे में आप शिकायत दर्ज करना चाहते हैं। इसके लिए सभी प्रावधान मौजूद हैं।’’

साहनी ने तर्क दिया कि प्रावधान हैं लेकिन अधिकारी उन्हें इसे रोकने के लिए उसे लागू नहीं कर रहे हैं।

शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि अधिकारी किसी विशेष मामले में प्रावधानों को लागू नहीं कर रहे हैं, तो याचिकाकर्ता उसे चुनौती दे सकता है।

पीठ ने केवल मौखिक रूप से अपनी बात रखी, ‘‘ यह न्यायपालिका के समय की बर्बादी है। माफ कीजिए वह सही आदेश था।’’

पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने ‘‘बिल्लुक ठीक’’ कहा था कि याचिकाकर्ता नियमों के कथित उल्लंघन के लिए किसी विशेष निर्माता या किसी विशिष्ट व्यक्ति के संबंध में संबंधित अधिकारियों से सम्पर्क कर सकता है।

पीठ ने कहा, ‘‘ हमें इस एसएलपी (विशेष अनुमति याचिका) के संबंध में दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नजर नहीं आता। जैसा कि उच्च न्यायालय द्वारा कहा गया है, जब कोई उल्लंघन विशिष्ट विवरण के साथ इंगित किया जाता है, तो कार्रवाई शुरू की जा सकती है।’’

 

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