जंबूरी उद्घोषणाः जनजातीय राजनीति के बदलाव का शंखनाद

-डॉ अजय खेमरिया-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

‘जिस तरह देश महात्मा गांधी,सरदार पटेल और बाबा साहब की जयन्तियां मनाता है ठीक वैसे ही हर साल 15 नबंवर को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती भी जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाई जाएगी।’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस वक्तव्य के गहरे सांस्कृतिक एवं राजनीतिक निहितार्थ है।राजनीतिक रूप से यह देश की 11 करोड़ जनजातीय आबादी को भारतबोध के साथ जोड़ने के साथ भाजपा के भविष्य के राजनीतिक दर्शन और लक्ष्य को भी स्पष्ट परिभाषित कर रहा है।भोपाल के जंबूरी मैदान में आयोजित जनजातीय गौरव दिवस असल मायनों में एक नई संसदीय परिघटना की इबारत भी लिख गया है। यह मप्र की चुनावी राजनीति से इतर झारखंड,छत्तीसगढ़,गुजरात आंध्रप्रदेश,सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में भी भाजपा के चुनावी लक्ष्य भी निर्धारित करने वाला घटनाक्रम है।प्रधानमंत्री के वक्तव्य का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है ‘वनवासियों ने अयोध्या के राजकुमार को मर्यादा पुरुषोत्तम राम बना दिया’ इसका बात का विराट सांस्कृतिक महत्व है क्योंकि संसदीय राजनीति में भाजपा राम को गर्व के साथ भारत के स्वत्व के साथ जोड़ती है और पिछले कुछ समय से वनवासियों को राम और हिन्दू धर्म से अलग सिद्ध करने की राजनीति भी चरम पर है।प्रधानमंत्री ने भारत के स्वतंत्रता समर के साथ जनजातीय नायकों की विस्मृत कर दी गई भूमिका को जिस आक्रमकता के साथ जंबूरी मैदान पर उकेरा है उसके मायने भी विपक्ष के लिए निरुत्तर करने वाले हैं।क्योंकि संयुक्त विपक्ष प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य पर इसलिए असहमति या कतिपय आरोप की राजनीति नही कर सकता है क्योंकि असंदिग्ध रूप से जनजातीय प्रतिनिधित्व के मामले में राष्ट्रीय आंदोलन की कथा में कहीं भी समानुपातिक भागीदारी आज नजर नही आती है।ध्यान से देखा जाए तो प्रधानमंत्री ने जम्बूरी में एक नया सामाजिक राजनीतिक एजेंडा भी सेट कर दिया है।इस एजेंडे में कुछ ऐसे सवाल है जो कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष को परेशान कर सकते है।प्रधानमंत्री ने एक और अहम बात कही कि जिन लोगों ने जनजातीय गौरव को विस्मृत किया है उसकी चर्चा सब जगह होना चाहिये। राजनीतिक मैदान और विमर्श नवीसी में जब यह सवाल उठेंगे कि स्वतंत्र सेनानियों की पेंशन लेनें वालों में कितने जनजाति है?बिरसा से लेकर भीमा नायक,रघुनाथ शाह,शंकर शाह जैसे नायक किस पाठ्यक्रम में है?कितने जनजतियो के हिस्से में भारत रत्न और पदम् पुरुस्कार है? इन सवालों के जबाब कांग्रेस को सीधे परेशान करने वाले है क्योंकि तुष्टीकरण और परिवारवाद के फेर में इस देश की जनजातियों के महानायक अन्याय का शिकार तो हुए ही है।जाहिर है किसान आंदोलन, असहिष्णुता, सीएए कोरोना विफलता जैसे नकली नैरेटिव से वातावरण खराब करने वालों को प्रधानमंत्री मोदी ने राजनीतिक रूप से अपने परम्परागत अंदाज में घेर लिया है।यह घेराबंदी अगले तीन सालों में होने वाले 9 राज्यों के विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव के लिए विपक्ष को खासी परेशान करने वाली होगी।
भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के नेतृत्व में आयोजित इस गौरव दिवस ने भाजपा के समावेशी संस्करण को सामने लाने का काम किया।प्रधानमंत्री के मंच पर मप्र कोटे से केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते,प्रदेश सरकार के मंत्री बिसाहूलाल सिंह, विजय शाह, मीना सिंह,के अलावा सांसद गजेंद्र सिंह, दुर्गा दास उईके, हिमांद्री सिंह,संपतिया उईके, प्रो सुमेर सिंह सोलंकी, और पूर्व विधायक कुल सिंह भाबर मौजूद थे।इसका प्रतीकात्मक महत्व भी इसलिए भी है क्योंकि भाजपा पर दलित और जनजातीय विरोधी होने का आरोप लगाया जाता है जबकि प्रतिनिधित्व के नजरिये से देखा जाए तो भाजपा ही ऐसा दल है जहां पिछले डेढ़ दशक से इन वर्गों के सर्वाधिक प्रतिनिधि चुनकर आ रहे है।जंबूरी के मंच का एक प्रतीक भाजपा का प्रामाणिक जबाबी हमला भी है उस कांग्रेस की तरफ जो दशकों तक इस वर्ग को वोटबैंक की तरह उपयोग करती रही है।हाल ही में जोबट के उपचुनाव का नतीजा भी मप्र में जनजातीय राजनीति के प्रति भाजपा की दीर्धकालिक राजनीति का संकेत देता है जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने जंबूरी के मंच से समझाने का प्रयास किया है।तो बड़ा सवाल यह कि जनजातीय गौरव दिवस के साथ भाजपा ने जिस नई जंबो लकीर को जंबूरी मैदान से राजनीतिक एवं सांस्कृतिक रूप से खींचा है वह संसदीय राजनीति में विपक्ष के लिए वाकई बड़ी चुनौती है या नही?वस्तुतः प्रधानमंत्री मोदी भारत की परंपरागत राजनीतिक प्रस्थापनाओं और अवधारणाओं को बदलने में सिद्धहस्त है।अल्पसंख्यकवाद हो या भारत की दलित,पिछड़ी राजनीति की थियरी।भाजपा ने एक एक लंबी राजनीतिक परियोजना के तहत इन सबको नए आयाम पर अपने पक्ष में खड़ा कर दिया है।कमोबेश अब जनजातीय राजनीति की इबारत को भी इसी तर्ज पर पूरी प्रामाणिकता के साथ बदलने की जमीनी शुरुआत हो चुकी है।मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने जिस व्यवस्थित तरीके से जनजातीय सम्मेलन को आयोजित किया है उसके दीर्धकालिक राजनीतिक नतीजे भी स्वयंसिद्ध है।हबीबगंज रेलवे स्टेशन को गोंड रानी कमलापति के नाम पर किया जाना प्रतीकों की राजनीति का श्रेष्ठतम उदाहरण है।दिग्विजयसिंह का यह कहना कि यह काम हम भी करना चाहते थे।इस बात को साबित करता है कि जनजातीय राजनीति की धुरी अब कहाँ खड़ी हुई है।प्रधानमंत्री का यह कहना कि जनजातीय इतिहास को छिपाया गया है और कांग्रेस की सरकारों ने उचित सम्मान न देकर अपराध किया है।इस बयान की चोट सीधी विपक्ष पर जाती है।भगवान बिरसा मुंडा को गांधी,पटेल और अम्बेडकर के साथ खड़ा करके प्रधानमंत्री ने साफ संकेत कर दिया है कि देश की 10 फीसदी आबादी वाला जनजातीय वर्ग भाजपा की सर्वोच्च प्राथमिकता पर है।सबसे अहम बात यह कि जनजातीय समाज के साथ भगवान राम को निर्णायक शक्ल में जोड़ने की शुरुआत इस जंबूरी समागम ने कर दी है। इस बात ने जनजातीय समाज को अंतर्मन से स्पंदित किया है।राम और जनजातीय का यह युग्म मिशनरीज केंद्रित अलगाव की राजनीति के लिए बड़ा झटका साबित होने वाला है क्योंकि इस बात से कोई इनकार नही कर सकता है कि संगठन के स्तर पर इस समय भाजपा और उसके समविचारी मैदानी कार्यकर्ताओं का कोई भी मुकाबला अन्य दल नहीं कर सकते है। इसलिए जब जंबूरी का उद्घोष मैदान पर क्रियान्वित होगा तब जनजातीय राजनीति का बदलना भी तय ही है। सोमवार को राजधानी में जनजातीय गौरव दिवस की शुरुआत का अवसर देश की सियासत को नए संकेत दे गया। सच्चाई तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जंबूरी समागम को सामाजिक राजनीतिक परिवर्तन की नई मुहिम से जोड़ दिया। वर्षों से उपेक्षित आदिवासी समाज को संबल, सहयोग और सम्मान देकर स्पष्ट कर दिया कि इस समाज के साथ नाइंसाफी अब नहीं चलने वाली।प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के एक-एक शब्द बता रहे थे कि भाजपा के साथ जनजातीय समाज का भविष्य का रिश्ता क्या होने वाला है। जाहिर है इसके सियासी मायने तो निकाले ही जाएंगे।बदलाव का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि जबलपुर में आयोजित कांग्रेस के जनजातीय सम्मेलन में बमुश्किल एक हजार जनजाति वर्ग के लोग जुटे जिसके चलते पूर्व सीएम कमलनाथ को पांच मिनिट में ही वहां से रवानगी डालनी पड़ी।ग्वालियर के समारोह में एक भी जनजातीय व्यक्ति नही आया। संकेत साफ है भाजपा, मोदी और शिवराज ने जनजातीय राजनीति के परंपरागत लिबास को उतार दिया है जो अब नये संस्करण में राममय होगी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *