स्वायत्त बहुजन राजनीति और कांशीराम की विरासत

दृडॉ. अजय खेमरिया-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

क्या देश की संसदीय राजनीति में ‘स्वायत्त दलित राजनीतिक अवधारणा’ के दिन लद रहे हैं या राष्ट्रीय दलों में दलित प्रतिनिधित्व की नई राजनीति इसे विस्थापित कर रही है। कांग्रेस एवं भाजपा जैसे दलों में दलित नुमाइंदगी प्रतीकात्मक होने के आरोप के साथ बहुजन राजनीति की शुरुआत हुई थी। बड़ा सवाल आज यह है कि क्या उत्तर भारत में बहुजन राजनीति अपने ही अंतर्विरोधों से अप्रसांगिक होने के खतरे से नहीं जूझ रही है। अगले साल यूपी सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसकी बिसात बिछ चुकी है और ऐसे में सबकी निगाह मायावती के प्रदर्शन या सही मायनों में स्वायत्त दलित राजनीतिक अवधारणा के भविष्य पर भी टिकी हुई है।

असल में मायावती की सफलता और विफलता के साथ डॉ. अम्बेडकर और कांशीराम की उस दलित चेतना का सीधा संबन्ध भी है जिसे सामाजिक न्याय के साथ देखा जाता है। सवाल यह है कि क्या मायावती के साथ ही उस स्वायत्त दलित राजनीति का अंत भी हो जाएगा जिसे कांशीराम ने खड़ा किया था क्योंकि मौजूदा पूर्वानुमान यही इशारा कर रहे हैं कि उप्र में मायावती भाजपा और सपा की तुलना में पिछड़ सकती हैं। ऐसे में इस सवाल के समानांतर राष्ट्रीय दलों में दलित प्रतिनिधित्व की राजनीति को भी विश्लेषित किये जाने की आवश्यकता है। हाल ही में पंजाब में कांग्रेस ने रामदसिया दलित बिरादरी के सिख को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया है तो भाजपा ने उत्तराखंड की राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को इस्तीफा कराकर पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है।

जाहिर है राष्ट्रीय दल अब प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व को मजबूत करते हुए दीर्धकालिक चुनावी लक्ष्यों को साधने के लिए जुट गए हैं। बड़ा सवाल यही है कि क्या जिस तरह 2007 में मायावती ने अपने दम पर यूपी की सत्ता पर कब्जा कर स्वायत्त दलित राजनीतिक ताकत का खंबा ठोका था वह महज एक संयोग भर था।क्योंकि 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव हों या 2014 और 2019 के लोकसभा नतीजे, मायावती की बहुजन थियरी लगातार कमजोर होते हुए आज अपने अस्तित्व से क्यों जूझ रही है। इसके जवाब में दलित आंदोलन के नवसामंती तत्वों को समझने की आवश्यकता भी है क्योंकि मायावती कांशीराम की विरासत को संभालने में नाकाम साबित हुई हैं। डॉ. अम्बेडकर ने शिक्षित,संगठित दलित समाज की अवधारणा को गढ़ा था जिसे 90 के दशक में कांशीराम ने जमीन पर कुछ परिवर्तन के साथ उतारने का काम किया।

बेशक कांशीराम जाति को जाति से काटने की बुनियाद पर चले लेकिन उनके मिशन में एक सांस्कृतिक पुट भी था जो कतिपय ऐतिहासिक जातिगत अन्याय को उभार कर आगे बढ़ा था। कांशीराम ने प्रवास और अहंकार मुक्त सम्पर्क के बल पर दलित राजनीति की स्वायतत्ता को आकार दिया। मायावती ने इसे एक एटीएम की तरह उपयोग किया और उस पक्ष को बिसार दिया जो कांशीराम के परिश्रम और सम्पर्क शीलता से जुड़ा था। नतीजतन मंडल और कमंडल की काट में खड़ा किया गया एक सफल दलित आंदोलन आज महज चुनाव लड़ने के विचार शून्य सिस्टम में तब्दील होकर रह गया। उत्तर प्रदेश में आज कोई भी पूर्वानुमान मायावती को 2007 की स्थिति में होने का दावा नहीं कर रहा है। आज दलित बिरादरी में मायावती और बसपा को जाटव एवं कुछ पॉकेट में मुस्लिम वोटों की ताकत तक आंका जा रहा है। कभी 30 फीसदी वोटों वाली मायावती दो लोकसभा चुनाव में उस कोर जाटव वोट को भी सहेज कर नहीं रख पाई जो कांशीराम के जमाने से इस पार्टी का सबसे सशक्त आधार था। बेशक आज भी यूपी में वह 20 फीसदी से ज्यादा मत प्रतिशत पर काबिज है लेकिन जिन गैर जाटव और गैर यादव ओबीसी वोटों के साथ बहुजन आंदोलन कांशीराम ने खड़ा किया था उसकी उपस्थिति मायावती के साथ नहीं है।

2014 में अमित शाह ने जिस सोशल इंजीनियरिंग को उप्र में अंजाम दिया था वह 2019 में भी कायम नजर आई और अब खतरा बहुजन आंदोलन के सामने यह खड़ा है कि जाटव कोर वोट में भी भाजपा सेंधमारी की फूल प्रूफ तैयारी के साथ मैदान में उतर चुकी है। बेबीरानी मौर्य मायावती की उसी जाटव जाति से आती हैं और प्रदेश के सभी 75 जिलों में उनके दौरे एवं सम्पर्क सभाओं का प्लान पार्टी ने तय किया है। खासकर जाटव महिलाओं के बीच। उधर प्रियंका गांधी और चंद्रशेखर रावण एवं जिगनेश मेवानी की केमिस्ट्री भी जाटव वोटरों के इर्द-गिर्द दिखती है। जिस रामदसिया दलित जाति से कांशीराम आते थे पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भी उसी जाति से हैं। ऐसे में कांशीराम की विरासत पर मायावती को चुनौती भाजपा के साथ कांग्रेस से भी सीधे मिलनी है।

जाहिर है मायावती के भरोसे जिस स्वायत्त दलित राजनीति का सपना कांशीराम ने देखा था वह मायावती के सामंती व्यवहार से फिलहाल संकट में नजर आ रहा है। उप्र में जाटव जाति की संख्या कुल 20 फीसदी दलित में 12 फीसदी गिनी जाती है और जाटव बिरादरी के युवा बढ़ी संख्या में चंद्रशेखर की भीम आर्मी से जुड़ रहे हैं। यानी मायावती जिस सकल डीएस 4 और बामसेफ की जमीन पर खड़ी थी वह जमींदोज हो रही है। नव सामंती बुराइयों ने दलितों के अंदर से ही स्वायत्त दलित सत्ता की संभावनाओं को खारिज करना शुरू कर दिया है। यह स्थिति दलितों के अंदर सामंती स्थितियों की उपज ही है क्योंकि जाटवों के एक वर्ग को छोड़कर मायावती ने अन्य दलितों को सत्ता और वर्चस्व में भागीदारी को स्वीकार ही नहीं किया। डॉ अंबडेकर और कांशीराम जिस समावेशी सत्ताई दलित भागीदारी की वकालत कर रहे थे वह मायावती के साथ नजर नहीं आती है। उन्होंने दलित चेतना के नाम पर खुद के महिमामंडन और विरासत की तानाशाह वारिस की तरह काम किया। विरासत की निधि को केवल चुनावी सिस्टम में तब्दील करके दलित आंदोलन के सामने खुद को एक मजबूरी के रूप में स्थापित किया।

नतीजतन आज उप्र में वे प्रासंगिकता की लड़ाई लड़ती हुई दिख रही हैं। संवाद या विमर्श मायावती के शब्दकोश में है ही नहीं। मप्र, उप्र, हरियाणा, पंजाब में कितने नेताओं को उन्होंने पार्टी से निकाल दिया जो कांशीराम के समय से सक्रिय थे। हाल ही में पंजाब के अध्यक्ष समेत अन्य नेताओं के साथ भी यही व्यवहार हुआ। पंजाब में अकालियों से गठबंधन के मामले में भी उनकी भूमिका संदिग्ध नजर आई है।

ईमानदारी से देखें तो मायावती और कांशीराम के व्यक्तित्व एवं कृतित्व में कोई भी बुनियादी साम्य नहीं है। कांशीराम का व्यक्तित्व ऐसा था कि वो तुरंत ही आमलोगों, खासकर बहुजन महिलाओं से जुड़ जाते थे। ऐसी कई महिलाएं थीं जिन्होंने कांशीराम के बहुजन संघर्ष का नेतृत्व किया लेकिन आज उन्हें कोई नहीं जानता है। कांशीराम आंदोलन से जुड़े हर व्यक्ति की अहमियत को समझते थे। वे अक्सर काडर के सदस्यों के घर चले जाते थे और उनके पास ठहरकर लंबी बातचीत किया करते थे। मायावती कभी किसी कार्यकर्ता के घर गईं हों यह किसी को नहीं पता। संवाद तो दूर उनसे पार्टी के बड़े नेताओं का मिलना तक कठिन होता है। वे कभी जमीन पर आंदोलन करती हुई नजर नहीं आई। उनकी सभाओं में कुर्सी ऊंची और सबसे दूर लगाई जाती है। दौलत से उनके अनुराग को यह कहकर खारिज किया जाता है कि क्या दौलतमंद होना केवल सवर्णों का अधिकार है लेकिन उनके वकील यह भूल कर गए कि दौलत का वितरण दलितों के एक सिंडिकेट से आगे कभी हुआ ही नहीं है।

एक ऐसा सामंती आवरण मायावती के ईर्द-गिर्द खड़ा हुआ मानो वे दैवीय अवतार हो। स्वयं मायावती और उनके पैरोकार यह भूल गए कि कांशीराम मायावती को उनके घर से बुलाकर खुद लाये थे। वस्तुतः कांशीराम नीचे जमीन से उठे हुए नेता थे, जिनका आम लोगों के साथ एक गतिशील रिश्ता था। वो असली मायनों में एक बड़े नेता थे। आज अगर चंद्रशेखर रावण के साथ पढ़े-लिखे जाटव युवा जुड़ रहे हैं तो इसके पीछे मायावती का यही दैवीय आवरण जिम्मेदार है।दूसरी तरफ बेबीरानी मौर्य, प्रियंका रावत जैसी दलित महिलाओं को बीजेपी जाटव बिरादरी में आगे रखकर चल रही है तो इसका मतलब साफ है कि बसपा की कोर पूंजी बिखरने के कगार पर है। साथ ही एक नई राजनीतिक धारा के स्थापित होने की स्थितियां भी निर्मित हो रही है वह है राष्ट्रीय दलों में दलितों की प्रतीकात्मक नही दीर्धकालिक भागीदारी। सामाजिक न्याय और बहुजन आंदोलन ने एक अनुमान के अनुसार दलित और पिछड़े वर्ग के महज 10 जातीय समूहों को नुमाइंदगी दी है शेष 40 जातीय समूह आज भी सामाजिक न्याय के मामले में हाशिये पर ही हैं।

क्या बसपा के पराभव के साथ दलितों का स्वाभाविक प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय दलों में लोहिया के जुमले के अनुरूप कायम हो पायेगा। यह आने वाले समय में भारतीय संसदीय राजनीति का देखने वाला पक्ष होगा। फिलहाल तो स्वायत्त दलित राजनीति की अवधारणा अस्ताचल की ओर कही जा सकती है। जिसका मूल कारण अम्बेडकर और कांशीराम के वारिसों का सामंती व्यवहार ही माना जाना चाहिये।

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