रस्म अदायगी तक सीमित न रहे हिन्दी पखवाड़े का आयोजन

-योगेश कुमार गोयल-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

हिन्दी पखवाड़े के अंतर्गत इन दिनों देशभर में अनेक प्रतिष्ठानों में हिन्दी को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से कई प्रकार की गतिविधियां चलाई जा रही हैं लेकिन हर साल हिन्दी पखवाड़े के नाम पर इस प्रकार के आयोजनों को महज रस्म अदायगी के रूप में ही देखा जाता रहा है। हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है और प्रत्येक भारतवासी के लिए यह गर्व की बात होनी चाहिए कि अब केवल भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हिन्दी को चाहने वालों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इसलिए हिन्दी पखवाड़े जैसे महत्वपूर्ण अवसरों को औपचारिक समारोहों तक सीमित रखने के बजाय इसके माध्यम से हिन्दी भाषा के निरन्तर संरक्षण और संवर्धन को लेकर संजीदगी से अभियान चलाए जाने की सख्त दरकार है। दरअसल हिन्दी ऐसी भाषा है, जो प्रत्येक भारतीय को वैश्विक स्तर पर सम्मान दिलाती है। बहुत सारे देशों में अब वहां की स्थानीय भाषाओं के साथ हिन्दी भी बोली जाती है। इसके अलावा दुनिया के सैंकड़ों विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है और यह वहां अध्ययन, अध्यापन तथा अनुसंधान की भाषा भी बन चुकी है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जनसम्पर्क के लिए हिन्दी को ही सबसे उपयोगी भाषा मानते थे। हिन्दी भाषा के महत्व को स्वीकारते हुए वह कहा करते थे कि सम्पूर्ण भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है, जिसे जनता का बड़ा भाग पहले से ही जानता-समझता है और राज व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है। हिन्दी की बढ़ती ताकत का सकारात्मक पक्ष यही है कि आज विश्वभर में करोड़ों लोग हिन्दी बोलते हैं। दुनियाभर में आज करीब 75 करोड़ व्यक्ति हिन्दी बोलते हैं और जिस प्रकार वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी की स्वीकार्यता निरन्तर बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह कहना असंगत नहीं होगा कि अब वह दिन ज्यादा दूर नहीं, जब हमारी राजभाषा हिन्दी चीन की राजभाषा चीनी को पछाड़कर शीर्ष पर पहुंच जाएगी।

हिन्दी भाषा के महत्व को देश-विदेश के बड़े-बड़े विद्वानों ने समय-समय पर अपने शब्दों में व्यक्त किया है। पुरुषोत्तमदास टंडन मानते थे कि जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में भी हिन्दी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है। गांधीजी कहते थे कि दिल की कोई भाषा नहीं है, दिल दिल से बातचीत करता है और राष्ट्रभाषा के बिना एक राष्ट्र गूंगा है। अमेरिका के जाने-माने चिकित्सक वॉल्टर चेनिंग का कहना था कि विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। माखनलाल चतुर्वेदी हिन्दी को देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत मानते थे जबकि राहुल सांस्कृत्यायन के अनुसार संस्कृत की विरासत हिन्दी को जन्म से ही मिली है। बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ का कहना था कि राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिन्दी ही जोड़ सकती है। डॉ. फादर कामिल बुल्के ने संस्कृत को मां, हिन्दी को गृहिणी और अंग्रेजी को नौकरानी बताया था। आयरिश प्रशासक जॉन अब्राहम ग्रियर्सन को भारतीय संस्कृति और यहां के निवासियों के प्रति अगाध प्रेम था, जिन्होंने हिन्दी को संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि बताया था। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने हिन्दी को लेकर एकबार कहा थाः-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।

अर्थात् अपनी भाषा से ही उन्नति संभव है क्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है। मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है। महात्मा गांधी के हिन्दी प्रेम को परिभाषित करता वर्ष 1917 का एक ऐसा किस्सा सामने आता है, जब कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन के मौके पर बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रभाषा प्रचार संबंध कांफ्रेंस में अंग्रेजी में भाषण दिया था और गांधीजी ने उनका वह भाषण सुनने के पश्चात् उन्हें हिन्दी का महत्व समझाते हुए कहा था कि वह ऐसा कोई कारण नहीं समझते कि हम अपने देशवासियों के साथ अपनी ही भाषा में बात न करें। गांधीजी ने कहा था कि अपने लोगों के दिलों तक हम वास्तव में अपनी ही भाषा के जरिये पहुंच सकते हैं।

विश्वभर में हमारी हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री ‘बॉलीवुड’ का नाम है, जहां हर साल करीब डेढ़ हजार फिल्में बनती हैं और ये फिल्में भारत के अलावा विदेशों में भी खूब पसंद की जाती हैं। यही कारण है कि बॉलीवुड सितारे अक्सर अपनी फिल्मों के प्रचार-प्रसार के लिए अब विदेशों में शो आयोजित करते हैं। यूएई में हिन्दी एफएम चैनल वहां के लोगों की खास पसंद हैं। जब हम ऐसे-ऐसे देशों में भी हिन्दी को भरपूर प्यार, स्नेह, सम्मान मिलता देखते हैं, जो अपनी मातृभाषाओं को लेकर बेहद संवेदनशील रहते हैं और उसे अपनी सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़कर देखते हैं तो यह वाकई हम भारतीयों के लिए गौरवान्वित करने वाली उपलब्धि ही है। आज दुनिया का हर वह कोना, जहां भारतवंशी बसे हैं, वहां हिन्दी धूम मचा ही रही है।

तो आइए, हिन्दी पखवाड़े के अवसर पर हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य को संरक्षण देने और इसका संवर्धन करने का संकल्प लेकर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के इसी सपने को साकार करने का हरसंभव प्रयास करें।

 

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