पंजाब में गठजोड़

-सिद्वार्थ शंकर-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

पंजाब की सियासत इस समय पूरे देश को अपनी ओर खींच रही है। राज्य में सियासी घटनाक्रम लगातार बदल रहे हैं। कांग्रेस की अंदरूनी कलह पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुई थी कि अकाली दल ने एक नया सियासी दांव चलकर सभी को चैंका दिया। अकाली दल ने अचानक से बसपा के साथ गठबंधन कर सियासी गलियारों में एक नई सुगबुगाहट पैदा कर दी। आगामी चुनावों को देखते हुए प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल ने मायावती से हाथ मिलाकर राज्य के पिछड़े और दलित वोटों पर अपना कब्जा जमाने की तैयारी शुरू कर दी है। राज्य में दलितों का 32 फीसदी से ज्यादा वोट बैंक है। पिछले दिनों अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने चुनाव जीतने के बाद दलित उप मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की थी। सुखबीर सिंह बादल को यह बात अच्छी तरह से पता है कि दलितों के समर्थन के बिना चुनाव जीतना संभव नहीं है। इसीलिए अकाली दल प्रमुख ने कुछ सोचकर गठबंधन को अंजाम दिया है। दरअसल, राज्य में अकाली दल को सत्ता चलाने का पुराने अनुभव रहा है। लंबे समय तक पंजाब की सत्ता का स्वाद चख चुकी पार्टी को भरोसा है कि दलित वोट बैंक को अगर साध लिया जाता है तो आगामी चुनाव में पार्टी की जीत सुनिश्चित है। इसी लिए अकाली दल ने दलित और पिछड़ों के हिमायती नेता को साथ रखकर चुनाव लडने का प्लान बनाया। शिरोमणि अकाली दल 2007-2012 के विधानसभा चुनावों में जीतकर सरकार बनाई थी। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री दोनों इसी दल के नेता बने थे। बाद में अकाली दल ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और फिर सत्ता में वापसी की, लेकिन कृषि कानूनों के मुद्दों पर अकाली दल भाजपा से अलग हो गई। पंजाब के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवार यानी सुखबीर सिंह बादल को बसपा से गठबंधन करना कितना रास आएगा यह कहना तो अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि राज्य में एक तिहाई से ज्यादा दलितों और पिछड़ों का वोट बैंक चुनावी नतीजों के बदलने में अहम भूमिका अदा कर सकता है। राज्य में अनुसूचित जातियों की अच्छी खासी संख्या है। अकाली दल को यह पता है कि सत्ता पाने के लिए 40 फीसदी से ऊपर वोट प्रतिशत होनी चाहिए, अगर इससे कम होगा तो सत्ता पाना मुश्किल होगा। इसलिए सुखबीर बादल ने समय रहते हालात को भांप लिया। पंजाब में अकाली दल जब भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ती थी तो उसका फायदा अकाली दल को मिलता था क्योंकि हिंदू वोट भी अकाली दल के पक्ष में जाता रहा। पंजाब का मालवा इलाका हिंदू वोटों का गढ़ माना जाता है, जहां करीब 67 विधानसभा सीटें आती हैं। यहां पर भाजपा के चलते अकाली दल को सियासी फायदा मिलता था, लेकिन भाजपा से अलग होने के बाद सुखबीर सिंह को यहां पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। हालांकि सुखबीर सिंह हिंदू वोटरों को भी अपने पक्ष में करने के लिए लगातार इलाकों का दौरा कर रहे हैं। देश में पंजाब में दलितों का प्रतिशत सबसे ज्यादा है,आबादी का कुल 32 फीसदी दलित इस राज्य में हैं, लेकिन आज तक पंजाब के राजनीतिक इतिहास में कोई दलित मुख्यमंत्री नहीं बना। जानकार बताते हैं कि इसकी मुख्य वजह दलितों का आपस में तालमेल नहीं होना है। यहां का दलित बंटा हुआ है। कुछ तबकों की वफादारी अकाली दल की ओर है तो कुछ का झुकाव कांग्रेस की ओर। पंजाब में यह एकजुट होकर कभी नहीं रहे। बसपा लगातार सियासी जमीन खोती जा रही है। वहीं अकाली दल खोई हुई सियासी जमीन को वापस लाने के लिए बसपा के साथ गठबंधन किया है। अब देखना होगा कि अकाली दल आगामी चुनाव में सत्ता हासिल करने में कामयाब होती है या नहीं।

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