पाकिस्तानी हिंदू युवती का संघर्ष

-डा. वरिंदर भाटिया-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

पड़ोसी देश पाकिस्तान के सिंध प्रांत में रहने वाली डॉक्टर सना राम चंद वह पहली हिंदू लड़की हैं, जिनका नाम सेंट्रल सुपीरियर सर्विस (सीएसएस) परीक्षा पास करने के बाद पाकिस्तान प्रशासनिक सेवा के लिए सुझाया गया है। पाकिस्तान की सेवा करने के लिए जिन 79 महिलाओं का चयन किया गया है, उनमें डॉक्टर सना राम चंद इकलौती हिंदू महिला हैं। कामयाबी के बाद उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा, ‘वाहेगुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी की फतह। मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि अल्लाह की कृपा से मैंने सीएसएस 2020 को पास कर लिया है और पीएएस के लिए सिलेक्ट हो गई हूं। सारा श्रेय मेरे माता-पिता को जाता है।’ डा. सना सीएसएस की परीक्षा पास करने वाले 221 अभ्यर्थियों में शामिल हैं। 18553 परीक्षार्थियों ने यह लिखित परीक्षा दी थी। विस्तृत चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक और मौखिक परीक्षा के बाद अंतिम चयन किया गया। मेधा सूची निर्धारित होने के बाद अंतिम चरण में समूह आवंटित किए गए और उनका चयन पीएएस के लिए हुआ है।

पीएएस श्रेणी हासिल करने वालों को सहायक आयुक्त के तौर पर नियुक्त किया जाता है और बाद में प्रोन्नत होकर वे जिला आयुक्त बनते हैं, जो जिलों का नियंत्रण करने वाला शक्तिशाली प्रशासक होता है। पीएएस शीर्ष श्रेणी है। इसके बाद अक्सर पाकिस्तान पुलिस सेवा और पाकिस्तान विदेश सेवा तथा अन्य आते हैं। डा. सना राम चंद सिंध प्रांत के शिकारपुर जिले स्थित कस्बा चक की रहने वाली हैं। सना राम की प्राथमिक से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा वहीं से हुई थी। इसके बाद उन्होंने सिंध के चंदका मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया और फिर कराची के सिविल अस्पताल में हाउस जॉब की। उनके पिता भी स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े हैं। वह सिंध प्रांत के शिकारपुर जिले के ग्रामीण इलाके की रहने वाली हैं। हाल ही में उन्होंने सिविल अस्पताल कराची में प्रैक्टिस पूरी की है। फिलहाल वह सिंध इंस्टीट्यूट ऑफ यूरोलॉजी एंड ट्रांसपेरेंट से एफसीपीएस की पढ़ाई कर रही हैं और जल्द ही एक योग्य सर्जन बन जाएंगी। पाक के सिंध प्रांत में 20 लाख के लगभग हिंदू आबादी रहती है। पूर्व में इस समुदाय की अधिकांश लड़कियों ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े रोजगार को प्राथमिकता दी है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस रुझान में बदलाव आया है और उन्होंने पुलिस और न्यायपालिका से जुड़े क्षेत्र में रोजगार पाने का रुख किया है। सीएसएस की वार्षिक परीक्षा 2020 में कुल 18553 उम्मीदवार शामिल हुए थे और इनमें टेस्ट और इंटरव्यू के बाद केवल 221 लोगों का चयन किया गया है। पकिस्तान की सिविल सर्विस परीक्षा में सफलता की दर 2 प्रतिशत से भी कम रही है और उनमें से पाकिस्तान की सेवा करने के लिए जिन 79 महिलाओं का चयन किया गया है, उनमे डॉक्टर सना राम चंद भी शामिल हैं। डॉक्टर सना ने बताया कि कॉलेज तक तो उनका यही लक्ष्य था कि उन्हें डॉक्टर बनना है। सना बहुत ही होशियार छात्रा रही हैं और उन्हें शैक्षणिक उपलब्धि के लिए पदक भी मिला था।

एमबीबीएस के बाद सना की आगे की पढाई ठीक चल रही थी और इस बारे में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उन्हें सीएसएस करना है। सिंध के सरकारी अस्पतालों की स्थिति और मरीजों की परिस्थिति को देखकर डॉक्टर सना राम चंद का दिल टूट गया और उन्होंने सीएसएस करने का फैसला किया। वह कहती हैं, ‘मैंने पहले दृढ निश्चय किया हुआ था कि एक सर्जन और यूरोलॉजिस्ट बनना है। इस क्षेत्र में बहुत कम लड़कियां हैं। चांडका अस्पताल या जो दूसरे सरकारी अस्पताल हैं, उनको जब मैंने देखा कि न यहां मरीजों की कोई देखभाल है और न हमारे पास संसाधन, वहां काम करने का माहौल परेशान करने वाला था।’ वह आगे कहती हैं, ‘इसके विपरीत ब्यूरोक्रेसी आपको एक ऐसा प्लेटफॉर्म देती है जहां आप कुछ न कुछ बदलाव ला सकते हैं। मैं एक डॉक्टर के रूप में मरीजों के इलाज के लिए प्रतिबद्ध हूं, लेकिन इससे अवसर सीमित हो जाता है। ब्यूरोक्रेसी में अधिक अवसर हैं जिससे हम समस्याओं को हल कर सकते हैं। यही मेरा टर्निंग प्वाइंट था।’ डॉक्टर सना के अनुसार उन्हें सीएसएस का विचार 2019 में आया। उन्होंने तैयारी शुरू कर दी और 2020 में पेपर दिए और पास हो गई। लेकिन फिर भी उन्होंने एफसीपीएस को जारी रखा और चिकित्सा अधिकारी की नौकरी नहीं छोड़ी। उन्होंने कोविड वार्ड की ड्यूटी के साथ इंटरव्यू की तैयारी की। डॉक्टर सना राम चंद का कहना है कि लोगों को सफलता दिखाई देती है, लेकिन इसके पीछे जो संघर्ष है वो दिखाई नहीं देता है। सुबह आठ बजे से लेकर रात के आठ बजे तक उनकी वार्ड में ड्यूटी रहती, फिर वह सीधे लाइब्रेरी जाती थी। ‘मैंने अपने मोबाइल से सभी सोशल मीडिया अकाउंट को डिलीट कर दिया था। अपना सामाजिक जीवन भी इस तरह ख़त्म कर दिया था कि अपने चचेरे भाई की शादी में भी नहीं गई थी। मुश्किल से छह से सात घंटे सो पाती थी। लड़काना की चिलचिलाती गर्मी में भी मुझे पढ़ाई करनी होती थी। मैं कहीं भी आती-जाती, तो रास्ते में पढ़ लेती थी। मोबाइल फोन में किताब होती थी और जितने अंग्रेजी अखबार हैं वो सब पढ़ती थी।’ डॉक्टर सना कहती हैं कि वह नौकरी नहीं छोड़ सकती थी और अपनी पढ़ाई भी नहीं छोड़ना चाहती थी। ‘अगर आप नौकरी करते हैं तो पढ़ भी सकते हैं। बात यह है कि आप कितने दृढ़ हैं।’ उनका मानना है कि अगर आपको यह करना है तो करना है। फिर आप कोई बहाना नहीं बना सकते कि मेरी तो नौकरी बहुत कठिन है। सना राम चंद का कहना है कि उनके जो दोस्त थे वो छह-छह महीने तैयारी करते थे, जबकि वह एक महीने में तैयारी करके परीक्षा देती थी। वह कहती हैं कि पहली कोशिश में सफल होने का फार्मूला केवल इतना सा है कि आप कितनी तवज्जो देते हैं।

आपने ख़ुद को कितना समर्पित किया हुआ है और दिन में कितने घंटे बैठकर आप पढ़ते हैं। डॉक्टर सना राम चंद के माता-पिता उनके सीएसएस से ख़ुश नहीं थे लेकिन उनकी सफलता के बाद उन्होंने भी उन्हें प्रोत्साहित किया। उनके अनुसार जिस तरह दूसरों के माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे ब्यूरोक्रेसी में आएं, उनके माता-पिता ऐसा नहीं चाहते थे। उन्होंने अपनी मां से कहा था कि वो उन्हें एक कोशिश करने दें। अगर पास हो गई तो ठीक है अन्यथा वह चिकित्सा के फील्ड को जारी रखेंगी। जब लिखित परीक्षा का रिजल्ट आया तो उस समय मेरी तस्वीर सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुई और लोगों ने इसकी सराहना की, जिसके बाद मेरे माता-पिता ने मुझे प्रोत्साहित किया और कहा कि अपने शौक को पूरा करो। अब मेरे पास माता-पिता का सपोर्ट है जो पहले नहीं था। डॉक्टर सना की चार बहनें हैं। उनका कोई भाई नहीं है। वह कहती हैं कि उन्होंने कभी यह महसूस नहीं किया कि वह किसी पुरुष से कम हैं। उनके अनुसार ब्यूरोक्रेसी में कई महिलाएं हैं जो बहादुर हैं और अच्छा काम करती हैं, वह उन्हें ही फॉलो करेंगी। डॉक्टर सना की कामयाबी की कहानी इस पटल पर रखने का मकसद न सिर्फ हमारी महिला छात्राओं को प्रेरित करना है, बल्कि हमारे सबके अंदर मौजूद काबीलियत और मजबूत इच्छा शक्ति की ताकत को सफलता में बदलने की क्षमता को उजागर करना भी है। सना की सफलता न सिर्फ उनके समुदाय के लिए फक्र की बात है, बल्कि उनके देश और परिवार के लिए भी यह एक प्रेरणा है।

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