एमएसपी पर कानून की मांग- कितनी जायज और कितनी अव्यवहारिक

-डॉ. प्रशांत देशपांडे-

-: ऐजेंसी सक्षम भारत :-

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार ने सितम्बर, 2020 में खेती-किसानी से संबंधित तीन कानून बनाए, जिनकी संसद से मंजूरी मिल चुकी है। इन्हीं तीन कृषि कानूनों की वापसी और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी दर्जा देने की मांगों को लेकर देश भर में एक आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। हांलाकि ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ के नेतृत्व में केवल पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के किसान दिल्ली की सीमाओं पर तीन जगह धरना दे रहे हैं। सचाई यह भी है कि इन राज्यों के भी सभी किसानों का इस आंदोलन को समर्थन प्राप्त नहीं है बल्कि यह कुछ जाति-वर्ग या तबके तक सीमित रह गया है।

बहरहाल इनमें से फसल को मिलने वाले सरकारी न्यूनतम मूल्य अर्थात एमएसपी एक प्रशासकीय निर्णय है। सरकार पर यह कानून सभी के लिए बंधनकारक नहीं है। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेस – सीएसीपी) की सलाह पर केन्द्र सरकार कुल 23 कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम खरीदी दर यानी एमएसपी घोषित करती है। इसके तहत 7 किस्म के अनाज, 5 किस्म की दालें, 7 तिलहन और 4 व्यापारी उत्पाद सम्मिलित हैं। यह एमएसपी सरकार के लिए लागू होती है। अर्थात सरकारी खरीदी इसी एमएसपी के आधार पर होती है। सरकार एक निश्चित मात्रा तक ही खरीदी करती है। खुले बाजार के लिए एमएसपी की दर पर ही खरीदने के लिए कोई बाध्यकारी कानून नहीं है। इसीलिए एमएसपी को कानूनी दर्जा प्रदान किए जाने की मांग की जा रही है। ऐसे में जरूरी है कि एमएसपी को कानूनी दर्जा दिए जाने पर उसके किसान और देश की अर्थव्यवस्था पर होने वाले परिणाम की ठीक से विश्लेषण किया जाए।

सरकार को ही करनी पड़ेगी खरीदी

न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी कानून बन जाने पर एक बात तो साफ है कि निर्धारित दर से कम मूल्य पर अनाज की बिक्री नहीं होगी। निर्धारित दरों से कम दाम पर अनाज की खरीद कानूनन अपराध माना जाएगा। ऐसा करने पर सजा का प्रावधान होगा। साफ है कि कठोर कानून और सजा के प्रावधान के चलते व्यापारी अनाज खरीदने के लिए इच्छुक ही नही होंगे। नतीजतन सरकार को ही भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआई के माध्यम से सारा अनाज खरीदना पडेगा। मौजूदा परिस्थितियों में सरकार के पास खरीदा हुआ अनाज सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त गोदामों की व्यवस्था नहीं है। वहीं भविष्य के लिए इतने कम समय में इतनी अधिक संख्या में गोदाम बनवाना व्यवहारिक भी नहीं होगा।

उदाहरण के तौर पर जून, 2020 तक एफसीआई के पास किसानों से खरीदा हुआ 99 मिलियन टन अनाज जमा था। इनमें भी मुख्य रूप से गेंहू और चावल ही था। जबकि गोदामों की संग्रह क्षमता केवल 41.2 मिलियन टन थी। वर्तमान परिस्थिति में सरकार कुल उपज का केवल 6 प्रतिशत अनाज ही खरीदती है। यदि एमएसपी बाध्यकारक हुई तो इस आंकडे में भारी बढ़ोत्तरी होने के आसार है। सरकार इस खरीदे हुए अनाज की कुछ मात्रा गरीबों को राशन दुकानों के माध्यम से कम दामों पर उपलब्ध करवाती है। राशन की दुकानों में वितरण के बाद सरकार को बचा हुआ अनाज खुले बाजार में कम दामों पर बेचना पड़ेगा, जिसके चलते एफसीआई यानी केन्द्र सरकार को भारी नुकसान उठाना पडेगा। वहीं प्रतिस्पर्धा के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनाज की कीमत कम रहने की संभावना है। परिणाम यह होगा कि स्थानीय व्यापारी एफसीआई या खुले बाजार से महंगा अनाज खरीदने की बजाय अतरराष्ट्रीय बाजार से कम दामों पर अनाज खरीदना पसंद करेंगे।

फिलहाल देश में गेहूं और चावल एमएसपी के तहत खरीदा जाता है। यदि एमएसपी को कानूनी दर्जा दिया जाएगा तो सभी 23 फसलों पर एमएसपी घोषित किया जाएगा। इसके बाद सभी फसलें सरकार को ही खरीदनी पड़ेंगी। यदि ऐसा होता है तो एक अनुमान के अनुसार इस खरीदी पर कुल अनुमानित व्यय 17 लाख करोड़ रुपये होगा। फिलहाल सरकार खाद के लिए एक लाख करोड़ रुपए का अनुदान देती है। इसके अलावा अन्न अनुदान पर लगभग एक लाख करोड़ रुपए खर्च करती है। यदि सरकार एमएसपी कानून बनाती है तो कुल बजट का 85 प्रतिशत हिस्सा केवल एमएसपी पर ही खर्च करना पडेगा। जिसके चलते गरीबों के लिए जारी कल्याणकारी योजनाओं में भारी कटौती करनी पडेगी। वहीं बिजली, पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं की दरों में बढ़ोत्तरी करनी होगी। यदि स्थानीय व्यापारियों ने अनाज क्रय करने के लिये ,अन्तरराष्ट्रीय बाजार का रुख किया और सारा का सारा अनाज एफसीआई के माध्यम से सरकार को खरीदना पडा तो भारी व्यापार घाटे के कारण अर्थ व्यवस्था का संकट बढ़ सकता है। इसकी सीधी सी परिभाषा है, व्यापार घाटे का अर्थ – अधिक आयात ,कम निर्यात अर्थात कम आमदनी और अधिक खर्च। ये परिस्थिति किसानों के लिये और अन्ततः देश के लिये घातक होगी।

चीन का उदाहरण देखें जरा

यहाँ यह देखना उचित होगा कि इन्हीं परिस्थितियों में चीन ने कैसे हल खोजा है। पहले हम भारत तथा चीन के कृषि संबंधी आँकडों का अवलोकन करें तो पाएंगे कि भारत कि जनसंख्या 1.23 मिलियन है, वहीं चीन की जनसंख्या 1.39 मिलियन है। भारत की कृषियोग्य भूमि 198 मिलियन हेक्टेयर है तो चीन के पास 166 मिलियन हेक्टेयर कृषियोग्य भूमि है। भारत की कुल 48 प्रतिशत भूमि सिंचाई के तहत आती है वहीं चीन में 41 प्रतिशत कृषि भूमि पर सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध है। लेकिन भारत के कृषि उत्पाद मूल्य में काफी अंतर है। भारतीय कृषि उत्पाद मूल्य 407 बिलियन डॉलर्स है, वहीं चीन का कृषि उत्पाद मूल्य लगभग 1367 बिलियन डॉलर्स का है। अनुसंधान, विकास, शिक्षा और इनोवेशन पर भारत 1.4 बिलियन डॉलर्स खर्च करता है वहीं चीन लगभग 7.8 बिलियन डॉलर्स का खर्च करता है। दोनों देशों के तुलनात्मक अध्ययन से यह सुस्पष्ट होता है कि चीन की जनसंख्या अधिक हमसे अधिक है और कृषियोग्य भूमि कम है। साथ साथ सिंचाई के तहत आने वाली भूमि भी हमसे कम है । इसके बावजूद चीन के कृषि उत्पाद का मूल्य अधिक है । इसका साफ और स्पष्ट कारण है कि चीन कृषि अनुसंधान, विकास, शिक्षा और नवोन्मेषी योजनाओं पर भारत से 6.4 बिलियन डॉलर्स अधिक खर्च करता है।

इसके साथ ही एमएसपी के बारे में चीन की प्रणाली को समझना बेहद जरूरी है। भारत की तरह चीन भी अन्तरराष्ट्रीय दर से अधिक दामों पर किसानों से चावल ,गेँहू और मक्का खरीदता था । सन 2016-17 में चीन को लगभग 3 मिलियन मीट्रिक टन अनाज संग्रह करना पड़ा। नतीजतन चीन को गोदामों पर भारी निवेष करना पड़ा। इस घाटे के सौदे से सीख लेकर चीन ने मक्के पर दी जाने वाली एमएसपी रद्द कर दी और बारी बारी से अन्य अनाजों की एमएसपी भी रद्द कर दी है। इसके बदले में चीन ने बिजली ,पानी ,खाद आदि का अनुदान एक एकल योजना में समाविष्ट कर, किसानों को प्रति हेक्टर की दर से सीधा भुगतान करना शुरू किया। परिणाम यह कि अब चीन का किसान सीधे बाजार से,बाजार मूल्य पर, कृषि के लिए जरूरी सामान खरीदते हैं। इससे सरकार का बोझ तो कम हुआ वहीं किसान भी अपनी मर्जी के मुताबिक फसल उगाने के लिये स्वतंत्र हैं। इसके चलते चीन में कृषि उत्पादकता और उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई है। हमें चाहिये कि हम चीन के उदाहरण से ये बात सीखें और क्रमशः एमएसपी के अन्तर्गत आने वाली फसलों की संख्या कम करें तथा किसानों को अनुदान की बजाय सीधा भुगतान कर, आत्मनिर्भर होने मे सहायता करें । यही रास्ता अन्ततः किसान और देश दोनों के लिये लाभकारी होगा।
हाल ही में सरकार ने एमएसपी दलालों के माध्यम से न देकर सीधे किसानों के बैंक खाते में जमा करना आरंभ कर दिया है। यह सरकार द्वारा उठाया गया एक सही कदम है और किसान इससे प्रसन्न भी दिख रहे हैं। इससे किसानों को दलालों के चंगुल से मुक्ति तो मिलेगी ही वहीं स्वार्थी किसान नेतृत्व से भी मुक्ति मिलेगी। अभी तो एक बात स्थापित होती जा रही है कि आंदोलनकारी तथाकथित किसान नेतागण (राकेश टिकैत, योगेन्द्र यादव, हन्नान मोल्ला और चढूनी सहित पंजाब के नेता) और उनकी वकालत करने वाले कांग्रेस समेत विपक्षी दल केवल मोदी-विरोध में घातक खेल खेले जा रहे हैं। किसानों के हित में कृषि कानूनों की जरूरत, वास्तविक परिस्थियां और मौजूदा हालात में हो रही राजनिति को समझ कर वास्तविक किसानों को सरकार के साथ खड़े रहने की जरूरत है। यही किसानों के हित में भी है।

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